बुधवार, ९ सप्टेंबर, २०२६

आपण व आपले उत्सव--मातृदिन (भाग १)

आपण व आपले उत्सव-- मातृदिन  

देवीयों और सज्जनो नमस्कार !

हमारी मातृभूमी को देव-देवताओंकी भूमी माना
जाता है | इसका कारन हमारे यहाँ सृष्टी हर साल तीन ऋतु याने बरसात, ठंडी और गर्मी के स्वरुप में  प्रगट होती है | यह सृष्टी निर्माता की हमपर कृपा है | हमारे आयुर्वेद के अनुसार बरसात ऋतु रोगी, ठंडी भोगी और गर्मी योगी माना जाता है | इसिलीए ऋषिमुनियोंने चातुर्मास की रचना स्थापीत कियी और चातुर्मासको एक व्रत पर्वका स्वरूप दिया | इस व्रत पर्व पर देशके सभी प्रांतो में कथा-कथन के कार्यकम हर साल होते है | इसिलीए मै यहाॅ मातृदिनकी महत्ताको प्राधान्य दे रहा हूँ | 

श्रावण मास को हमारी संस्कृतीमे पवित्र  माना जाता है | नागपंचमी, स्वतंत्रता दिन, रक्षाबंधन-नारीयल - सागर पोर्णिमा, अश्र्वथमारुती, जन्माष्टमी -गोपाळकाला,  ज्ञानेश्वर महाराज जयंती, ऐसे उत्सवोंसे हमें मिलनेवाली खुषीके साध उत्साह और बल की प्राप्ती होती है | हमारे समाजके हर घरमें मनाये जानेवाले धार्मिकोत्सव की व्यवस्थाकी जिम्मेदारी बिना किसी प्रकारकी तक्रारके हमारे परिवारकी तथा रिश्तेदारोंके  घरकी नारीशक्ती उत्सवोंकी संपन्नता करती है | यह सौ प्रतिशत सच्ची बात है | इसिलीए हमारे ऋषिमुनियोंने श्रावण मासकी अमावास्याके (पिठोरी अमावास्या) दिनको मातृदिन उत्सव की रचना रखी है | गये गुरुवार 10 सिंतबर शामको यह उत्सव मनाया गया | इस उत्सव की खासियत ऐसी है की हम बचपनसे देख रहे की इस उत्सवमें इस दिन धार्मिक पुजा-अर्चन नारीयोंके हात से होती है | नारी याने हमें इस सृष्टीका रमणीय दर्शन देनेवाली माता |

हमारे देशके सभी प्रान्तीय भाषाओंके वंदनिय अध्यात्मिक गुरू, प्रवचनकार, संत-महंत, साहित्यिक, गायक, गीतकार, संगीतकारोंने  अपनी वाणी, लेखणी,गायकी और कला द्वारा वैदिक कालसे चलती आयी माताकी महत्ताको लाजबाब ढंगसे आम आदमी तक पहुचांई है | इन सभीकौ मेरा सादर प्रणाम ! 

देवीयों और सज्जनों, मै जब बोरीवली (प) श्री राम मंदिर मार्ग, बाभई स्थित आनंदराव पवार सरस्वती विद्यालयमे सचीव पद की जिम्मेदारी निभाता था तब मुझे  ' मातॄदिन ' पर अकस्मात  भाषण करनेकी विनंती प्राथमिक विभाग की तत्कालीन मुख्याध्यापिका कुडईकर मॅडम के तरफ हुई, तब मैने भाषण किया था | उस अवसर से मुझे 'मातॄदिन' पर लेख लिखनेकी प्रेरणा हुई थी | लेकीन अन्य जिम्मेदारी और स्वास्थ्य के कारण मै लेख नही लिख सका | वह भाषण समय के अभाव के कारण संक्षिप्त रह | लेकीन इस लेखकी समाप्ती उसी संक्षिप्त भाषणका  विस्तार बढाकर रखा किया है | 

अमेरिका मे हुई सर्वधर्म परिषदमें स्वामी विवेकानंद के भाषण से प्रभावित अमेरिकन सामाजिक, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं द्वारा स्वामीजी के जगह-जगह मे भाषण एवं हिंदु संस्कृती और हमारी नारीयोंकी सामाजिक स्थान इस विषयपर प्रश्नोत्तर कार्यकमोंका सिलसिला हुआ था | उसमेंसे दो प्रसंग यहाँ रखता हू जिससे हमारे नारीयोंका प्राचिन कालसे कैसा सन्मान होता है इस सत्यकी जानकारी एवं प्रचिती स्वामीजी के व्याख्यान तथा पत्रकार परिषद से दुनिया को हुई |

स्वामीजी के व्यक्तिमत्व से प्रभावित हुई अमेरिकन युवती स्वामीजी के पास आयी और कहा ' स्वामीजी, मुझे आपसे शादी करनेका यौग आता है तो कितना अच्छा होता | मुझे आपके जैसा सुदंर तथा बुद्धिवान पुत्र हो ऐसी इच्छा है | स्वामीजी ने स्मितहास्य से जबाब दिया ' यह तो बहूत साधी बात है, माता तुम मुझे तुम्हारा पुत्र मान लो |' स्वामीजी का जबाब सुनकर वहाॅ उपस्थित पुरूष और महिला चकीत हुए | उन्हे महिला- पुरूष संबंध को ऐसी उदात्त कल्पना अपरिचीत थी |

दुसरी जगह स्वामीजी का भाषण समाप्त होनेके बाद  एक श्रोता ने पुछा ' आपके देशमे महिलाओंको पुरूषोंके समान माना जाता है ?' इसपर स्वामीजी ने  ' नही ' ऐसा जबाब दिया |' तुरन्त सभागृह में  " धिक्कार,  धिक्कार, धिक्कार !! "  इस आवाज का कल्लोळ मच गया | थोडी देरमें  सभागृह मे शांती हुई | उसके बाद स्वामीजी खडे होकर धीरगंभीर मुद्रा, और सभागृह के चारो तरफ नजर डालकर कनखती आवाजमे " कारण भारतमें नारियोंको पुरूषोंसे श्रेष्ठ माना जाता है | " स्वामीजी का पुर्ण जबाब सुनते ही सभागृह मे  तालियोंका लगभग तीन मिनीट तक आवाज 
घुंमत रहा | 

उपर के दो प्रसंग के बारेमे अध्यात्मिक और  समाजशास्त्र के गाढे अभ्यासक प्राध्यापक प्र.ग. सहस्त्रबुद्धे जीवनमूल्ये भाग ३ मे कहते है की
" स्वामीजी के अधिकृत चरित्र में ऐसी कथा पढनेको मिलती नही | वह कल्पित याॅ अतिरंजित हो, पर एक बात निश्‍चित है की इस कथाद्वारें  जीवन विषयक एक महान सिद्धान्त का उद्घाटन हुआ है | नारीयोंपर देखनेका भारतिय दृष्टीकोन प्रकट हुआ है | स्वस्थ, सुव्यवस्थित, आदर्श और उन्नतीप्रवण समाजकी स्थिती-गती चित्रीत हुई है |

हमारे, धार्मिक उत्सव के रचनाकारोंने वेद, उपोनिषोद,  स्मृती, श्रुती, आरण्यके ब्राह्मण्यके जैसे ग्रंथ मानवी जीवनमुल्योंसे खचाखच भरे  हुए है | उसमे से एक महत्वपूर्ण  ' नारीयोंका सन्मान करना ' यह है | इस मुल्य के बारेमे एक श्लोक है,| वह निचे रखता हूँ -----
    यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवठत: |
  यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वस्वात्राफला: क्रिया: || 
(जिस घर मे आबालवृद्ध द्वारा नारियोंका उचीत सन्मान किया जाता है ऐसे घर मे देवता वास करते है | जिस घर मे उनका सन्मान नही होता है, वहाॅ दान, जप,तप,आदि क्रिया विफल होती है ) मनुऋषीने बताया यह तत्व भारतीय सुखी एवंम समृध्द जीवनका आधारसूत्र है | यही तत्व रामायण, महाभारत, भागवत आदि ग्रंथोंमे विवीध दृष्टान्त द्वारा पेश किया है |

लडकी- युवती हो, सौभाग्यवती- प्रौढा हो, या विधवा हो,  हमारी संस्कृतीमे नारीको  हर अवस्था मे वंदनिय माना जाता है | लेकीन माताका स्थान सर्वोच्च माना गया हे | महर्षी व्यास ने कहा है --
' पितृरप्याधिका माता गर्भधारणपौषणात्
अतो हि त्रिषु लोकेषु नास्ति मातृसमो गुरु: || 
( माताका स्थान  पिता से भी श्रेष्ठ है |  माता बाल-बालिका को गर्भ मे धारण करती है | जन्म होनेके बाद पालन - पोषण करती है | त्रिलोक मे ढुंडके भी माता से अधिक थोर नही दिखता है |)

नास्ति गंगासमं तीर्थ नास्ति विष्णुसम: प्रभु;
नास्ति शंभुसम: पूज्यो नास्ति मातृसमो गुरू: ||
(गंगा जैसा तीर्थ नही है, विष्णूसम प्रभू नही, महादेव जैसा वंदनिय नही, माता जैसा गुरू नही)

देवीयों और सज्जनो, महादेव जैसा वंदनिय नही ऐसे शंकर भगवान के घर मे माता की महत्ता की कल्पना देनेवाली कथा आप सभीको परिचित है | उमा-महेश्वर के दो पुत्र बाल गणेश और कार्तिक के बिच पृथ्वी प्रदक्षिणा की शर्यत मे हार-जीत का फैसला पार्वती देवी के पास जाता है तब माता-पिता को प्रशिक्षणा से बाल गणेश को विजयी घोषित किया गया | अंतिम निर्णय माताका !महाभारत मे ऐसा कहा है की भीम को भूख लगती और खाना तैयार नही हुआ तब उसकी माता कुंती ने  दिए चावल के चार  दानेसे पेट भरता था | बहुतांश थोर, पराक्रमी, पुरूषोंके यश के पिछे माताका आशिर्वाद तथा पत्नी का सहयोग होता है | इसिलीए माताको शक्तिपीठ और पत्नी को अर्धांगी माना जाता है | 

(इस लेख का भाग -२ निचे जोड दिया है | )
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      आपण व आपले उत्सव (भाग -२)

माता याने त्याग, तपस्या और निरपेक्ष सेवा ! माताकी वाणी, दृष्टी, और स्पर्श का अर्थ प्यार का निरंतर बहता प्रवाह ! प्रतिष्ठान नगरमें दो पडोसी महिला की एक कथा है | एक का नाम था अकुला और दुसरी का नाम था बकुला | बकुलाको पुत्रप्राप्ती हुई | अकुलाने एक दिन बकुलेके बच्चेकी चोरी कियी | मामला न्यायालया में गया |अकुला ने बहूत साक्षीपुरावे दिये | मामला उलझनकी संभवता नही दिख रही थी | तब न्यायाधिश गुस्सेमें आकर बोले ' ठिक है मैं इस बालक के दो समान टुकडे करके दोनोंको बांटता हूं | ' न्यायाधिश साहब ने हातमे कोयता लिया और बालक के टुकडे करनेका पावित्रा लिया, तब अकुला तुरन्त न्यायधिशके पास गयी, उनके चरण स्पर्श करके रोते रोते विनंती कियी, ' साहब बच्चेको अकुला को दिजीए, बच्चेकी हत्या मत करो |  वह बच्चा कहा भी रहे, पर सुखी रहें यही मेरी इच्छ है |' बकुलाकी बात सुनते ही  न्यायाधिशने मामला का निर्णय देकर बच्चा बकुला के हवाली किया | माताका अपने बच्चोंके प्रती प्यार का निरंतर बहता प्रवाह, बच्चों की सुरक्षितता की चिंता एवं ईश्वर की नियमीत आराधना और बच्चोंकी सुखी जीवन की आस अतुलनीय है | माता याने ईश्वरी कृपा, माता याने साक्षात उदारत! ! इसिलीए जगद्गुरू शंकराचार्यने 
बार बार कहा है -----
" कुपुत्रो जायते क्वचिदपी कुमाता नु भवती     
 ( इस जगत मे कुपुत्र निर्माण हौ सकते है | 
   पर कुमाता? कभी नही ) 

पुरुषार्थ इस शब्दका अर्थ सिर्फ पुरूषोंकी विशेषत: नही है | पुरूष यह एक मानव नामके प्राणी का एक लिंग (Gender ) है | कोई भी नारी पुरूषोंसे दुर्बल नही होती | स्त्री-पुरुषोंमे सिर्फ साम्य है यह बात पुर्ण नही है | स्त्री-पुरुषका का एकत्व निदर्शित करने वाले भगवान अर्धनारीनटेश्वर भारतीय जनजीवन का महत्वपूर्ण आधार है | इस आधार की पुष्टी हिंदू संस्कृतीके
ग्रंथोंमे इस तरहका है---
' स्वेच्छामय: स्वेच्छया च  द्विभार्या बभूव |
 स्त्रीरोग वामभागांशो दक्षिणांश: पुमान् स्मृत:||'
(वह स्वेच्छामय परमेश्वर सृष्टीका प्रारंभ मे खुद दो रुपमे प्रगट हुआ | परमेश्वर के वाम अंश को नारी और दाहे अंशको पुरूष  कहा गया है |') संत  ज्ञानेश्र्वर महाराज अपने 'अमृतानुभव' ग्रंथोंकी शुरूआत उपर के श्लोक की मराठी भाषामे इस तरह पेश कियी है -----
                ऐसी ही निरोपाके 
                जगाची जिथे जनके
                तिथे वंदिली मिया मूळिके 
                देवोदेवी||१||
                जया एकसत्तेचे बैसणे   
                दोघां एका प्रकाशाचे लेणे
                जे अनादि एकपणे
                 नांदती दोघे || ८ || 
(ही एकत्वाची भावना मनात रुजलेली असली म्हणजे द्वैत उत्पन्न होत नाही. द्वैत जर नाहिसे झाले तर आपोआप सगळी भांडणे निर्मूल  होतात.)

नारी बिना पुरुष का जीवन अधुरा और पुरुष बिना नारिका जीवन अधुरा रहता है | प्रपंच नामक रथ के प्रवास मे अर्धनारीनटेश्वर की प्रतिमा सदैव मनमे रखे तो रथमे ना दुरावा रहेगा ना घटस्पोट जैसा अपघात होगा | यह मेरा उपदेश ना समझे, यह मेरी राय है समझे ऐसी नम्र विनंती करके मै इस लेखकी अंतिम पॅरा आपके सामने रखता हूँ |

 " देवी और सज्जनों,  ' स्त्री को शक्तिपीठ और गुरू क्यों माना गया इस पर हमारी चर्चा हुई है | हमारी संस्कृतीका वैदिक कालसे आजतक के इतिहास पढे तो नारियोंकी तपस्या तथा रण मैदान पर का पराक्रम ऋषीमुनीयोंसे और क्षत्रियोंसे कम नही है | जीवन के हर क्षेत्रमे  देशका जो आजतक विकास हुआ है उसमें नारीयोंका योगदान भी पुरूषोंके योगदान से कम नही है | लेकीन यह सब बातें स्त्री-पुरुष समानता की है | इसपर स्वंतत्र लेख लिखा जायेगा | स्त्री और पुरूषोंकों हर क्षेत्रमे मिली सफलता के पिछे पिता-माता का श्रम और आशिर्वाद सदैव रहता 
है | यह सत्य है |हमारे हिंदू संस्कृतीके ग्रंथोंमे माताका स्थान पिता के स्थानसे उच्च है, यह तो त्रिकाल सत्य है |

मातृशक्ती की महत्ताकी अनुभूती  'शरीर-विज्ञान'  जिससे हमारे दैनंदिन जीवन का प्रवास होता है उससे आती है |  हर दिन, हर क्षण मे मातृशक्ती विविध रुपमें हमारे साथ रहती है जैसे की --- 
१) अन्नधान्य हमे जिससे मिलती है, वह धरणीमाता है | 
२) सुबहसे चहापान, नाश्ता, लंच, फिर नाश्ता बादमें डीनर अन्य पक्वान्ने यह चीजे अन्न के ग्रुपमें  है | अन्नधान्य से  खाना-प्येय, पक्वान्न माता बनाती है | उसे अन्नपुर्णादेवी माना जाता है | 
३)अन्न,नाश्ता, पक्वाने और पेय की टेस्ट, हमारी टंक से होती है दंतोसे नही |
४) हम बातें करते है, गीत-कविता गाते है वाणीसे| ५) हम बाते, वार्तीलाप, कलह, भाषण, प्रवचन, गीत-किर्तन-भजन सुनते है उसे श्रवणशक्ती कहते है |
६) जो बातें-वार्ता, कथा, ऐताहासिक-भौगोलिक एवं विज्ञान की जानकारी ग्रंथ-कितीबे, मासिक- साप्ताहिक मँगझिन, दैनिक वृत्तपत्रं जैसे माध्यमों से पढते है वह ऑखोंसें याने दृष्टीशक्तीसे है | 
७) एवं अपने परिसरसे लेकर दुनियामे होनेवाली घटनायें प्रत्यक्ष अपनी ऑखोंसे देखें याॅ टिव्ही माध्यमसे उसे भी दृष्टी कहते है |
८)इस ब्रम्हांडसे लेकर ईश्वर निर्मित पंचमहाभूते तथा मानव निर्मित चीजे, विविध प्रकारके यंत्र और तंत्र को हम देख पाते है वह दृष्टीसे !  
९) दृष्टीसे दृष्टिकोनका जन्म होता है, लेकीन हमारे शरीर मे जो कल्पनाशक्ती, मनशक्ती, बौद्धिक एवं शारिरीक आदि शक्तीयाॅ विराजमान है उससे दृष्टी को शक्ती प्राप्त होती है | 
१०) मानव निर्मित सभी  वस्तुयें कारागीर बनाते है उसे हम कारागिरोंकी कला मानते है, वह भी एक शक्ती है | वह शक्ती बहूरूपी है | 
११) अन्नधान्य के अलावा, धरणीमातासे खनिज,  सोना- चांदी का खजिना, विविध प्रकारके यंत्र,  उर्जा, रोड, ब्रीज, निवारा आदि की निर्मिती लिए मटेरिअल धरणीमाता से मिलता है | 
१२) दिक्षा, शिक्षा, पढाईमें पठणशक्तीके रुपमें  सरस्वतीमाता होती है | उससे ज्ञान नाम का फल प्राप्त होती है |
 १३) 'आलस्य कुतो विद्या, अविद्यासे कुतो धनं '
 श्रमशक्ती बिना धनशक्ती का दर्शन नही होता है | १४) घरणीमातासे अन्नपूर्णमाताको अन्न-प्रकिपा की शक्ती प्राप्ती होती है | अन्नपचनशक्तीसे हमे शारिरीक शक्ती प्राप्ती होती है | ' शरिर माध्यमं खलू घर्म साधनाम् ' (इसका अर्थ-- वास्तव्य में शरीर ही धर्म याने कर्तव्य और साधना को पुरा करनेका सबसे पहला साधन है | इसिलीए शरीरको सेहतमंत बनाये रखना जरुरी है | 
          ' पहला सुख निरोगी काया '
           ' करे योग रहे निरोग '

१५) शरीरशक्तीसे पराक्रमका जन्म होता है, उससे विजय नामका फल उगता है | शरीरशक्ती निती, सावधानता एवं चलाखिका अदभूत संगम है | देवोंको भी महिषासुर नामक असूर को नष्ट करनेके लिए दुर्गामाताकी सहायता मांगनी पडी | दुर्गामाता और महिषासुर के बीच नौ दिन भयानक युद्ध हुआ | आखीर दसवे दिन दुर्गामाता ने महिषासुर को नष्ट किया | नौ दिन पराक्रम का मधुर फल का नाम ' विजयादशमी उत्सव | ' 
१६) धनदेव कुबेर हो, लेकीन इसमें शक्ती महालक्ष्मी माता के रूपसे है | 

देवीयों और सज्जनों, आषाढ मासकी अमावास्याके दिन द्विपोत्सव मनाया जाता है | जैसे द्विप ज्ञानयोग, भक्तीयोग ओर कर्मयोग का प्रतिक है, उसी तरह 'माता '  महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का प्रतिक है | इसिलीए हर धार्मिकोत्सव तथा विवाह, व्रतबंध, गृहप्रवेश आदि धार्मिक विधी में देव-देवतांओंकी पुजा-अर्चा कें बाद पुष्पांजली और मंगलाष्टक में 
उमा-महेश्र्वरकी जय, राधा-दामोदरकी जय, लक्ष्मीनारायणकी जय, सियारामचंद्रकी जय ऐसे घोष वैदिक कालसे निरंतर शुरु है और सृष्टीका अंत तक शुरु रहेगा ऐसी भावना व्यक्त करके मैं विराम करता हूँ |
                    जय माता दी !



               
          
                 
                   



  

 

 

शुक्रवार, ४ सप्टेंबर, २०२६

आपण व आपले उत्सव -- रक्षाबंधन भाग १

       आपण व आपले उत्सव--- रक्षाबंथन 
                      (भाग १)

नमस्कार  मंडळीं,
वयोमानानुसार  तब्येतीच्या कुरबुरी सुरू होणे हे स्वाभाविक आहे. केस पांढरे होणे, दृष्टी कमी होणे, ऐकू कमी होत जाणे, सांधेदुखी सुरू होणे असे आजार साठी ओलांडल्यानंतर बहुतांश लोकांना होतात असे डॉक्टरांनीच सांगितले. त्यावर मी डॉक्टरांना म्हटले की 'हे सारे आजार एक प्रकारे आपला भार सांभाळणाऱ्या धरणीमातेकडे भरलेला कर आहे. ' यावर डॉक्टर हसत हसत म्हणाले  ' तुम्ही CAच्या भाषेत आजाराचे वर्णन केले .'  मंडळी, पैशाचे सोंग घेता येत नाही. तसेच निरोगीपणाचा आव आणू नये. डॉक्टरांच्या सल्ल्यानुसार पथ्यपाणी व औषध घेत राहिलो तर तब्येतीत सुधारणा होते हे मला अनुभवयास आले. जवळपास एक वर्षांनंतर ब्लॉगवर आपल्या भेटीस आलो आहे.  

सन २०१७ ला हिंदू नववर्ष प्रतिपदा गुढी पाडव्याच्या दिवशी  ' विचारमंथन ' ब्लॉगची मुहूर्तमेढ रोवली. ब्लॉगवर राजकीय घडामोडींवरील लेखांची संख्या थोड्या प्रमाणात अधिक असली तरी 'आपण व आपली दैवते',  'आपण व आपले उत्सव ', 'तस्मात उत्तीष्ठं कौन्तेय  युद्धाय कृतीनिश्चय:।'  'कर्मण्ये वाधिकारणास्ते मा फलेषु कदाचन |' 'सर्वात मौल्यवान शिक्षण कोणते?,  पर्यावरण,    
' चित्रपट व समाजमन '  सामाजिक व शैक्षणिक क्षेत्रातील विषयांवर ही लेख लिहले आहेत. आपणांस हे केवळ ठाउकच नव्हे तर अशा लेखांवर ही आपण माझे कौतुक  केले आहे. वस्तुत: मी लेखक नाही. आपल्या संस्कृतीच्या अभ्यासकांनी विविध विषयांवर लिहून  ठेवलेल्या पुस्तकांचा आधार घेत मी लिखाण करतो.  आपल्या सारख्या वाचकांच्या प्रतिसादांतून लेख  लिहण्याची इतकी प्रेरणा मिळत आहे की मी आपला सदैव ऋणी राहणार हे निश्चित. तोच माझा स्वर्गीय आनंद आहे .

रक्षाबंधन हा उत्सव अनादि  काळापासून  आपल्या देशात साजरा होत आहे. म्हणून  या उत्सवावर आपल्याशी संवाद करावा अशी प्रबळ इच्छा निर्माण झाली. म्हणून मी लेखणी हातात घेतली. सन २०२४ पर्यंत दर वर्षाला सरासरी लेखांची संख्या तीस ते पस्तीस होती. आता तितकी संख्या मी पार पाडू शकेन असे मला वाटत नाही. याची आपणांस  जाणीव आहे या बाबतीत माझ्या मनात शंका नाही.  
समर्थ रामदास स्वामींनी म्हटले आहे ' दिसमाजी काही तरी लिहावे. ' समर्थ रामदास स्वामींचे पुढचं वाक्य या ठिकाणी मांडण्पा इतकी क्षमता माझ्यात नाही.
 
लेखनासाठी विषयाचे विशेषत: राजकीय क्षेत्रात जगभर भरघोस पीक उगवत आहे. त्यासंबंधी आश्चर्य वाटत नाही. राजकारण एक असे क्षेत्र आहे की सकाळी माध्यमात जे पीक उगवते ते दुपारी कोमजून जाते आणि दूसरेच पीक उगवते. संध्याकाळ होताच दुपारचे पीक कोमजून जाते. कारण Throughout  the world politics has become a matter of perception and narrative only. त्यामुळे राजकीय क्षेत्रातील घडामोडीं संबंधित चर्चा, मुलाखती, लेख इत्यादींची सर्व प्रकाराच्या माध्यमांत प्रचंड गर्दी झालेली दिसते. गर्दीतून गोंधळ होत असतो. This is also one of the laws of Nature.  असे असले तरी ब्लॉगवर राजकीय लेख लिहणार आहे .

जवळपास एक वर्षभर दूर राहिल्याची खंत आहे, ती कमी करण्याची सुरवात रक्षाबंधन सारख्या पवित्र उत्सवा संबंधित लेखाने करावी अशी  इच्छा झाली. आपल्या संस्कृती मधील उत्सवांवर चर्चा, संवाद किंवा लेख इत्यादी उपचार उत्सवाच्या समाप्ती नंतर  करू नयेत असे बंधन नाही. हीच आपल्या संस्कृती ची महत्ता आहे.  मागे  नवरात्रोत्सव व विजयादशमी उत्सवा च्या समाप्ती नंतर मी  ' शक्ती उपासना ' या शिर्षकाचे  नऊ लेख ब्लॉगवर पब्लिश केले आहेत. आपल्या उत्सवातूनच आपल्याला उत्साह तसेच  बळ प्राप्त होत असते. आपल्या संस्कृतीचे व आपल्या देशाचे रक्षण करण्यासाठी समाजात एकोपा वाढला पाहीजे हीच विविध उत्सावातून शिकवण मिळत असते.

रक्षाबंथन या उत्सावाच्या नावातील रक्षा आणि बंधन या दोन शब्दांचा स्वतंत्र रित्या अभ्यास केल्यानंतर रक्षाबंधनाचा उत्सव भाऊ-बहिणी पुरता मर्यादीत नाही हे कळते. विद्यमान जागतिक राजकारण तसेच विदेशी शक्तीच्या आहारी गेलेल्या काही विरोधी पक्षांच्या नेत्यांना जडलेल्या अवदासा मुळे रक्षाबंधन उत्सवाची व्यापकता वाढविण्याचा प्रयत्न  देशाच्या कानाकोपऱ्यातून होणे आवश्यक झाले आहे.  सीमेवरून  होऊ शकणार्या धोक्यापासून  एक नागरिक म्हणून प्रत्येकाला सजग राहावे  लागेल. रक्षाबंधन उत्सव हा केवळ उत्सव नसून मानव म्हणून जो जन्म मिळाला आहे त्याची सार्थकता ठरावी ही शिकवण त्यातून मिळाते. आपला देश सुरक्षित राहीला तरच आपली संस्कृती टिकेल. संस्कृती टिकली तरच आपले उत्सव टिकतील.  

वाचकहो , रक्षाबंधन उत्सवाच्या एक दिवस अगोदर X वर भाजपाचे प्रकांड पंडीत श्रद्धेय डाॅ. सुधांशु त्रिवेदी यांनी संस्कृत श्लोकाने सुरवात करीत रक्षाबंधनाच्या दिलेल्या हार्दिक शुभेच्छा    वाचल्यानंतर माझा आत्मविश्वास वाढला. तसे पाहता सामान्यात: हार्दिक शुभेच्छाचं स्वरूपच गोड असते. असे असले तरी  X वरील डॉक्टर सुधांशु त्रिवेदी यांच्या हार्दिक शुभेच्छा वाचल्यानंतर आपल्या रक्षाबंधन उत्सवाची सुंदरता व व्यापकताचं विलोभनिय दर्शन झाले. म्हणून Xवरील त्यांच्या हार्दिक शुभेच्छा आपल्या समोर प्रथम ठेवत या लेखाची सुरुवात करतो.

" येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वाम् अभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चला॥"
(अर्थात जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र मैं तुम्हें बांधती हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा, हे रक्षा तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना।)
रक्षाबंधनके अवसरपर, रक्षासुत्र  बांधते समय बोला जानेवाला यह श्लोक याद दिलाता है की भारतिय  संस्कृतीमे असुर माने जानेवाले  राजा बलिमे यदि कोई गुण है तो उसका भी सन्मान और रक्षाबंधन किया जाता है | मुझे लगता है की इससे अधिक  उदार और  उदात्त  विचार पुरे विश्वमे देखनेको नही मिल सकता | If any so called self proclamaid liberal can find it in any other  culture ?  अत: हम सब आजके  इस पावन पर्व पर इस महान संस्कृती पर होनेवाले प्रत्यक्ष और वैचारिक दुष्प्राप्य के आकमण से रक्षा का संकल्प भी देना चाहिये | " डॉक्टर सुशांधु यांच्या हार्दिक शुभेच्छा आपल्या सर्वांना पसंत पडल्या असाव्यात या बाबत माझ्या मनात किंचीत ही शंका नाही. 

रक्षाबंधन उत्सवाच्या अनेक कथा आपल्या पुराणात आहेत. आपल्या समाजातील बहुतांश लोकांनी त्या कथा वाचल्या आहेत. माहिती आणि तंत्रज्ञान क्षेत्रातील प्रगतीमुळे आपल्याला 
यु ट्यूबवरील विडीओ द्वारे आपल्या बहुतांश उत्सवांची माहिती ऐकावयास मिळते. म्हणून या ठिकाणी फक्त भगवान श्रीविष्णू च्या वामन अवतार काळात घडलेली रक्षाबंधनाची कथा  थोडक्यात मांडतो.  

बळी राजा दानशूर  होता. इंद्रपद जिंकल्या इतकी ताकद त्याला मिळत गेली. त्यातुनच  देव व असुर यांच्यामध्ये  घनघोर युद्ध सुरु झाले होते. देव  पक्षाचा पराभव दिसू लागला, इंद्रदेवाचे आसन धोक्यात आले तेव्हा इंद्राच्या पत्नीने आपल्या पतीच्या उजव्या हाताच्या मनगटावर रक्षा सूत्र बांधले. येथूनच रक्षाबंधनाची सुरवात झाली आहे असे मानले जाते. 

वरील कथेतून हे स्पष्ट होते की राजेशाही राज्यव्यवस्थेत युद्ध- स्थितीत राजाचा विजय व्हावा म्हणून त्याच्या पत्नीने पतीच्या हाताला रक्षा सुत्र बांधण्याची रीत होती. राजाचा विजय म्हणजे राज्यातील प्रजेचं रक्षणच की !. आपल्या देशात सन १५३४-३५ च्या सुमारास गुजरातच्या सुलतान बहादूरशहाने प्रचंड सैन्यासह मेवाडच्या चित्तोडगडावर आकमण केले होते. तेव्हा राणी कर्णावतीने आपल्या राज्याच्या रक्षणासाठी      मोगल बादशहा  हुमायुनला भाऊ मानुन राखी पाठविली होती. हुमायुनने राणी कर्णावतीच्या  राणीचा आदर राखत आपले सैन्य पाठविले हौते. पण दुर्दैव असे की ते सैन्य मेवाडला पोहोचण्यास उशीर झाला होता. मेवाड राज्याचा पराभव झाला होता. पुढे हुमायुनने मेवाड जिंकून ते राज्य कर्णावतीच्या मुलाला बहाल केले. यातुन राखी ची म्हणजे रक्षा सुत्राचं पावित्र्य आणि बळाची प्रचिती येते.

बळी राजाचा प्रभाव तिन्ही लोकात वाढला होता.त्यामुळे असुरांनी थैमान घालण्याची सुरवात केली होती. हा प्रकार ऐकुन बळी राजाचे आजोबा भक्त प्रल्हाद नाराज झाले होतेच. देवांनी भगवान विष्णूला अवतार घेण्याची विनंती केली.  भगवान विष्णूनीं बटूचे रूप घेऊन बली राजाकडून तीन पावलांची भूमी मागितली.  बटूच्या दोन पावलात बळी राजाचे साम्राज्य संपले. बटूचे तिसरे पाऊल ठेवावयास जागा शिल्लक  राहिली नाही. बळी राजाने वामन देवास तिसरे पाऊल स्वत:च्या माथ्यावर ठेवण्याची विनंती केली. वामनाने तिसऱ्या पावलाने बळी राजा पातळात गेला. भगवान वामनाने बळी राजाच्या दानशूरतेचं कौतूक केले आणि  बळीराजाला त्रिलोक पैकी पाताळ लोक स्वाधीन केला. बळी राजाने वामनाकडून एक वचन मागितले होते. ते म्हणजे पाताळातील राजमहालाच्या द्वारावर भगवान वामनाने तिष्ठत राहावे. वामनाने ते मान्य करुन पाताळात बळीच्या दारात तिष्ठत राहिले. इथे वैकुंठात आपले पतीराज परत आले नाही म्हणून माता लक्ष्मीदेवी चिंतेत पडली. तिनेनारद मुनींना विचारले तेव्हा त्यांनी हकिकत सांगितली. नंतर महालक्ष्मी बळी राजाच्या घरी जाऊन बळीच्या उजव्या हाताच्या मनगटावर राखी बांधून आपल्या पतीला वैकुंठात घेऊन जाण्याची विनंती केली. ती बळीने मान्य केली. रक्षाबंधन उत्सवात पावित्र्य  किती अमर्याद आहे या कथेतून उमजते.
                   धन्यवाद!
( या लेखाचा भाग --२ सोबत जोडला आहे.)
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          आपण व आपले उत्सव 
               रक्षाबंधन (भाग -२) 

आपल्या ॠषीमुनींनी प्रत्येक उत्सावाचे  प्रयोजन अशा प्रकारे केले आहे की त्यातून आपला समाज प्रगतीपथावर राहावा, आपल्या जीवन मूल्यांचा  जगभर  प्रसार व्हावा आणि आपला देश विश्वगुरू राहावा    उत्सवांची रचना ऋतुनुसार आखली आहे. ऋतुनुसार आहार - विहार तसेच विविध  आजारांपासुन रक्षण व्हावे  म्हणून आयुर्वेद निर्माण करुन ठेवला आहे.

स्वाध्याय  परिवाराचे प्रणेते पुजनीय पांडुरंगशास्त्री आठवलेजींनी  संस्कृति - पुजन या ग्रंथात ' श्रावणी  पौर्णिमा ' वर केलेल्या व्याख्यान द्वारे रक्षाबंधन उत्सवाची महत्ता व पावित्र्य मांडले आहे ते आपल्या समोर सारांश रुपात ठेवतो आहे. 
" रक्षाबंधन म्हणजे प्रेम-बंधन. आजच्या दिवशी बहीण भावाच्या हातात राखी बांधते आणि त्याच बरोबर त्याला ह्रदयाच्या प्रेमाने बांधते आणि त्याच्या रक्षणाची कामना करते. हा उत्सव म्हणजे पराक्रम, प्रेम, संयम आणि भक्ती यांचा संगम होय. रक्षाबंधनाचा  उत्सव म्हणजे दृष्टि परिवर्तनाचा सण. बहिणीने हातात राखी बांधताच भावाचा दृष्टिकोन बदलून जातो. बहिणीच्या रक्षणाची जबाबदारी तो स्वत:वर घेतो. त्यामुळे बहीण समाजात निर्भय बनून फिरु शकते. "

राखी बांधण्यापुर्वी  बहिण भावाच्या कपाळाला टिळा लावते, तो टिळा म्हणजे  म्हणजे दोन डोळ्यां शिवाय भोगाला विसरुन  भाव-दृष्टिने जगाला पाहण्यासाठी  जणू तिसरा एक पवित्र डोळा होय. भावाच्या हातात रक्षा बांधून बहीण त्याच्या पासून केवळ स्वत:चे रक्षण इच्छिते असे नाही तर समस्त स्त्री जातीला स्वत:च्या भावाचे रक्षण मिळावे अशी करते.  त्याच बरोबर बाह्य शत्रूवर  व आंतरविकारांवर भावाने विजय मिळवावा ही भावना देखील त्यात सावरलेली आहे. "

स्त्रीकडे विकृत नजरेने न पाहता पवित्र दृष्टी  हा महान संदेश देणाऱ्या रक्षाबंधन उत्सव कुटुंबा पुरता मर्यादीत न राहता त्याचे सामाजीकरण होणे आवश्यक आहे. शक्ती उपासना या लेख मालिकेत जिहादी वृत्तीची टोळी प्रेमाचे नाटक करीत शालेय व महाविद्यालयीन मुलींना कसे आपल्या पाशात घेतात यावर  सविस्तर  माहिती मी मांडली आहे.  कुटुंब प्रमुखांनी आपआपल्या गावात, चाळीत, गृहसंस्थात सामुहिक रित्या जागरूक  राहून जिहादी वृत्तीच्या टोळीचा वावर आसपासच्या शाळा व महाविद्यालय परिसरात दिसला तर लागलीच छत्रपती शिवाजी महाराजांच्या गनिमी काव्याचा उपयोग करून त्या टोळीचा नायनाट करण्याची हिम्मत व शक्ती निर्माण करणे आवश्यक झाले आहे. त्यासाठीच  रक्षाबंधन उत्सवाची रचना ऋषिमुनींनी आखली आहे. समाजात हिम्मत व शक्तीची वृद्धी  सांघिकतातूनच होत असते .

वाचक मित्र हो, आपल्या उत्सवांच्या रचना व त्याच्या पाठीमागील प्रयोजनाचा थोडाफार अभ्यास केल्यानंतर उत्सवांची खोली थोडाफार प्रमाणात आपल्याला कळू शकते. मला रक्षाबंधन उत्सवा संबंधित जे थोडेफार आकलन झाले आहे ते सांगून या लेखाची समाप्ती करतो. 

" रक्षाबंधन ' या उत्सवाचं एक आगळं-वेगळं स्वरूप आहे असे मला वाटते. वैदिक काळात आपल्या देशातील राजे -महाराज आपआपल्या राज्यात अश्वमेध यज्ञ, होम, विविध शांती,   युवराजाचाा गुरुककुलात प्रवेश, पुढे 
राज्याभिषेक इत्यादी विधी पार पाडणारा पुरोहित विधीच्या आसनावर बसणाऱ्या यजमानांच्या उजव्या हातात रक्षा सुत्र बांधून विधीकार्याची सुरवात करीत असत. आजही आपण आपआपल्या कुटुंबात गृह प्रवेश, मुलगा-मुलीचा विवाह, बालकाचं बारसं, सत्यनारायणाची पूजा इत्यादी विधी यजमानाच्या उजव्या  हाताला 
रक्षा-सुत्र बांधल्या शिवाय सुरवात होत नाही. या सर्व प्रसंगी आपल्यातील चंचलता, क्रोध, मोह इत्यादींचा नाश होउन त्या जागी एकाग्रता, मृदुता  निर्मोह इत्यादींचा आधारवड आपल्याला मिळतो. 

आपल्या हातालाच राखी बांधली जाते याचे कारण आपला हात पुरूषार्थचे प्रतिक मानले जाते. सकाळी हाताचे दर्शन घेतो तेव्हा आपला पुरुषार्थ जागृत होतो. मी कुठलेही कठीण कार्य करु शकतो असा आत्मविश्वास बळावतो. तर सायंकाळी देवघरात दिवा लावतो. दिव्याची प्रार्थना करतो. अति आत्मविश्वास संकटात फेकुन देतो. दिवा विनम्रतेचं प्रतिक आहे. म्हणून आपणांस आपल्या पुरुषार्थ किंवा कठीण कार्यात मिळालेले यश  ईश्वराची कृपा असल्याची भावना आपल्या मनात जन्मत: रुजलेली असते ती दिवसेंदिवस वाढत असते असे मला वाटते. ' जसे आपल्या घरातील देवघरात सायंकाळी जो दिवा लावतो त्या दिव्याची ज्योत, तेल,आणि वात हे ज्ञानयोग, भक्तीयोग आणि कर्मयोग यांच्या  मधील  स्वरूप आहे, असे माझ्या वाचनात आले आहे. तसेच रक्षासुत्र म्हणा वा राखी त्यातील तीन धागे तिन्ही योगाचे प्रतिक असावे.
                     धन्यवाद !

   







































































सोमवार, १० फेब्रुवारी, २०२५

दिल्ली राज्य निवडणूक निकाल--केजरीवाल नावाचं काटेरी झुडपं भस्मसात ? (भाग -१)

गेल्या शनिवारी म्हणजे ८ फेब्रुवारी २०२५ या दिवशी दिल्ली विधानसभा निवडणूकांचा निकाल लागला. बहुतांश न्यूज चॅनेल्सनी मांडलेले भाकीत खरे ठरले. भाजपाच्या विजया संबंधीत भाजपाच्या समर्थकांना फारसे आश्चर्य वाटले नसावे. कारण असे आहे की लोकसभेच्या निवडणूकांच्या निकालातून घटलेल्या संसद सदस्यांच्या संख्यातून भारतीय जनता पक्षाला अतिआत्मविश्वासामूळे पराभव होऊ शकतो असा धडा मिळाला होता. त्यातून भाजप बरेच काही शिकला आहे. हरियाणा व महाराष्ट्राच्या विधानसभेच्या निवडणूकात ज्या पद्धतीने यश प्राप्त केले तशीच पद्धत दिल्ली विधानसभेच्या निवडणूकांच्या प्रचारात वापरली. राजकारणातील डावपेंच आखून ते पुर्णात्वास पोहचण्यासाठी भाजपाचे कार्यकर्ते विश्रांती न घेता अधिकाधिक मतदारांशी प्रत्यक्ष संपर्क व संवाद साधत असतात. सोबत मतदारांच्या समस्यांची कशी उकल करणार आहोत, याची अभ्यासपूर्ण  माहिती मतदारांकडे पोहचण्यासाठी केंद्र-राज्य स्तरावरील मंत्री, खासदार-आमदार व संघटन मंत्री सुद्धा थेट बूथ लेवलचे कार्यकर्त्यांना मदत करीत  असतात. यालाच संघपरिवार मध्ये जनजागरण म्हटले जाते. हरियाणा व महाराष्ट्र या दोन राज्यांतील विधानसभा निवडणूकात भाजपाला मिळालेल्या यशाचे गमक हेच होते. हे आपण बहुतांश न्यूज चॅनेल्सवरून ऐकले आहे. पण---

काही न्यूज चॅनेल्स जे इंडी नावाच्या आघाडीच्या नेत्यांची तसेच जागतिक लिबरल मंडळीची गुलामी स्विकारली आहे अशा चॅनेल्सवरून दिल्लीत भाजपाचा विजय होईल असे भाकीत ऐकावयास मिळाले नाही. उलटपक्षी भाजपाला निवडणूक आयोगाचा पाठींबा आहे, भाजपा विरोधी पक्षांच्या कार्यकर्त्यांना अमिष दाखवून त्यांचे पक्ष फोडतात, एवीएम मशीनची करामत, इत्यादी कारणें प्रचार काळातच म्हणजे मतदान दिवसाच्या अगोदरच मांडत असताना दिसले. आपला पराभव होणार असे स्पष्ट दिसत असताना भाजपाच्या संभाव्य विजयाबद्दल मतदारांची फसवणूक करण्यातच विरोधी पक्षांची नेते मंडळी व त्यांचे समर्थक मिडीया मंडळी रमत असते. दिल्ली विधानसभेच्या निवडणुकांचा निकाल लागल्यानंतर  वानखेडे, प्रसून वाजपेयी, रवीशकुमार इत्यादी संपादक मंडळीं 'आम आदमी पक्षच जिंकणार होता, भाजपाचा विजय काॅग्रेस मूळे झाला, एव्हीम मशीनची करामत ' इत्यादी मुद्दे विश्लेषणात मांडत आहेत. भाजपाचा विजय झाला की काॅग्रेसचा नैतिक विजय झाला अशी बडबड करण्याची टूम ही लिबरल लाॅबीने काढली आहे.  अशी टिका आता मतदारांच्या अंगवळणी झाली आहे. यावर उगीच चर्चा का करावी?

निकाल कुठल्याही निवडणूकातला असो, भारतिय जनता पार्टी केंद्रातील सत्तेचा गैरवापर कसे करते यासाठी खोट्या पुराव्यांची यादी सुद्धा विरोधी पक्षांकडे तयार असतेच. विरोधी पक्षांकडे भाजपा, संघ परिवार व सनातन संस्थावर सतत खालच्या पातळीवर टिका करीत राहणे ही एकच स्ट्रॅटेजी शिल्लक आहे. याच स्ट्रॅटेजीचा सततचा वापर लिबरल संपादक मंडळी, इंडी पक्षांची नेतेमंडळी, व विरोधी पक्षांचे समर्थक व कार्यकर्ते मिडीयातून करीत राहणार असेल तर देशातील प्रत्येक प्रान्तात भाजपाचे  प्रभूत्व वाढत राहील हेच आपल्या देशांतील निवडणूक निकालांच्या विश्लेषणातला केंद्र बिंदू राहील असे मला वाटते. 

विविध भाषा, विविध वेष, विविध आहार-विहार, विविध भौगोलिक वैशिष्ट्यांनी नटलेल्या या भारतभूमी चे हिंदू संस्कृतीमूळे एकतेचे जे विलोभनीय दर्शन होत असते त्याचा लाभ विरोधी पक्षांना ही होऊ शकतो. पण विरोधी पक्षांना भाजपा वर टिका करीत सनातन संस्कृतीवर हल्ला होत असतो याचे भान राहत नाही.  कदाचीत सनातन संस्कृतीच मोडीस निघावी हाच या मंडळीचा उद्देश असावा. या संबंधीत अलिकडील ताजे उदाहरण मी आपल्या समोर ठेवून या लेखाच्या समाप्तीकडे वळतो. 

प्रयाग येथील महाकुंभातून सनातन संस्कृतीतील एकात्मतेचे जे विलोभनीय दर्शन झाले त्या संबंधीत  विरोधी पक्षांनी व त्यांच्या समर्थक संपादक मंडळींनी फारसे कौतूक केले नाही. अंतःकरणात ओतप्रोत वाहात असलेल्या भक्तीभावाने महाकूंभात भक्तांची प्रचंड गर्दी झाली. ती गर्दी आटोक्यात न आल्यामूळे काही भाविक आपल्या प्राणास मूकले ही दुखःद घटना आहे. त्यासंबंधीत मी येथे प्रशासनाची पाठराखण करीत नाही. अशा प्रकाराच्या दुर्घटनेला जे कोणी प्रशासकीय अधिकारी जबाबदार असतील त्यांच्यावर कारवाई व्हावी आणि अशा घटना पुन्हा घडू नयेत अशी खबरदारी प्रशासनाने सतत घ्यावी असे माझे ठाम मत आहे. 

आजपावेतो वारकर्यांच्या दिंडीत,  प्रख्यात मंदिरातल्या महायात्रेत,  इतकेच नव्हे तर सिझन प्रमाणे होणार्या पर्यटन यात्रेत ही सामील न होणार्यांची संख्या ही मोठी असते. या पाठिमागील कारणें बहुतांशी व्यक्तीगत स्वरूपातली असतात. असे असले तरी यातील बहुतांश लोक यात्रा, दिंडी, वा महाकुंभासारखे नैमित्तिक उत्सवाचे लाईव प्रसारण हटकून पाहात असतात. दुसर्या बाजूला यात्रा, महोत्सव, दिंडी, या सार्या गोष्टी फाजील आहेत, त्यावर बंधने असावीत अशी धारणा व्यक्त करणार्यांची संख्या ही मोठी आहे. ही मंडळी मूलतः मेकाॅलेच्या शिक्षण पद्धतीतून तयार झालेल्या गुलामी मानसिकतेचे रूग्ण असावेत. यांचाच भरणा लिबरल नावाच्या मंडळीत असतो.

देव-देवतांच्या पालख्या, पदयात्रा, विख्यात मंदिरातील महोत्सवातून अनेक छोट्या-मोठ्या लोकांना रोजगार मिळत असतो, सरकारचा महसूल वाढतो. उद्योगजगताला गती प्राप्त होते हे सत्य प्रत्येकांने स्विकारावयास हवे. कारण One man's expenditure is another man's income हे अर्थशास्त्रातील मूळ तत्व आहे. शेवटी Economics is a science of human behaviour between scare means and unlimited wants.  ही विदेशी व्याख्या तरी लिबरल मंडळींनी ध्यानात ठेवावयास हवी की नाही ? मानवाचा व्यवहार हा मनाच्या चंचलता नावाच्या वैशिष्ट्यावर अवलंबून असतो. अर्थव्यवस्थेचा जन्मच या वैशिष्ट्यातून अस्तित्वात आला आहे. मानवी मनाची चंचलता अध्यात्मिक अनुष्ठानातून नियंत्रित राहते असे आधूनिक विज्ञानाने ही मान्य केले आहे. ही सनातन संस्कृतिची मानव जातीला मिळालेली देणगी आहे.

महाकुभांच्या महोत्सवात ज्या काही चूका घडल्या त्यावर मोदी व योगी सरकारवर विरोधी पक्षांनी टिका केली. त्याबाबत आक्षेप घेण्याचं कारण नाही. पण इंदिरा गांधीच्या हत्यानंतर दिल्लीत निर्दोष शीख बांधवांची काॅग्रेस कार्यकर्त्यांनी  निर्घूण हत्या केली होती, त्यावर तत्कालीन पंतप्रधान राजीव गांधीनी दिलेली प्रतिक्रीया काय होती याचे स्मरण विरोधी पक्षांच्या नेत्यांनी करावे. राजीव गांधीची प्रतिक्रिया 
' मोठा वृक्ष पडला तर त्याखालील छोटी मोठी झाडे मोडणारच ' ही होती. हा तर निर्लज्जपणाचा कळस होता. माजी पंतप्रधान श्रीमती इंदिरा गांधीची हत्या झाली तेव्हा त्यांच्या सरकारतले गृहखाते झोपले होते का,  हत्या व यात्रेत भगदड होऊन निष्पापाचे प्राण जाणे यात मूलभूत फरक आहे की नाही ? अशा प्रश्नांवर लिबरल मंडळी मौन पाळते. विरोधी पक्षांची मोदी सरकारवरील टिका ही विरोधी पक्षांची खोड आहे व तीचे स्वरूप सूंभ जळला तरी पीळ जात नाही असेच आहे. त्यामूळे त्यावर अधिक चर्चा करण्याची इथे गरज नाही. 

महाकूंभात जे भाविक सामिल झाले ते सारे भाविक स्वतःच्या खिशातील पैशातून. महाकुंभात स्नान करून घरी परतलेल्या अनेक भाविकांनी प्रयाग येथील सोयी-सुविधांची भरभरून स्तुती केली आहे. या उलट दर वर्षी साजरा होणार्या हज यात्रेत आपल्या देशातील मुस्लिम बांधव  केंद्र सरकारकडून आर्थिक मदत घेऊनच जात होते ना ! त्या हज यात्रेत ही प्रचंड गर्दीत मुस्लीम बांधवांनी प्राण गमाविले नव्हेत का ? यावर आपल्या येथील लिबरल मंडळींनी हज यात्राच्या आयोजकांवर टिका कधी केली आहे का? उत्तर नाही हेच होय. याबाबत धर्म न मानणार्या लिबरल मंडळींनी तरी आवाज उठवयाला हवा होता की नाही ? पण तसे ते करीत नाहीत. याचा अर्थ असा आहे की या मंडळींच्या दरबारात ख्रिस्ती व इस्लाम सारख्या एकेश्वरी धर्मातील लोकांच्या भावना पवित्र मानल्या जातात पण सनातन संस्कृतीत सारे काही अतार्किक व अंधश्रद्धां मानले जाते. कारण यांना सातासमुद्राच्या पलिकडील देशांकडून भरपूर पैसे मिळत असतात.

असा विषारी प्रचार जितक्या त्वेषाने जागतिक लिबरल मंडळी करीत असते त्याहून अधिक त्वेषाने आपले येथील विरोधी पक्ष व त्यांचे गल्लीबोळातील कार्यकर्ते करीत असतात. या लिबरल मंडळीत सर्वात मोठ्या शक्तीमध्ये चीन सरकारची मिडीया व अमेराकेतील जार्ज सोराॅस आणि तेथील एनजीओज् आहेत. अशा एनजीओज् मध्ये तेथील मिडीयाचा ही समावेश आहे. त्यांच्याच मदतीने जम्मू- काश्मीर पासून ते कन्याकुमारी पर्यंत, कच्छ ते ईशान्य भारताच्या टोकापर्यंत पर्यंत विरोधी पक्षांचे नेते-कार्यकर्ते सनातन संस्कृतीवर टिका करीत असतात. विरोधी पक्ष सनातन संस्कृतीवर जितकी अधिक टिका करेल तितकी त्यांची शक्ती क्षीण होत राहील असे मला वाटते.

वाचक मित्र हो, दिल्लीतील निवडणूकांच्या निकालाचे विश्लेषण करीत असताना महाकुंभातील घडलेली घटना व त्यासंबंधीत विरोधी पक्षांचे वर्तन व त्यांची वक्तव्ये यावर जी चर्चा मी केली ती औचीत्याला धरून नाही असे वाटू शकते पण तसे काही नाही. महाकुंभाचे छायाचित्रे, तसेच लाईव्ह प्रसारण, बातम्या व माहिती  इलेक्ट्रानिक्स मिडीया व वर्तमानपत्रासारखे प्रिन्ट मिडीया, युट्यब, वाॅट्सॲप सारख्या सोशल मिडीयावर ही घरी बसून आपण जशी पाहिली तशी दिल्लीतल्या मतदारांनी पाहिली आहे. दिल्लीत देशातल्या सर्व प्रान्तातले नागरिक राहतात. त्यांचे दूर वर असलेले नातेवाईक महाकुंभात सामिल झालेले असणारच. त्यांच्या द्वारें आयोजकांची स्तुती दिल्लीतील मतदारांनी ऐकली असणारच. महाकुंभाच्या पर्वावर दिल्लीतील बहुतांश मतदारांना उत्तर प्रदेश सरकार व केंद्र सरकार मधील उच्च श्रेणीच्या समन्वयाचे दर्शन घडले असणारच. त्यातून भले मिडीयात  याबाबत वाच्चता झाली नसली तरी भाजपाच्या पारड्यात थोडी-फार मते पडली असावीत असा माझा कयास आहे.

वाचक मित्र हो,  दिल्ली हे छोटे राज्य आहे. त्याला पूर्ण राज्याचा दर्जा मिळालेला नाही हे आपणास ठाऊक आहे. असे असले तरी दिल्लीतील विजयाने भाजपाचा देशभराच्या राजकारणावर तसेच आंतरराष्ट्रीय राजकारणावर प्रभाव वाढत जाणार असे मला वाटते. मी लेखाच्या  शिर्षकाच्या जोडीला ' केजरीवाल भस्मसात ' हे  पोटशिर्षक ठेवले. याचे कारण केजरीवाल हे जागतिक लिबरल लाॅबीने भारताच्या राजकारणात रूजविलेले भलं मोठं काटेरी झुडूपं आहे. त्यावरील चर्चा मोघम नसेल. कारण केजरीवाल हे नाव प्रातिनिधीक आहे. राहूल गांधी, कन्हैयाकुमार, स्टॅलीन, नक्षलवादी, दशहतवादी,  सारखी अनेक काटेरी झुडपें देशाच्या राजकीय पंटागंणावर विदेशी धनशक्तीच्या पांठीब्यातून रूजली आहेत. त्यावरील चर्चा वाढत जाणार आहे. त्यासंबंधीत वेळोवेळी चर्चा स्वतंत्र रित्या होत राहणार आहे. दिल्ली राज्यातील आप चा पराभव कसा झाला यावरील अनेक राजकीय अभ्यासकांनी मांडलेले विश्लेषण माध्यमाद्वारें आपण ऐकले आहे. त्यावर अधिक काही लिहण्यापेक्षा  या लेखाच्या भाग- २ मध्ये देशाच्या राजकीय पटांगणावर विदेशी शक्तीच्या साह्याने केजरीवाल नावाचे प्रचंड काटेरी झुडूपं कसे झटपट रूजले याचा शोध घेण्याचा प्रयत्न मी करू इच्छीतो. पण त्यासाठी त्या बाळाची (काटेरी झूडपाची) कुंडली  पाहावी लागेल. त्यातूनच त्याची वाढ आणि लयाची चिन्हे शोधता येतील असे मला वाटते. त्यावरील चर्चा  लेखाचा भाग-२ आपण करणार आहोत. म्हणून मी इथे थांबतो.                          धन्यवाद !
                                क्रमशः --

मंगळवार, ३ डिसेंबर, २०२४

महाराष्ट्र विधानसभा निवडणुका निकाल - अनाकलनीय की आकलनीय ? (भाग- ६)

आपल्या देशाच्या लोकशाहीला खरा धोका घराणेशाहीच्या पक्षांचा आहे. जागतिक लिबरल लाॅबीला आपल्या देशातले फक्त मोदी सरकार उलथावयाचे नसून  केंद्रस्थानी काँग्रेस म्हणजे गांधी घराण्याची सत्ता व सर्व राज्यांत प्रान्तिय पक्षाचे सुभेदार अशी मध्ययुगीन सरंजमशाही, म्हणजेच चीनी साम्राज्याची वसाहत भारतात स्थापन करावयाची आहे. अशा सरंजमशाही- घराणेशाही च्या विरोधात मतदारात जागृती होत आहे. याची चुणूक उत्तर कोकणातील वसई, नालासोपारा व पालघर मतदार संघात पाहायला मिळाली आहे. मला विशेष आनंद झाला. कारण वरील तिन्ही मतदार संघातील भाजपाचा विजय हा आमच्या तालूक्यातला म्हणजे वसई चा. आमच्या गावाचा म्हणजे नालासोपाराचा विजय आणि तिसरा पालघर मतदार संघाचा म्हणजे आमच्या जिल्ह्याचा. 

या तिन्ही मतदारसंघातील विजय अपूर्व आहे. हा विभाग माजी आमदार हितेंद्र ठाकूर यांच्या परिवाराचा बालकिल्ला. यंदा प्रथमच ठाकूर परिवाराचा पराभव झाल्यामूळे महाराष्ट्रात या विभागातील भाजपाचा विजय अनेक राजकीय अभ्यासकांचा चर्चेचा विषय झाला आहे.

नालासोपारा मतदारसंघातून निवडणून आलेले भाजपा उमेदवार आमच्या गावातले. आमच्या नाळा ग्रुप ग्रामपंचायत हद्दीत पढई नावाची छोटी वाडी आहे. जागृत दत्तमंदिरासाठी प्रसिद्ध आहे. मी प्राथमिक शाळेत असताना सन १९५८ ला तत्कालीन युवक कै भालचंद्र आप्पा म्हात्रे, कै वासुदेवदादा म्हात्रे, श्री बाळकृष्ण अण्णा नाईक  या त्रिमूतींने कै दामुआप्पा म्हात्रे, कै बबनतात्या म्हात्रे  श्री गजानन वामन म्हात्रे  इत्यादींच्या  सहकार्यातून राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाची शाखा सुरू केली. संघस्थान अर्थातच आमच्या गावातल्या पुर्वाश्रमींनी सन १९४९ ला बांधलेले प्रसिद्ध श्री दत्तमंदिर हेच आहे. तमाम गावकरी सध्या श्री दत्त जन्मोत्सव व  दत्तमंदिराच्या अमृत महोत्सवाच्या सोहळ्याच्या तयारीत आहेत. या आनंदाच्या सोहळ्यात राजन नाईक यांचा तसेच वसई व पालघर विधानसभा मतदारसंघातला भाजपाचा विजयाने आमचा आनंद द्विगुणीत केला आहे. 

राजन नाईक हे आमच्या गावातले. ज्यांनी शाखा सुरू केली अशा पाच-सहा युवकांपैकी श्री बाळकृष्ण नाईक हे राजन नाईक यांचे पिताश्री. राजन नाईक हे ही बालपणापासून संघ स्वयंसेवक आहेत. व्यवसाय निमित्ताने त्यांचा नालासोपारा येथील जनतेशी संपर्क झाला. ते यशस्वी व्यवसायिक व दिलदार समाजसेवक आहेत. त्यांचा नालासोपारात व्यवसाय असला तरी रात्री ते झोपायला पढई गावातल्या घरी येतात. 

सन १९६४ साली पंचक्रोशीतल्या समाजबांधवानी आपल्या देशाचे पहिले पंतप्रधान पंडीत जवाहरलाल नेहरू यांची शोकसभा घेऊन पहिल्या पंतप्रधानांना श्रद्धांजली वाहिली ती पढई वाडीतच. सन १९७७ च्या आणिबाणीच्या निषेधार्थ झालेल्या सत्याग्रहाचे नियोजन केंद्र आमचे गाव होते. श्री दत्तात्रेय म्हात्रे, श्री सदानंद म्हात्रे व अनंत म्हात्रे, या तिघानी सत्याग्रहात भाग घेतला होता. आजही ही पढई नावाची ही वाडी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद मुंबई चे अधिवेशन, पंचक्रोशीतले रेल्वे कर्माचार्यांचे संपकाळातले केंद्र स्थान, वसई तालुका स्तरावरील जनता पार्टीचे पहिल्या अधिवेशनाचे स्थळ, उत्तर मुबंईतले खासदार माजी रेल्वमंत्री व उत्तर प्रदेशचे राज्यपाल श्रीराम नाईक यांचे प्रचार-दरम्यान निवासाचे स्थान, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बोरीवली भाग सन १९९९ च्या वार्षिक नियोजन बैठकीचे स्थान, तसेच विविध सांस्कृतिक व सामाजिक कार्यक्रमाचे आयोजनाचे यजमान म्हणून पढई ओळख ठेवून आहे.  

राजकारणातल्या घराणेशाहीवर मी लेखाद्वारें टिका करीत असतो. घराणेशाही पक्षांच्या कार्यकर्त्यांना भाजपात काय होत आहे याकडेच अधिक लक्ष असते. ती एक खोड आहे. लोकसभेच्या निवडणूकात चांगले यश प्राप्त झाल्यामूळे बोरीवलीत काही ठिकाणी ' इथे माज उतरवला जातो ' असे बॅनर्स रस्त्यावर लावलेले दिसले होते. अशी कृत्यें करणे ही मविआच्या कार्यकर्त्यांची खोड झाली आहे. मविआंच्या कार्यकर्त्यांची  प्रत्यक्ष बूथ, वार्ड, व  वस्तीत जाऊन पक्ष बळकट करण्याची सवयच मोडली आहे. यांच्या पक्षात पक्षप्रमुख म्हणजे मालक व कार्यकर्ते म्हणजे मजूर. त्यामूळे वरून जे काही आदेश येतात ते निमूटपणे स्विकारतात. सोनिया गांधी व राहूल गांधीनी काँग्रेस पक्ष चीन देशाच्या गोठयात बांधून ठेवला आहे. उद्धव ठाकरेने बाळासाहेबांच्या शिवसेनेला मौल्लवींच्या चरणीं ठेवले आहे. शरद पवारांना आपल्या पक्षाचं काय करावयाचे आहे हेच कळेनासे झाले आहे. शेवटी शरद पवार आपल्या पक्षाला काँग्रेसच्या गोठ्यात ठेवतील असे दिसते.

या तिन्ही पक्षांचे कार्यकर्ते व समर्थक भाजपाच्या अंतर्गत काय चालत आहे यावर पोटतिडकीने हुज्जत घालत असतात. अर्थात स्वतःचा मेंदू गहाण ठेवलेल्या पक्षांच्या कार्यकर्त्यांशी  हूज्जत घालण्याने दोघांचा वेळ वाया जातो. उगीच वादविवाद करून ब्लडप्रेशर नावाच्या रोगाला का आमंत्रण द्यावे ? आमच्याकडे आदेश नसतो. असते ती फक्त आज्ञा.  संघाच्या दिक्षेतून मिळालेल्या प्रेरणेतून स्वयंसेवक  समाजोन्नतीच्या अनेक क्षेत्रात संस्था उभारतात. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ फक्त स्वयंसेवकांवर संस्कार करतो. स्वयंसेवकांचे कार्य हीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाची ओळख आहे. 

महाराष्ट्राच्या विधानसभा निवडणुका निमीत्ताने निवडणूक आयोग मतदारांसाठी अनेक सुविधा पुरवित आहे. हे प्रत्यक्ष पाहायला मिळाले. शंभर टक्के मतदानासाठी निव्वळ जाहिरात करून थांबत नाही. ज्यांना प्रकृती अस्वास्थ्याने मतदार केंद्रावर जाऊन मतदान करता येत नाही, त्यांच्यासाठी त्यांच्या घरी जाऊन गुप्तपणे मतदान करण्याची व्यवस्था निवडणूक आयोगाने केली आहे. टपाला मत पद्धतीत सुधारणामुळे मतदानाचा टक्का वाढत आहे. प्रत्येक पंचक्रोशीत मतदान केंद्राची संख्या, कर्मचारी, पोलीस दल, अधिकार्यांची संख्या वाढवित आहे. 

मतदान केंद्रावर जेष्ठ नागरिकांसाठी बसण्याची सोयी पुरवित आहे. त्यामुळे मतदान करण्यात अडचण येत नाही. उन्हाच्या तडाख्यात उभे राहावे लागू नये म्हणून मतदान केंद्र वाढवून केंद्रावर मंडप ही घातलेले दिसत आहेत. मतदान केंद्रांना शुभकार्याच्या मंडपाचे स्वरूप आलेले पाहावयास मिळत आहे. पाणी, व्हिलचेअरच्या खुर्च्या इत्यादी सुविधामूळे मतदान केंद्राना आधूनिकतेचं स्वरूप आले आहे. या सर्व गोष्टी प्रत्यक्ष पाहावयास मिळाल्या. प्रत्येक केंद्रावर झेपेल इतकेच मतदान संख्या ठेवली. त्यामूळे मतदान सुरळीत व जलद गतीने होत असल्याचा अनुभव मिळाला. पण--

पण मतदान जलद गतीने होत असल्यामूळे मतदान केंद्रावर गर्दी दिसत नव्हती. त्यामूळे राजकीय पक्षांच्या निरीक्षकांना ही मतदान कमी होत आहे असे वाटत होते. शेवटी मतदान केंद्रातील टक्केवारी पोलिंग एजंट कडून कळली तेव्हा राजकीय पक्षांच्या विशेषतः महायुतीच्या कार्यकर्त्याना हायसे वाटले. निवडणूक आयोगावर टिका करणार्यांनी प्रथम निवडणूक आयोग पुरवित असलेल्या सोयी पाहाव्यात. उगीच मोर्चा, घेराव करण्याच्या भानगडीत विरोधी पक्षांची स्थिती आणखिन खालावत जाईल असे मला वाटते. राहीला प्रश्न विरोधी पक्ष कमकुवत होत गेले तर देशाची लोकशाही संपुष्टात येईल अशी जी  भिती दाखवून विरोधी पक्ष व त्यांचे समर्थक मिडीया हाऊसेस मतें मागत आहेत, त्यावरील चर्चा निरर्थक आहे. कारण विरोधी पक्षांकडे भाजपा सरकारावर टिका करण्याचा राजकीय मुद्दाच राहीला नाही हे मतदारांना ठाऊक झाले आहे. या शिवाय या तथाकथित सेक्युलर व घराणेशाही पक्षांची दुकाने बंद झाली तरी अनेक आक्रमणें होऊन जी सनातन संस्कृती आज ही सुस्थितीत आहे, तीला जराही धक्का लागणार नाही. उलट आपला देश अधिकाधिक प्रगत व  सशक्त होत जाणार आहे अशी खात्री बहुतांश मतदारांना वाटत आहे.



महाराष्ट्र विधानसभा निवडणुका निकाल - अनाकलनीय की आकलनीय ? (भाग --५)

 इंडी आघाडी व मविआ चे राजकारण इतक्या सूड भावनेने प्रेरीत आहे की ही सूडभावना त्यांच्या कार्यकर्त्यात सुद्धा शिरली आहे. याचा अनुभव मला आला आहे. मी आनंदराव पवार सरस्वती विद्यालयाची (वझिरा बोरीवली(प)  सचीव पदाची जबाबदारी सांभाळतो आहे. या खेपेस प्रथमच आनंदराव पवार शाळा हे मतदान केंद्र झाले होते. त्यामुळे  आपल्या केंद्रात शंभर टक्के मतदान व्हावे ही इच्छा प्रबळ झाली. तसे पाहता मतदाता जागृती अभियानात मी पहिल्यादांचा भाग घेतो असे नाही. वझिरात जनजागरणाच्या कार्यक्रमात भाग घेण्याची ही चौथी खेप आहे.   या अभियानात माझ्या सोबत आणखिन तिघेजण होते. त्यापैकी एक कार्यकर्ता ज्या सहकारी सोसायटीत राहतो तिथे आम्ही दोघांनीच अभियानाची जबाबदारी स्विकारली. बाकी दोघांना दुसर्या सोसायटीत जावयास सांगितले.


आम्ही दोघजण सोसायटीच्या तळमजल्याच्या पॅसेज मध्ये होतो तेव्हा त्या सोसायटीचा एक सदस्य भेटला. त्या सदस्याशी सोबतच्या कार्यकर्त्याने माझी ओळख करून दिली. मतदाता जागृती अभियाना साठी आनंदराव पवार शाळेचा सेक्रेटरी म्हणून मी आलो आहे अशी ओळख झाली. त्यावरून मी संघाचा स्वयंसेवक आहे हे त्या गृहस्थाच्या लक्षात आले. त्यांनी मला विचारले, 'काय हो तुम्ही बोरीवली मतदार संघात बाहेरील उमेदवार का 
आणला ?'  मी उत्तर दिले  'मला याबाबतचे फारसे काही माहिती नाही.' त्या गृहस्थाने म्हटले, बोरीवलीतल्या कार्यकर्त्यावर नेहमी बाहेरचा उमेदवार लादला जातो हे चूकीचे आहे ना? असा प्रश्न विचारला. मी उत्तर दिले, ' तुमचं म्हणणं बरोबर आहे . पण राजकारण आपल्या हातात नसते.' त्यावर ते गृहस्थ म्हणाले  'सर्व बाबीत केंद्रातून आदेश येतो तो तुम्ही का स्विकारता?  मी उत्तर दिले  ' आपण बरे आपले काम बरे ! वादविवाद करण्यासाठी आम्ही आलेलो नाही '  असे म्हणून मी शेवटी त्यांना सौम्य भाषेत म्हटले, " मला एका प्रश्नाचं उत्तर हवं आहे. तो प्रश्न असा आहे, उद्धव ठाकरे म्हणतात की बंद खोलीत अमित शहा यांनी शिवसेनेला मुख्यमंत्रीपद द्यावयाचे कबूल केले होते. ते दिले नाही म्हणून आम्ही भाजपाला धडा दिला. पुरावा देण्याची जबाबदारी तक्रार करण्यार्ची असते. पुरावा नसताना काही तरी आरोप करणे हेच मूळी संघर्षाचे कारण असते. अमित शहा किमान मातोश्री वर आले होते. आघाडीच्या बैठकांसाठी जनाब ठाकरे स्वतः कसे गेले दिल्लीला? " यावर ते गृहस्थ हसले आणि म्हणाले मी श्रीराम जन्मभूमी श्रीराम मंदिर च्या निधी संकलनात भाग घेऊन सोसायटीतून पन्नास हजाराहून अधिक निधी गोळा करून दिला आहे. ते गृहस्थ माझ्या पेक्षा धाकटे असल्याने मी त्यांच्या पाठीवर शाबासकीची थाप मारली. नंतर ते बाहेर गेले. 

आम्ही दोघे लिफ्टमधून शेवटच्या मजल्यावर गेलो. त्या सोसायटीतले अभियान संपवून नंतर आम्ही दुसरी कडे गेलो. ते गृहस्थ मविआ च्या घटक पक्षाचे कार्यकर्ते आहेत की नाही  आम्ही विचारपूस केली नाही. पण सोशल मिडीया असो वा सामाजिक समारंभात, अथवा बस व रेल्वे स्थानक, बागबगीचा, बाजार इत्यादी स्थानी राजकारणावर नको तितकी चर्चा होते आणि त्यातून वादविवाद विकोपाला जातात हे अलिकडे नित्याचे झाले आहे. यावर मी एका लेखात माझे मत सविस्तर मांडले आहे.

वरील अनुभव मी येथे शेअर केला याचे कारण मविआच्या घटक पक्षातल्या कार्यकर्त्यांना जागोजागी हुज्जत घालण्याची सवय जडली आहे. अशा हुल्लडबाजीचे जनकत्व राष्ट्रीय स्तरावर सोनिया गांधी व ममता बॅनर्जी व महाराष्ट्रातील मविआ त्यात ही विशेषतः उद्धव ठाकरे व जितेंद्र आव्हाड. थोडक्यात घराणेशाही पक्षच राजकारणाचा पोत खाली आणण्यास जबाबदार आहेत.  ' यथा राजा तथा प्रजा ' हा नियम घराणेशाही पक्षात आज ही अस्तित्वात आहे. आपल्या येथील घराणेशाही पक्षांतील युवराजांचे वर्तन राजेशाही व हुकूमशाही सारखे असते. मग त्या पक्षांचे कार्यकर्ते उर्मठच बनणार ना ! चीनशी काँग्रेस पक्षाने करार केला आहे खरा पण त्या चीन मध्ये लोकशाही नाहीच. मग घराणेशाही तरी कशी येणार चीन मध्ये ? विद्यमान राष्ट्राध्यक्षांच्या कुटुंबातील सदस्य राष्ट्राध्यक्ष होणारा नसतो. कारण साम्यवादी पक्षाच्या राजवटीत हूकुमशाही असते व तीच पक्षाचं सर्वोच्च कार्यकारिणी असते.

आपल्या येथील घराणेशाही पक्षांना मग ते उत्तरेतील असो वा दक्षिणेतील, पश्चीमेकडील असो वा पुर्वेकडील, त्यांच्या वारसांचा जम बसावा म्हणूनच संसदीय लोकशाही प्रणाली हवी असते. कारण त्यातूनच पक्षाचा ताबा मिळतो. एकदा की पक्षाचा ताबा मिळविला की संसद, विधानसभा आपोआप ताब्यात येतात. कारण बापजाद्यांनी लुटलेली प्रचंड माया असते ती वारस हक्काने मिळतेच ना ! ती माया एकप्रकारे आपल्या घराण्यातील पुढच्या पिढींना राजकीय क्षेत्रात करिअर साठी केलेली सुलभ सोय होय.  शेवटी राजकारण सुद्धा  जिथे ' दाम करी काम ! ' असेच एक क्षेत्र आहे.
                         
क्रमशः

महाराष्ट्र विधानसभा निवडणुका निकाल - अनाकलनीय की आकलनीय ? (भाग --४)

गेल्या ५ वर्षात महाराष्ट्रातील राजकारणावर मी ३८ लेख पब्लीश केले आहेत. या शिवाय 'केंद्र-राज्य संघर्ष - महाराष्ट्र ते दिल्ली व्हाया बंगाल' ' या लेखमालेतही महाराष्ट्रातील राजकारणावर चर्चा मांडली आहे. ' शिवसेनेतील फूट की काळाने शिवसेनेवर उगारलेला सूड ?' 'उद्धव ठाकरे खलनायक ठरत आहेत का?' ' शिवसेनाने गमाविलेल्या संधी, ' ' शरद पवार ना चाणक्य ना वारकरी फक्त संधीसाधू राजकारणी, 'राष्ट्रवादी काँग्रेस मध्ये फूट आणि घराणेशाही पक्षांची पडझड , सरकारचे डोके ठिकाणावर आहे का , इत्यादी शिर्षकाचे लेख त्या ३८ लेखात आहेत. तसेच ' राजकीय पक्षांच्या दिशा व दशा ' या शिर्षकाची राष्ट्रीय तसेच प्रान्तीय पक्षांची वर्तमान व भविष्याची स्थिती ती राज्यनिहाय एक  लेखमाला ही पब्लीश केली आहे. त्यामूळे मागील दोन तीन महिन्यात राजकारणावर अधिक काही लिहावे असे मला वाटले नाही. म्हणून मी  राजकीय लेख लिहणे थांबविले होते. 

मविआचा धुव्वा का उडाला याची  छोटी-मोठी अनेक कारणें आहेत ती माझ्या कुवतीनुसार आपल्या समोर ठेवावीत म्हणून मी लेखमालिका लिहावयास घेतली. त्यातील काही कारणें अशी आहेत की ते पुढील    २० ते २५ वर्षे मविआ व इतर विरोधी पक्षांचा पिच्छा सोडणार नाहीत. ती महत्वाची अशी आहेत-

१) माजी केंद्रीय मंत्री व काँग्रेसचे नेते पी चिंदबरम यानी भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाच्या कार्यपद्धतीवर खोट-नाटं व सर्वात गंभीर असे भगवा दशहतवादाचे नॅरेटिव्ह तयार करून युपीए सरकारच्या काळात सनातन साधु-संताचा केलेला छळ मतदार विसरले नाहीत. 

२)युपीएच्या राजवटीत (सन २००४ ते २०१३ मध्ये) न भूतो न भविष्य असा झालेला प्रचंड भ्रष्टाचार मतदारांच्या स्मरणात आज ही आहे. 

३) उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री असते वेळी पोलीस यंत्रणेचा उपयोग पत्रकार- संपादकांना फरफटत कस्टडीत ठेवणे, रहस्यमय हत्या घडविणे व अशा हत्या नैसर्गिक मृत्यु दाखविण्याचा सपाटा, भ्रष्टाचार,  सर्वत्र १४४ कलम लावले असताना कोरोना च्या साथीत पालघरला जमावाने केलेल्या दोन साधुंच्या निर्घूण हत्या 

४)कोरोनो काळात औषधोपचार मध्ये झालेला भ्रष्टाचार तसेच छोटे-मोठ्या घटनांवर पडदा घालणे इत्यादी  पापकृत्यांनी भरलेला उद्धव ठाकरे सरकारचा कारभार हे एक गंभीर कारण लोकांच्या स्मरणात होते. 

५) सोनिया गांधींनी नरेंद्र मोदींवर भर सभेत  'मोतका सौदागर' असे म्हणत  देशातील राजकारणाला दिलेले सुडाचे स्वरूप.  

६) सोनिया गांधीचे युवराज राहूल गांधी, केंद्र सरकार, पंतप्रधान नरेंद्र मोदी, भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व स्वातंत्र्यवीर सावरकर इत्यादींवर  जाहीर सभेत फार जहरी भाषेत टिका करीत असतात. राहूल गांधी फक्त आपल्या देशात नव्हे तर इतर देशात जातात तेव्हा ही आपल्या देशाच्या प्रत्येक व्यवस्थेवर निरंतर टिका करीत असतात. हा शहाणपणा नाही आणि बालीशपणा ही नाही. त्यांचे मानसिक संतुलन वेळोवेळी ढासळते की काय अशी शंका येते. 

सूड भावना ही एक प्रकारे अजगरासारखा विळखा घालून आपल्याला कमकुवत करत असते याचे भान राजकीय नेत्यांनी विशेषतः राहूल गांधी, उद्धव ठाकरे, नाना पाटोळे, ममता बॅनर्जी, अखिलेश यादव, स्टॅलीन, अरविंद केजरीवाल, आणि डाव्या पक्षांचे नेते व कार्यकर्ते (जे नक्षलवाद्यांना पाठींबा देतात)  ठेवावयास हवे.अन्यथा राजकीय नेत्यांची आचार विचार आणि निर्णय घेण्याच्या ज्या शक्ती देहात विराजमान आहेत त्या सैरभैर होण्याची शक्यता असते. अशा स्थितीतून अराचजकतेचा जन्म होतो. असे जागतिक इतिहास सांगतो. काही इतिहास तज्ञ, राजकीय व सामाजिक अभ्यासक व चिंतनकार आपल्याला इशारावजा सल्ला देत असतात,  ते चूकीचे नाही.

आपला महाराष्ट्र  'पुरोगामी विचाराचा, सर्वधर्मसमभाव बाळगणारा, शाहू फूले, आणि आंबेडकरांचा ' असा सततचा घोष करणारी मंडळीच महाराष्ट्रात जातीवादाचे  व मुस्लीमाचे तुष्टीकरण करण्यात गुंतले आहेत. सापाला दुध दिले तरी तो विषच ओकतो. असा अनुभव देशाच्या फाळणीतून आपण घेतला आहे. सर्वसमावेशकता अंगी बाळगणे निश्चीतच चांगली गोष्ट आहे पण अल्पसंख्याकांचे लाड करून त्यांना डोक्यावर बसविण्याची हाव जी विरोधी पक्षांना लागली आहे, ती देशाच्या सार्वभौमत्वाला धोका निर्माण करेल असे बहुसंख्यांक हिंदु समाजाला आता वाटू लागले आहे. हेच कारण आहे ज्यामूळे महाराष्ट्रातील विधानसभा निवडणूकाचा निकाल अनाकलनीय आला असावा असे मला वाटते. असेच मत मी, ' त्रिपूरा येथे अफवा आणि धुडघूस महाराष्ट्रात कसा ? ' या शिर्षकाचे २१ नोव्हेंबर २०२१ला पब्लीश केलेल्या दोन लेखात वाचावयास मिळेल. 

महाराष्ट्रात उद्धव ठाकरे व संजय राऊत यांनी  महाराष्ट्रातील राजकारण खालच्या पातळीवर आणून ठेवले आहे. अखिल भारतीय स्तरावर सोनिया गांधी व राहूल गांधी या जोडीने काँग्रेसची स्थिती खिळखीळी करून ठेवली आहे. महाराष्ट्रात सन २०१४ ला केंद्रात भाजपा प्रणित एनडीए सरकार अस्तित्वात आल्यापासून विरोधी पक्ष सैरभैर झालेले दिसतात. त्यामूळे ॲक्सीस इंडीया या संस्थेने महायुतीला महाराष्ट्रात १७५ पर्यंत जागा मिळतील असे जे भाष्य केले होते त्यावर लिबरल मंडळीनी दुर्लक्ष केलेले दिसले. ॲक्सीस इंडीया संस्थेने एकूण ७५ ओपिनीयन पोल केले आहेत. त्यापैकी ७० पोल खरे ठरले आहेत. याकडे दुर्लक्ष करून मविआ आता आंदोलनजिवीच्या मार्गावरून जाऊ इच्छीते. काय म्हणावे ? कुत्र्याचं शेपुट नळीत घातले तरी शेवटी वाकडेच राहते. 

महाराष्ट्रत प्रथमच एकतर्फी मतदान झालेले दिसले अशी सबब मांडून विरोधी पक्ष चुनाव आयोगाच्या विरोधात मोर्चा, धरणे इत्यादी नाटकं करण्याचे सत्र सुरू केले, तरीही हाती काही यश येणार नाही. उलट न्यायालय मविआवर ताशोरे ओढतील. सामान्य मतदारांना ही ठाऊक झाले आहे की विरोधी पक्षांचे मोर्चे विदेशी शक्तीच्या साह्याने देशात अस्थिरता निर्माण व्हावी हाच हेतू असतो. मराठा आरक्षण, संविधान बचाव, किसान आंदोलन, वल्फ बोर्ड च्या मोहीम, गणेश व नवरात्र या दोन महोत्सवात मुस्लीम समाजाची दादागिरीने अडथळे आणणे, लव जिहाद, आतंकवादी घटना यांच्या पाठीमागे देशविदेशी लिबरल लाॅबीच आहे.

मुस्लीम समाजाचे तुष्टीकरण कागोदपत्री स्वरूपात मौल्लवी कडे सुपूर्त करण्यापर्यंत मविआ ची मजल पोहचली. मग 'सजग रहो', सौ टक्का मतदान करो, बटोंगे तो कटोंगे, एक है तो सेफ है इत्यादी प्रतिक्रीया येणे हे स्वाभाविक आहे. सन १९८८-८९ च्या दरम्यान काँग्रेसचे वरीष्ठ व विद्वान नेते बॅ गाडगिळांनी काँग्रेसला हिंदू हिताकडे दुर्लक्ष करणे महाग पडेल असा इशारा दिला होता. पण काँग्रेसने दुर्लक्ष केले. काल-परवा माजी केंद्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे यांनी सुद्धा भगवा दशहतवादाचे खोटे नॅरेटिव्ह काँग्रेसने करावयास नको होते असे स्पष्टपणे म्हटले आहे.

क्रमशः-

महाराष्ट्र विधानसभा निवडणुका निकाल - अनाकलनीय की आकलनीय ? (भाग -- ३)

संघ, भाजपा, पंतप्रधान नरेंद्र मोदी व निवडणूक आयोगावर दोष ठेवून काय साध्य होणार आहे ? सन २०१४ पासून लिबरल पत्रकार व राजकीय अभ्यासक सतत विदेशी धनशक्तीच्या साह्याने नेगेटिव्ह नॅरेशनाच्या आधारे विरोधी पक्षांना आधार देत आहेत.  असा आधार म्हणजे वजन वाढविण्यासाठी एखाद्या पेंशटला औषधें दिल्यासारखे आहे. त्यातून वजन वाढते पण त्यातून तो पेंशट  बलवान व शक्तीवान होतोच असे नाही ? पण मविआच्या नेतेमंडळींनी तो पेंशट वृद्ध होत नाही असा समज करून घेतला. ही एक प्रकारे राजकीय क्षेत्रातली अंधश्रद्धा ठरली. आश्चर्य असे की तथाकथित पुरोगामी, उदारमतवादी व अंधश्रद्धा निर्मुलनाचे शिल्पकारांची ही स्थिती  ! लोका सांगे ब्रह्मज्ञान आपण मात्र कोरडे पाषाण !

गेल्या लोकसभेच्या निवडणूकाच्या प्रचारात ' संविधान बचाओ ' असे नेगेटिव्ह नॅरेशनचा वापर करून दलीत, पिडीत मतदारांत संभ्रम झाला पण तो तात्पुरता टिकला.भाजपाचे संसदेतील संख्याबळ कमी झाले पण तेच नॅरेटिव्ह राज्यातील विधानसभा निवडणूकात उपयोगी पडेल अशी भ्रामक समजूत मविआने करून घेतली. हे ही एक महत्वाचे कारण आहे की ज्यामूळे अनाकलनीय असा निकाल  लागला. महायुतीचा विजय व मविआचा पराभव होईल असे दिसत होतेच. मविआचा दारूण पराभव झाला एवढाच भाग काय तो आश्चर्यचा, नवलाचा व अनाकलनीय स्वरूपाचा आहे. 

या व्यतीरिक्त इथे आणखिन एक मुद्दा मी मांडतो आहे जो हरियाणात आणि महाराष्ट्रात काँग्रेस प्रणित आघाडी ला महाग पडला. राहूल गांधीनी लोकसभेच्या निवडणूक प्रचारात  संविधान नष्ट होईल म्हणून भाजपाला मत देऊ नका असे जे विधान केले होते , त्यात काही दम नव्हता. ते एक खोटं नॅरेटिव्ह होते हे लोकांना कळून आले. संसंदेच्या अधिवेशनात भाजपाचे तडफदार युवक खासदार अनुराग ठाकूर यांनी राहूल गांधीकडे नजर ठेवून ' भारतिय संविधान के कितने पृष्ठ है यह तो आप प्रथम बताये ?' असा प्रश्न भरगच्च खासदारांच्या उपस्थित संसंदेत विचारला तेव्हा राहूल गांधीना नानी आठवली असेल इतकी फजिती झालेली लोकांनी टिव्ही वरून पाहिलेली होती. म्हणे हे भारताचे भावी पंतप्रधान !

उबाठा च्या कार्यकर्त्यांना बोरीवली मतदार संघात भाजपाने बाहेरच्या उमेदवारांला का तिकीट दिले यावर हुज्जत घालावीसी वाटली पण  इटालीयन सोनीया गांधीना काँग्रेसचे अध्यक्षपद का दिले, राजकारणाची जरा ही जाण नसलेल्या राहूल गांधीना काँग्रेसचे सर्वसर्वा केल्याबद्दल जाब विचारतात का?  उबाठा सेनेचे प्रमूख उद्धव ठाकरे राहूल गांधी आणि सोनिया गांधीना वाकून नमस्कार करताना पाहतात तेव्हा ठाकरें चा राग का येत नाही ? स्व बाळासाहेब ठाकरे हिंदु हृदयसम्राट होते असे राहूल गांधी मानावयास तयार आहेत का असा प्रश्न पंतप्रधान नरेंद्र मोदीनी जेव्हा जाहिरसभेत समोर ठेवला, त्यावर राहूल गांधीनी का उत्तर दिलेलं नाही. ते बाजूला ठेवू. पण उद्धव ठाकरेंचे भक्त काय करीत होते ? जे स्वतःला मर्द समजून घेत आहेत ते चूप का राहीले ? धिक्कार असो तुमच्या मर्दपणाचा व फुसक्या दादागिरीचा !

महाराष्ट्रातील मतदारांनी विधानसभा निवडणूका होण्याअगोदर संसंदेच्या अधिविशेनात भाजपाच्या अनुराग ठाकूर यांनी राहूल गांधीचा आवाज बंद केलेला पाहिला. शरद पवारांनी उद्धव ठाकरेंना खोलीतून बाहेर काढले होते, तेही विडीओतून पाहिले. आम्ही वाकणार नाही अशा फुसक्या गर्जना हवेतच विरल्या. अशा छोट्या छोट्या पण महत्वाच्या घटनातून ही मतदार कोणाला मत द्यावयाचे हे ठरवित असतो.

एकंदरीत जे अनाकालनीय घडले असे आपल्याला वाटते ते होणार होतेच. ते अटळ होते. ' करावे तसे भरावे ' हा निसर्गाचा नियम आहे. जेव्हा अनाकालनीयय घटना घडते व ती आपल्या विरोधात होते, तेव्हा त्यातील सत्याचा शोध घेण्याचा प्रयत्न करणे क्रमप्राप्त असते. पण मविआ चे नेते मंडळी एवीएम मशीनवर पर्यायाने केंद्र सरकार वर टिका करीत आहेत. म्हणे, भाजपा सरकार एवीएम मशीन मध्ये काहीतरी गडबड करून ठेवते आहे. हे विरोधी पक्षांचे रडगाणं न्यायालयाने या अगोदर फेटाळून लावलेले आहेच. अन्याय करणार्या, धातांत खोटे बोलण्यार्यांना सहानुभूती कधी मिळत नसते. उलट अशांचे पाय चिखलात आणखिन रूतत जातात व सर्वनाश होतो. मग ते क्षेत्र कुठलेही असो.

क्रमशः--

महाराष्ट्र विधानसभा निवडणूकांचा निकाल अनाकलनीय की आकलनीय ? (भाग--२)

आपल्या मतांचा एक टक्का घसरला तर तो वाढविण्यासाठी भाजपा जितकी मेहनत घेतो तितकी मेहनत इंडी आघाडीचे व मविआचे पक्ष घेत नाहीत. मला वाटतं विरोधी पक्षांचे नेते मंडळी विदेशातून मिळणार्या धनाच्या राशीवर व नेगेटिव्ह नॅरेशनवर अधिक विसंबून राहतात. विरोधी पक्ष जे वादे करतात, ज्या योजनेची कल्पना मांडून आश्वासन देतात, पण विजय झाला की ती आश्वासने पुरी करीत नाहीत. कर्नाटक व तेलंगणात सत्ता हाती मिळाल्यानंतर काँग्रेस कडून  जाहीरनाम्यातील एक ही योजना कार्यान्वित झालेली नाही. 

महाष्ट्रातील मविआचे नेते मंडळी निवडणूक निकाला संबंधीत निवडणूक आयोगा विरूध्द आंदोलन मोहीम सुरू करणार आहे, अशी बातमी कानीं आली आहे. त्यातून काय साध्य होणार आहे ? काही नाही. पण विदेशी शक्तीकडून धन मिळत असते त्यावर पाणी का म्हणून सोडावे असे हे एक व्यवहारी कारण मविआ पाशी आहे. दुसरे असे की मविआच्या नेत्यांची व कार्यकर्त्यांची  इतकी नामुष्की झाली आहे की त्यांना चेहरा लपवावासा वाटतो. त्यासाठी औषध हवे आहे. तेच ते निवडणूक आयोग वर मोर्चा आणि घेराव !  हे अपेक्षितच होते. मविआच्या दारूण पराभवा मुळे मविआ चे समर्थक असलेला मिडीया वर्ग तोंडघशी पडल्यामुळे निवडणूक निकाला संबंधीत चर्चा करताना तीच मंडळी  मविआ नेत्यांना धारेवर घेत असतांना दिसत आहे. 

एबीपीच्या खांडेकर उद्धव ठाकरेंना म्हणाले ''अहो, तुमचा पक्ष फोडला, बाप पळविला, तुमच्या पक्षाची निशाणी पळविली, आणि शिवसेनेतून फुटलेल्या आमदारांना  गद्दार- गद्दार असे किती दिवस हिणवित राहणार?, हा तुमचा पक्षांतर्गत मामला आहे. मतदारांसाठी हा मुद्दा जुना झाला आहे '' असे म्हणत आपली नाराजी स्पष्ट केली.  काल परवा कुमार केतकर यांनी मविआचे नेते मंडळी इविएम मॅनेजमेंटवर जे आरोप करतात तो ' एक रडीचा डाव आहे. ' असे स्पष्टपणे म्हणाले. काही हिंदी भाषिक अजय दुबे सारखी पुरोगामी  संपादक मंडळी सुद्धा मविआला विजयाची संधी असुनही पराभूत झाल्याबद्दल कडक शब्दात कानउघडणी केली आहे. त्यांनी सुद्धा एविएम मशीन मधील हेराफेरीचा आरोप  ' नाच ना आये अंगन तेडा ' या स्वरूपाचा आहे असे म्हटले आहे. एनडीटिव्हीचे संजय पुगालिया, ज्यांनी एके काळी काॅग्रेसच्या मिडीया सेल मध्ये काम केले आहे त्यांनी तर राहूल गांधी जोपर्यंत काॅग्रेसचे सर्वेसर्वा राहणार तोपर्यंत काॅग्रेस निवडणूका हरत राहणार. काॅग्रेसचे धोरण ॲन्टी डेवलपमेन्ट, ॲन्टी नेशन, ॲन्टी हिंदू, घराणेशाही व त्यातून चंचल वृत्तीने पक्ष चालविणे, प्रत्येक प्रदेश काॅग्रेस अतंर्गत असलेले तंट्यावर तोडगे न काढता मामला वार्यवर सोडून देण्याची श्रेष्ठींची सवय इत्यादी कारणांची यादी उदाहरणा सह मांडली आहे. जी काॅग्रेसची स्थिती तशीच मविआची, तशीच इंडी आघाडीची स्थिती आहे.

अशा हतबल स्थितीत असलेली मविआ व इंडीची नेते मंडळी  निवडणूक आयोगावर  पक्षपाताचा आरोप दाखवित मोर्चा व घेरावाचे कार्यक्रम करीत आहेत. या पाठीमागे उद्देश एकच आहे, तो म्हणजे  विदेशी मिडीया तून आपल्याला व आपल्या युवराजांना फूकट प्रसिद्धी मिळणार आहे, या शिवाय धन ही मिळणार मग त्यावर पाणी का सोडावे हा विचार ? विचार नव्हे  हा विकार आहे. कारण पैशाची हाव ! मोर्चा, धरणे, व घेराव इत्यादी कार्यक्रमासाठी साठी मविआचे नेते मंडळी, कार्यकर्त्यांनांच राबवतील आणि त्यांचे वारसदार मात्र या कालावधीत फाईव्ह स्टार हाॅटेल मध्ये वास्तव्य करतील. त्यांना कुठे घाम गाळावा लागणार आहे ?

 मोर्चा, धरणे, उपवास इत्यादी शस्त्रे मविआने उगारली तरी त्याचा काही उपयोग होणार नाही. कारण मविआचे सरकारच मूळी भाजपाच्या (अर्थात फडणवीसच्या) पाठीत खंजीर खुपसून अस्तित्वात आलेले होते. शरद पवार जेव्हा जेव्हा महाराष्ट्राच्या मुख्यमंत्री पदावर आरूढ झाले ते स्वपक्षातील बड्या नेत्यांच्या पाठीत खंजीर खुपसून झाले. तसेच आपल्या  स्वपक्षातील नेते मंडळींना दिलेल्या जबाबदारीची व मंत्रीपदाची रचना सतत बदलत ठेवून (म्हणजे लहरी तैमूर लंग स्टाईलने) त्यांनी स्वतः लोकशाही बुरखा पांघरत 'हम करेसो कायदा'  हीच पक्ष चालविण्याची रीत ठेवली.

सन २०१९ साली पाठीत खंजिर खुपसून राजकारण करणार्या यादीत उद्धव ठाकरे यांचे नाव महाराष्ट्राच्या इतिहासात कोरले गेले आहे. आपल्या देशाच्या इतिहासात स्वजनांच्या पाठीत खंजीर खुपसून राजाच्या गादीवर बसण्याचे पेटेंट जुलमी, खुनशी वृत्तीचा मोगल राजा, ज्याने सत्तेसाठी आपल्या बांधवांची ही मुंडके उडीवली होती, त्या औरंगजेब कडे जाते. महाराष्ट्र विधानसभेच्या निवडणूकात औरंगजेबची औलाद  कोण आहेत हा एक मुद्दा अदृष्य स्वरूपात होता. महाराष्ट्रातील मतदारांनी कुठल्याही प्रकाराचा उताविळपणा न करता शांतपणे व दृढ निश्चयाने मविआ मधील औरंगजेबच्या औलादांना घरचा रस्ता दाखविला आहे. उद्धव ठाकरे, शरद पवार,  संजय राऊत, राहूल गांधी आणि नाना पाटोळे यांना निवडणूकाच्या निकालाने त्यांची जागा दाखवून दिली. याची आणखिन काही कारणें खालील प्रमाणे आहेत --

१)आम्ही मतदाता जागृती अभियान  चे कार्य करताना घरोघर शंभर टक्के मतदान करा अशी आम्ही विनंती करीत होतो, त्या त्या वेळी प्रत्येक सोसायटीतल्या प्रत्येक फ्लॅट मधून  १०० टक्के  मतदान करणारच आहोत असे ठाम आश्वासन आम्हाला मतदारां तर्फे मिळत होते. 

२)भाजपाचे महाराष्ट्रातले चाणक्य देवेंद्र फडणवीस यांनी, ' हो, हे धर्मयुद्ध आहे ! ' असे ठणठणीत आवाजात जाहीर सभेतून उद्गार काढले  तेव्हाच ते वाक्य मतदारपर्यंत पोहचले असल्याची जाणीव आम्हांला प्रत्येक फ्लॅटमधील रहिवाशांच्या चेहर्यावरून स्पष्ट दिसत होती. याचा अर्थ विरोधी पक्षांची नियत अधर्माकडे वळाली आहे हे मतदारांना कळले आहे. त्यामुळेच मतदानाची टक्केवारी वाढली आणि महायुतीच्या पारड्यात भरभरून मतें पडली. निवडणूकाचा निकाल आला तो मविआचा संपुर्ण निकाल लावून. 

३) विधानसभेच्या सन २०१९ च्या निवडणूकाचा जनादेश भाजपा व अखंड शिवसेनेच्या निवडणूक पुर्व युतीला होता. तसेच ५ वर्षे पुर्ण केलेल्या युती (फडणवीस) सरकारच्या कामगिरीचा  होता. शिवसेनेचे प्रमुख उद्धव ठाकरें यांना अवदासा आठवली आणि त्यांनी काँग्रेस व राष्ट्रवादी काँग्रेसला सोबत घेऊन मविआ आघाडी सरकारचे मुख्यमंत्री पद बळकाविले. वस्तुस्थिती अशी होती की उद्धव ठाकरे आणि शरद पवार या दोघांनी सन २०१९ च्या मतदानाच्या अगोदरच काँग्रेस व भाजपा ला मिळणार्या मतात घट कशी होईल यावर युक्ती आखलेली होती. ती त्यांनी पार पाडली. मुख्यमंत्री पद मिळविण्यासाठी उद्धव ठाकरें यांनी आघाडी धर्म पाळला नाही. म्हणूनच सन २०१९ पासूनच महाराष्ट्रातील राजकारणाला वेगळे वळण लागले. अडीच वर्षात सरकार पडल्यानंतर पुढील अडीच वर्षात  मविआने आपला सर्व वेळ महायुतीच्या नेत्यांवर टिका करण्यात खर्ची केला. महायुतीने सत्तेवर आल्यानंतर विकासाच्या प्रकल्पांना गती देण्यास सुरूवात केली.  

दुसर्या बाजूला मविआने जगभरच्या लिबरल लाॅबीने तयार केलेले नेगेटिव्ह नॅरेशन्स जादुच्या कांड्या समजत अत्यंत तिखट शब्दात मांडावयास सुरूवात केली. थोडा फार फायदा लोकसभेच्या निवडणूकात झाला. त्यातून हिंदु समाजात फूट पाडण्याच्या योजनेतून विधानसभेत इतका प्रचंड विजय मिळेल की केंद्र सरकार हादरलं जाईल अशी मविआच्या नेत्यांना आशा वाटू लागली. त्यामूळे मविआ नेते वाजवी पेक्षा अधिक शेफारले. परीणाम असा झाला की मविआच्या नेत्यांमध्ये मुख्यमंत्री पदासाठी उघडपणे स्पर्धा सुरू झाली. त्यातून हिंदू समाज दुखावत गेला यावर मविआच्या नेत्यांचे दुर्लक्ष झाले. इथेच मविआच्या पराभवाची बी नियतीने धर्म रक्षणासाठी रोवली असावी.

४)उद्धव ठाकरे हे गेल्या पाच वर्षात महाराष्ट्राच्या राजकारणातले खलनायक ठरले. उद्धव ठाकरे यांनी स्वतःच्या पायावर धोंडा मारून घेतला. ते भाजपा, मोदी अमित शहा, फडणवीस यांचा पराकोटीचा द्वेष करतात. एका जाहीर सभेतील उद्धव ठाकरे यांचे देवेंद्र फडणवीसला उद्देशून केलेले वक्तव्य असे आहे ' एक तर मी राहीन नाही तर तू ' ! या संबंधीत एका पत्रकाराने देवेंद्र फडणवीस यांना  ' तुम्ही यावर काय प्रतिक्रीया द्याल ? ' असा प्रश्न विचारला, तेव्हा फडणविसांनी शांतपणे पण स्पष्ट उत्तर दिले, ' यावर कसली प्रतिक्रीया मागता हो ?' 

                                   क्रमाश:--

शुक्रवार, २९ नोव्हेंबर, २०२४

महाराष्ट्र विधानसभा निवडणुका निकाल - अनाकलनीय की आकलनीय ? (भाग --१)



महाराष्ट्र विधानसभेच्या निवडणूकाचा निकाल लागला. महायुतीचा प्रचंड विजय झाला. असा एकतर्फी निकाल महाराष्ट्रात आजपावेतो आला नव्हता  हे सत्य आहे ; अनेक संस्थाचे ओपिनियन पोल चूकले हे ही सत्य आहे ; राजकीय अभ्यासकांचे भाष्य खोटी ठरली हे ही सत्य आहे. 

या वर्षीच झालेल्या लोकसभेच्या निवडणूकात महाराष्ट्र राज्यातून मविआने महायुतीपेक्षा अधिक जागा पटकाविल्या हे ही सत्य. तेव्हा मविआच्या नेते मंडळीपासून ते गल्लीतल्या कार्यकर्त्यानी  महायुती च्या नेत्यापासून ते महायुतीच्या कार्यकर्त्याची भरपेट टर उडविली.  महायुतीला अपेक्षापेक्षा कमी जागा मिळाल्या.पण महायुतीने जो निकाल लागला तो खिलाडू वृत्तीने स्विकारला आणि आपण कुठे कमी पडलो यावर चिंतन करून पुढे येऊ घातलेल्या विधानसभेच्या निवडणूकात चांगले यश मिळविण्याच्या कामाला लागली. पण मविआ यशाच्या नशेत डुबली. 

विधानसभेच्या निवडणूकांची घोषणा झाली ; एकामागून एक दिवस सरत चालला. उमेदवारांची यादी, फार्म भरण्याचे दिवस जवळ येऊ लागले. पण मविआच्या घटक पक्षात जागा वाटप आणि मुख्यमंत्रीपदावर दावा या संबंधीत शाब्दिक युद्ध सुरू झाले. तर महायुतीचे घटक पक्ष मतदारां समोर समन्वयाचं विलोभनिय दर्शन पेश करीत होते. 

निवडणूका झाल्या. महायुतीने मविआचा दारूण पराभव केला. दारूण पराभवाने गलीतगात्र झालेले मविआच्या घटक पक्षांचे नेते मंडळी, त्यांचे समर्थक मिडीया व राजकीय अभ्यासक 'महायुतीचा विजय ' ही  एविएम मशीनची करामत आहे असे म्हणत हा निकालच धुडकावित आहेत. 

जी गोष्ट प्रथमच घडते म्हणून ती खोटी आहे, त्यात दगाबाजी आहे, असे आरोप करणे म्हणजे आपली बुद्धी गहाण ठेवण्यासारखी आहे. दुसरे असे की महाराष्ट्र राज्याच्या विधानसभेच्या निवडणूकात एखाद्या  आघाडीचा दारूण पराभव होऊ नये असे देशाच्या संविधानात कलम ठेवले आहे का व त्यासाठी महाराष्ट्र राज्याला स्पेशल दर्जा मिळालेला आहे का? तसे काही ही नाही. महाराष्ट्रात भाजपाची ताकद कमी होती, पण ती भूतकाळाची गोष्ट आहे.  जगातला सर्वात अधिक सदस्य संख्या असलेला पक्ष भाजप आहे. माझे तर स्पष्ट मत असे आहे की विधानसभा निवडणूकातला महायुतीचा विजय हा उद्धव ठाकरे आणि शरद पवार व राहूल गांधी यांच्यावर काळाने उगारलेला सूड आहे. काळाने उगारलेला सूड हा अनाकलनीयच असतो.

ब्रम्हांडात अनेक चमत्कारीक घटना दर दिवशी घडत असतात. त्यावर आधुनिक विज्ञानाच्या अत्याधूनिक तंत्रज्ञानाच्या साह्याने संशोधन करून ही अशा चमत्कारी घटनांचे कारण लागलीच सापडत नसते. त्यावर वर्षानुवर्ष  संशोधन झाल्यावर चार ते पाच टक्के उत्तर हाती लागते. 

सारे पोल खोटे ठरले आहेत ही सबब निवडणूकीच्या निकालासंबंधीत संशय व्यक्त करून ना न्यायालयात केस उभी राहील, ना जनतेच्या दरबारात केस उभी राहील. कारण निवडणूक आयोग मविआची यासंबंधीतली तक्रार तडकाफडकी फेटाळून लावणार ! तसे पाहता मविआ व इंडी आघाडीची माता सोनिया गांधी, युवराज राहूल गांधी  इतर होयबा नेतमंडळी व कार्यकर्ते, लिबरल पत्रकार संपादक व अभ्यासक इत्यादी मंडळीने आत्मपरिक्षण करणे आवश्यक आहे. पण आत्मपरीक्षण हा शब्दच मुळी  घराणेशाही पक्षांच्या शब्दकोशातच नाही.            
             
काँग्रेसच्या अध्यक्षपदी विराजमान झाल्यापासून सोनिया गांधीने हिंदू समाजाच्या हिताकडे पूर्णपणे दुर्लक्ष करीत, भगवा आतंकवादाचे खोटे-नाटे नॅरेशन जगभरात पसरविण्याची मोहीम राबविली तर दुसर्या बाजूस धर्मांध मुस्लिमांच्या दिवसागणिक वाढत जाणार्या मागण्यांची पुर्तता करू असे काँग्रेस प्रणित राष्ट्रीय स्तरावरील इंडी आघाडी व महाराष्ट्रातील मविआ च्या लेखी आश्वासनामूळे हिंदू समाज हळूहळू जागा होत आहे. जागा होत असलेल्या हिंदूना कुठल्या तरी भितीने ग्रासून ठेवण्याच्या क्लुप्त्या विरोधी पक्ष व त्यांचे समर्थक मिडीया व विचारवंत लढवित असतात. हे नित्याचे होऊन बसले आहे. 

युक्रेन व रशिया मधील सुरू असलेल्या युद्धात भारताची भूमिका लंगडी पडत आहे, तसेच इजराईल व इराण देशामधील युद्धात ही भारताची भूमिका सावध आहे, भारत कचाट्यात सापडला आहे, जागतिक स्तरावर भारत एकाकी पडला आहे, इत्यादी खोटे-नाटे नॅरेटिव जे घुमते आहे, त्यातून जनसामान्याचा संभ्रम वाढवयाचा, मग मोदी सरकारची लोकप्रियता कमी होत भारतात अराजक माजले जाईल असा प्रचार विरोधी पक्षांचे चमचे असलेला मिडीया हाऊसेस करीत आहेत. पण--

वस्तुस्थिती भितीदायक नाही उलट आपल्याला अभिमान वाटेल अशी आहे. भारत आर्थिक, सामरिक, उद्योगिक, व परराष्ट्रीय संबंधात इतका सक्षम झालेला आहे की अमेरिका, रशिया व चीन सारखे देश भारताकडे वाकड्या नजरेने बघण्याची हिम्मत करीत नाहीत. पंतप्रधान नरेंद्र मोदी जगातील सर्वात धाडसी तितके संयमी व लोकप्रिय नेते गणले जात आहेत.  हे जनसामान्यांना ठाऊक झाले आहे.  जगभरातील लिबरल विचारवंत, संपादक मंडळीं, सतत गोबेल्स तंत्राने  भारत सरकार, भाजपा, आणि हिंदु संस्कृतीच्या विरूद्ध नेगेटिव्ह नॅरेशन पसरवित असतात. हे जनसामान्यांना पक्के ठाऊक झाले आहे. पण बहुतांश हिंदु समाज बांधव आक्रमक किंवा रागाच्या भरात प्रतिक्रीया देत नाहीत. पण मतदान  'राष्ट्र प्रथम' याच भावनेने करीत असतो. त्यांमुळे लिबरल मंडळीच्या नेगेटिव्ह नॅरेशनस् दिवाळी संपल्यावर उरलेल्या फटाक्या सारखे फूसके बार ठरत आहेत.

आतापर्यंत मणीशंकर अय्यर, दिग्विजयसिंग व राहूल गांधीच्या वक्तव्याने भाजपाला प्रत्येक निवडणूकीत फायदा होत गेलेला आहे. बांगला देशात अराजक माजले व तेथील पंतप्रधानांना हद्दपार केले, तसेच काही तरी भारतात होईल असे काँग्रेसचे नेते सलमान खुर्शिद यांनी केलेले वक्तव्य  मविआ व इंडी आघाडीला अदृष्य स्वरूपात महाग पडले पण महायुतीला मोठी मदत देऊन गेले असे मला वाटते. कुठल्याही पक्षाच्या नेत्याने केलेलं वक्तव्य जर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रित्या देशहिताला ठेंच पोहचणारे वाटते,  तेव्हा त्या नेत्याने देशद्रोह केला अशी सर्वसामान्यांची समजूत होते आणि ती खरी ही आहे. सलमान खुर्शिद यांना बांगला देशातल्या हिंदू समाजावर अत्याचार होत आहे या बद्दल   यत्किंचीत दया आली नाही. 

अमेरिका व पाक पुरस्कृत दशहतवाद्यांतर्फे मोदी सरकार उलथून पडावे अशी आशा सलमान खुर्शिद तसेच इंडीचे नेते मंडळी  मविआचे नेते - कार्यकर्ते, लिबरल पत्रकार-संपादक धरून बसतात. वर्षभर अभ्यास न करता काही विद्यार्थी IMP प्रश्नोत्तरांचा आधार घेतात तसेच मविआ व इंडी आणि प्रान्तीय पक्ष देशी-विदेशीच्या अभ्यासकांनी केलेले आयते नॅरेशन्सवर भर देतात. काही नॅरेशन्स ऑउट ऑफ डेट असतात. परीणाम  ' सपशेल नापास !'  शरद पवार, उद्धव ठाकरे व राहूल गांधी यांचा प्रवास मणीशंकर अय्यर यांच्या मार्गावर येऊन ठेपला आहे. म्हणूनच निवडणूकांचा निकाल एकतर्फी लागला. महाराष्ट्रातल्या मतदारांनी कसलाही गवगवा न करता, (गनिमी काव्याने म्हणा हवे तर) मविआला सपशेल झिडकारले. 

निवडणूकीतला अनाकलनिय निकाल म्हणजे सारासार विचार करून, दृढ निश्चयाने, शांत चित्ताने, राष्ट्रहीत सर्वोच्च मानून धर्माच्या रक्षणासाठी जनतेने केलेलं मतदान होय. संघ परिवाराचा ' सजग रहो ' या इशाराला मतदारांनी दिलेला सकारात्मक प्रतिसाद आहे. आपण एखादे काम मनःपुर्वक करतो तेव्हा त्यात अद्भूत यश मिळते. हा सृष्टीचा नियम व एक वैशिष्ट्य आहे. याची जाण असुनही मविआचे नेतेमंडळी आपल्या धोरणात व वागण्यात बदल करणार नसतील तर काय म्हणावे ? एकच उत्तर आहे ते म्हणजे ' विनाशकाले विपरीत बुद्धी ! '

एखादी गोष्ट घडते, ती अनाकलनीय का वाटते या संबंधीचं एक सामान्य उदाहरण आपल्या समोर मांडतो. गेल्या आठवड्यात मी एका लग्न समारंभा साठी गावी गेलो होतो. दुसर्या दिवशी संध्याकाळी नालासोपारा ते बोरीवली कडे येणार्या रेल्वे गाडीने आलो. बोरीवली स्टेशनवर डब्यातून उतरलो. तेव्हा फ्लॅटफार्मवर एक -दोन नव्हे तब्बल आठ तिकीट इन्स्पेक्टर उतरणार्या प्रवाशाकडून टिकेट टिकेट असे म्हणत तपासणी करू लागले. मी तिकीट दाखविले आणि गम्मत पाहावी या हेतूने बाजूला उभा राहून पाहू लागलो. उतारू प्रवाशांपैकी सहा-सात जणांना विना तिकीट प्रवास करणार्यांना नियमानुसार ताब्यात घेतले. उतारूंची संख्या फार होती. त्यामानाने टिकीट इन्स्पेक्टरांची संख्या फार कमी होती. मी ब्रिजवरून चढत असतांना पुढे चालत असलेले आमच्या डब्यातले दोन उतारू' देवाची कृपा आपण वाचलो ' असे म्हणत असल्याचे ऐकले. विना तिकीट प्रवास करणारे काही प्रवासी अडकले तर काही अनायासे सुटले. हे असे का व्हावे ? मी माझ्या मनाशी प्रश्न विचारला. विना तिकीट प्रवास करणारे काही उतारू अडकले तर काही सुटले. सारं तर्कशास्त्र धुंडाळून पाहिले. उत्तर मिळाले नाही. 

शेवटी   Law of averages व Law of probability यांचाच आधार घेत माझ्या मनाची घालमेल थांबविली. या विश्वात सर्वात गूढ असे काय या प्रश्नावर विख्यात शास्त्रज्ञ आईनस्टाईन यांनी उत्तर दिले आहे-- 
'हे विश्वच !' जे उतारू पकडले गेले. त्यापैकी काही जण नेहमीच विना तिकीट प्रवास करणारे असू शकतात. त्यांच्यापैकी जे पकडले गेले त्यांना जे घडले ते अनाकलनीय वाटू शकते. तर काहींनी पुन्हा विना तिकीट प्रवास करायचा नाही असे ठरविले असेल. काही जण विना तिकीट प्रवास करणे सुरू ठेवतील. जे सुटले ते देवाची कृपा, नियती नशीब असे समजत असतील. मी ही लेखमालिका लिहावयास बसलो त्याच्या आदल्या दिवशी हा मला आलेला अनुभव आहे. थोडक्यात हेच की महायुतीच्या विजया संबंधीचे आकलन संपुर्णतया होईल आणि तंतोतंती भाष्य वा भाकीत कोणी ही करू शकत नाही. कारण मतदान हे फक्त बुद्धी स्तरावरून होत नसते. तिथे ही मनाला पंसत पडते त्या उमेदवाराला ते दिले जाते. प्रत्येक  क्षेत्रात मतभिन्नता असतेच त्यात नवल ते काय ? मग अशावेळी  ' करावे तसे भरावे ' हेच आपण म्हणतो आणि ऐकतो.

एकंदरीत जे अनाकलनिय घडले असे आपल्याला वाटते ते होणार होतेच. तो निसर्गाचा एक नियम असतो. अनाकलनिय घटना घडते तेव्हा त्यातील सत्याचा शोध घेण्याचा प्रयत्न करणे क्रमप्राप्त असते. पण मविआचे नेते मंडळी एवीएम मशीनवर पर्यायाने निवडणूक आयोग, केंद्र सरकार वर टिका करीत आहे. विरोधी पक्षांचे असे रडगाणं न्यायालयात टिकले नव्हते. याचा अनुभव त्यांना आला आहेच. निवडणूक आयोगा समोर असलेली मविआ वा इंडी ची याचिका असो वा ठराव सपशेल धुडकावले जाणार हे निश्चीत. अन्याय करणारे, धातांत खोटे बोलणारे इत्यादींना सहानुभूती मिळत नसते. थोडीफार क्वचीत मिळेल पण सतत मिळत नसते. खोटे बोलणार्यांचे, अन्याय करणार्यांचे पाय सतत चिखलात रूतत जातात. नंतर सत्यानाश ओढवतो मग ते क्षेत्र कोणते ही असो. 
                              क्रमशः---

बुधवार, २७ नोव्हेंबर, २०२४

त्रिपुरात अफवा पण महाराष्ट्रात धुडघुस कसा ? (भाग-२)



वाचक हो, केंद्र सरकार आणि महाराष्ट्र सरकार मध्ये जे दंद्व माजले आहे, त्याचे स्वरूप मला जसे दिसले, भासले त्यातून जे आकलन झाले, ते मी या लेखाच्या भाग १ मध्ये मांडले आहे. ही मांडणी म्हणजे मी दावा मांडला आहे असे नाही. ही घटना गंभीर स्वरूपाची आहे. या घटनेवरील राजकारण संपणार नाही. त्यामूळे या विषयावर चर्चा ही सुरू राहणार आहे. म्हणून या घटनेचा भौगोलिक तसेच निसर्ग नियम, मानसशास्त्र आणि सामान्य ज्ञानाच्या दृष्टीकोनातून पाहाता आपल्या हाती काय लागते यावर चर्चा करू या.

त्रिपुरात मशीदी जाळल्या, मुस्लीम बांधवांवर हल्ले झाले ही अफवा नसून सत्य घटना आहे असे  आपण मानले तरी फक्त महाराष्ट्रातच दंगली कशा झाल्या हा प्रश्न शिल्लकच राहातो. त्रिपुरा देशाच्या ईशान्या टोकाला आणि महाराष्ट्र देशाच्या पश्चीम टोकाला  म्हणजे जवळपास त्रिपुरा राज्याच्या अगदी विरूद्ध दिशेला.  त्सुनामी, अतिवृष्टी, भुकंप, इत्यादी नैसर्गिक आपत्तीत जी राज्यें एकमेकांच्या शेजारी आहेत, ती राज्यें कमी अधिक प्रमाणात सापडली जातात हा आपला अनुभव आहे. We are all governed by the Laws of Nature.  अग्नी, पाणी, प्रकाश, आणि वायु ही पंचमहाभूतापैकी चार. ही चार महाभूते प्रवाही आहेत आणि पाचवं आकाश नावाचं पंचमहाभूत हे एक माध्यम हे वैज्ञानिक आणि शाश्वत सत्य आणि आपण प्रत्यक्ष अनुभवतो. मानवी शरीर ही पंचमहाभूतांनी बनलेले असते. त्यामूळे मानवी मन जात्याच प्रवाही असते. मानव जेव्हा सुरक्षा तसे एकमेकांच्या अडचणीच्या काळात मदत होईल या कारणाने समुहात राहू लागला, तेव्हा त्या तशा समुहाला  समाजाचं स्वरूप मिळालं. सामन्यतः समाज प्रवाह पतीत असतो. कपड्याच्या दुकानात किंवा चप्पलाच्या दुकांनात ' सेल, ४० टक्के सूट ' अशी पाटी झळकली की त्या दुकानात लोकांची तुबंड गर्दी आपण पाहातो. दंगल करण्याचा किंवा अफवा पसरविण्याचा उगम आपल्या मनात होतो. त्यामूळे दंगली सारख्या घटना ज्या राज्यात प्रथम होतात तेथून त्या शेजारील दुसर्या राज्यात, पुढे दुसर्या राज्याच्या शेजारील राज्यात म्हणजे तिसर्या राज्यात पसरत जातात. यातुनच तर ' दंगलीचे लोण ' असा शब्दप्रयोग आपण व्यवहारात वापरत असतो.  याचा अर्थ त्रिपुरा येथे जर दंगल झाली असती तर त्याची झळ शेजारील राज्यांना पोहचली असती. म्हणजे दंगलीचे लोण प्रथम त्रिपुरा राज्याच्या शेजारील राज्यात पोहचायला हवे होते की नाही. तसे घडले नाही. म्हणजेच त्रिपुरात ना दंगली झाल्या ना मशीदी जाळल्या गेल्या हेच सत्य असावे.

आता सामान्य ज्ञान काय सांगते ते पाहू या.  सर्वसाधारणतः आपल्या नात्यातील वा परिचयातील एखाद्या युवकाच्या अकस्मात मृत्युची बातमी आली की आपण ती बातमी खरी आहे की नाही याची खातरजमा करून घेतो की नाही? त्रिपूरात खरोखरीच मशीदी पाडल्या आहेत का, मुस्लीम बांधवांवर हल्ले झाले आहेत का याची खातरजमा रजा ॲकॅडेमीने केली होती का? समजा तशी खातरजमा रजा ॲकेडेमीने केली असती तर सत्यस्थिती कळली असती. जर त्रिपुरात दंगल झाली असती तर रजा ॲकेडमी सारखी संस्था जिचे ऑफीस मुंबईत आहे आणि ती मुस्लीम समाजाच्या फतवा काढण्याइतकी सक्षम आणि सर्वोच्च संस्या नसताना ती दंगलीची सुरूवात कशी करेल ? आणि महाराष्ट्रात सुरूवात का म्हणून करेल? त्रिपुरात दंगल झाली असतीच तर  मुस्लीम समाजाच्या सर्वोच्च संस्थेने फतवा काढून या दंगलीची सुरूवात महाराष्ट्रात करण्याऐवजी, जिथे पुढील तीन महिन्यानंतर निवडणूका आहेत अशा उत्तर प्रदेश मध्ये केली असती की नाही ? वाचक हो आपल्या देशात झालेल्या धार्मिक दंगलीच्या इतिहासाच्या आधारे हे मी मांडले आहे.

आता आपण सामान्य ज्ञानाच्या दुसर्या कोनातून पाहू या. जर का रजा ॲकेडेमीने त्रिपुरात झालेल्या दंगलीची खातरजमा केली नसेल तर तिने आपली स्वाभाविक वृत्ती ठेचली असेल असे मानावे लागेल (कारण खातरजमा करणे ही सहज प्रवृत्ती.) पण तसे संभवत नाही. कारण स्वाभाविक वृत्ती वा प्रवृत्ती सहजा सहजी ठेचून काढता येत नाही. स्वाभाविक प्रवृत्ती वा विकृती म्हणा  इत्यादीवर नियंत्रण मिळविण्यासाठी प्रचंड तपस्या लागते. ती शक्ती आपल्या येथील फक्त अध्यात्मिक गुरू आणि संत-महंतानी प्राप्त केलेली आहे. रजा ॲकेडेमी ही तशी सामान्य संस्था पण  शिक्षण आणि सेवा संस्था असल्यामूळे तिच्यात थोडा तरी चांगूलपणा टिकणारच. म्हणजे तिने थोडी फार का असेना, पण त्रिपुरात खरोखरीच दंगल झाली आहे का? खातलजमा केली असती आणि दंगल झाली असती तर दंगल करण्यासाठी रजा ॲकेडमी नसतीच, आणि दंगलीचं ठिकाण ही महाराष्ट्रीतील मुस्लीम बाहूल जिल्हे नसते. याचा अर्थ असा आहे की त्रिपुरात मशीदी नष्ट केल्या, मुस्लीम बांधवांवर हल्ले केले ही अफवाच होती.  त्यामूळे रजा ऑकेडेमीला अफवाची खातरजमा करून घेण्याचा प्रश्नच उद्भवला नाही. त्यामूळे अगोदर ठरल्याप्रमाणे महाराष्ट्रात रजा ॲकेडेमी तर्फे मोर्चा, बंद, दगडफेक आणि हिंदु बांधवांवर हल्ले झाले आहेत. ते काम रजा ॲकेडेमीने पार पडले असावे. कारण त्या संस्थाने आपले नाक नाही त्या ठिकाणी खुपसून मोर्चा काढून जवळपास तीन वेळा महाराष्ट्रात  हिंसाचार आणि फोडतोड केली आहे. यावरून हे सारे प्रकरण भाजपा विरोधी पक्षांनी रचलेले एक कारस्थान आहे याबाबत दुमत नसावे असे मला वाटते.

या कारस्थानाच्या पाठीमागे  एकूण चार हेतू असावेत. ते खालील प्रमाणे आहेत --
१)  किसान आंदोलनातील हवा कधीच संपली आहे. त्यामूळे भाजपा शासीत एखादं राज्य बरखास्त करण्याची मागणी साठी कारस्थान करावे लागणार होते. त्यात त्रिपुरा राज्याची निवड केली आणि आगामी काळात जास्तीत जास्त विरोधी पक्षांना सामील करून बंद, मोर्चे इत्यादी नाटकांच्या संयुक्त कवायती करण्याची योजना तयार करणे.   

२) महाराष्ट्रातील मविआ सरकाराच्या  दुष्कृत्यांमूळे इभ्रतेचे जे धिंडवडे उडाले आहेत त्यावरून मराठी जनतेचे लक्ष दुसरीकडे वळविण्याचा हा प्रयत्न आहे. 

३) दोन विदेशी शक्तीच्या लाॅब्यांचा एकत्रित उपयोग करून घेण्याची एक छोटीसी लिटमस टेस्ट यशस्वी करणें.

४)महाराष्ट्रात सरकार स्थापन केल्याचा जो प्रयोग उद्धव ठाकरे आणि शरद पवारांनी केला आहे त्यात काॅग्रेस पक्षाला गौण स्थान दिल्याने काॅग्रेसजन अगदी राहूल गांधी पासून ते महाराष्ट्रातील गाव पातळी पर्यंत नाराज आहेत. त्यासाठी एखादी सांप्रादायिक घटना, भाजपाने घडविली आहे असे भासवून भाजपाशी लढत देण्यासाठी एकत्र राहीले पाहीजे  ही जाणीव काॅग्रेसला करून देणे.

वरील पैकी चौथ्या हेतू ची कल्पना काॅग्रेसला दिली नसली तरी त्या पाठीमागील कारस्थानाची कल्पना काॅग्रेसने हेरली नसेल इतके काॅग्रेसचे श्रेष्ठी खुळे नाहीत. शेवटी काॅग्रेसच भाजपा सोडून सर्व विरोधी पक्षांची आई आणि बाप आहे. यातील बाप हा शब्द काॅग्रेसच्या राजकारणाच्या दृष्टीने अधिक उचीत ठरतो. पण हे कारस्थान तर घडले आहेच त्यामूळे  काॅग्रेसला त्रिपुरा सरकार विरूद्धच्या लढ्यात सामील व्हावे लागणार आहे तसेच महाराष्ट्रात ही राष्ट्रवादी आणि शिवसेनेसोबत भाजपा विरूद्ध आखलेल्या टिका सिरीज मध्ये भाग घ्यावा लागेल. कारण मामला आहे हिंदू-मुस्लीमाचा. वस्तुतः मुस्लीम मतपेटीचा. म्हणजे तथाकथित पुरोगामी विरोधी पक्षांतर्गत स्पर्धेचा.

एकंदरीत या चर्चेअंती  त्रिपूरा आणि महाराष्ट्रात जे कटकारस्थान रचले त्या पाठीमागील मास्टर माईन्ड शिवसेना आणि राष्ट्रवादी काॅग्रेस हे पक्ष आहेत हा निष्कर्ष निघतो. याचे कारण असे आहे की त्रिपुरात दंगल पेटविण्याची यांच्यात धमक नाही. म्हणून तिथे ऑन लाईन वरून अफवा सोडून देण्याचे कार्य उरकले. आणि महाराष्ट्रात दंगल घडविली. कारण भारतातल्या सर्व विरोधी पक्षात  शिवसेना आणि राष्ट्रवादी काॅग्रेसचे अस्तित्व पणाला लागले आहे. दंगलीचे स्वरूप  ही असे ठेवले होते की दंगलीची चौकशी आपल्या राज्याच्या गृहखात्यापर्यंत सिमीत राहील. या पाठीमागचे खरें कारण म्हणजे आगीशी खेळ करताना या दोन्ही पक्षांचे हात-पाय पोळून निघाले आहेत. त्यातच या दोन्ही पक्षांतील मंत्र्यांच्या भ्रष्टाचारांची प्रकरणे बाहेर आली आहेत.  विद्यमान मविआ सरकारच्या काळात काॅग्रेसच्या एकाही मंत्र्यावर भ्रष्टाचाराचा आरोप झाला नाही. म्हणून ज्या मराठी मतदारांना भाजपाला मते द्यावयाची नाहीत त्यांच्यासाठी काॅग्रेस हा ऑप्शन चांगला आणि पसंतीचा होऊ शकतो. याच भितीमूळे उद्धव ठाकरे आणि शरद पवार यांची झोप उडाली आहे. एकदा खोटे बोलले की पुढे शंभर वेळा खोटे बोलावे लागते. तसेच  एक कारस्थान केले की शंभर कारस्थान करावे लागतात. उद्धव ठाकरे आणि शरद पवार एकामागोमाग कारस्थाने करीत चालले आहेत. पण त्यासाठी शक्ती फक्त या दोन्ही पक्षांचीच खर्च होत आहे. म्हणून  विरोधी पक्षांची आघाडी व्हावी असे शरद पवार काल म्हणाले आहेत आणि त्यांचीच री संजय राऊत ओढत आहेत आता त्यांच्या कपाळी हीच पाळी आली आहे.  शरद पवारांचे पंतप्रधानपदाचे स्वप्न नुसते भंगलेच नाही तर ते आता मोडून तुटून नवाब मलिकांच्या भंगारखान्यात जमा झाले आहे. तर उद्धव ठाकरेंना आपल्याच घरातील पितृस्वरूप वाघाची डरकाळी ऐकू येत नाही. कारण २०१९ च्या निवडणूका जाहीर झाल्यापासून त्यांच्या दोन्ही कानात सतत शरद पवार गुणगुणत आहेत. शरद पवार आणि उद्धव ठाकरे असे काही चक्रव्युहात अडकले आहेत की यांची अवस्था उत्तर प्रदेश मध्ये सपा आणि बसपाची झाली आहे तशीच होणार आहे, तर मविआ सरकारातील यांचा घटक पक्ष काॅग्रेसला महाराष्ट्रात उभारी मिळेल असे स्पष्ट दिसू लागले आहे.

बाकी महाराष्ट्रातील या दंगलीतील  दोषींचा तपास, आरोपींची निश्चिती करून एफआयआर नोंदणे नंतर न्यायालयात खटला उभा राहणे इत्यादी गोष्टीसाठी एक वर्षाहून अधिक काळ जाणार आहे ही बाब आपल्याला अंगवळणी पडली आहे. पण त्रिपुरा सरकार मात्र अफवा मागील सत्य शोधण्याचा कसून प्रयत्न करणार आणि त्यात विदेशी शक्तीचा हात सापडला तर महाराष्ट्रातील दंगलीचा तपास एनआयए या केंद्रीय एजन्सीकडे जाईल. तेव्हाच कदाचीत महाराष्ट्र सरकार बरखास्त झालेले दिसेल. कारण मोदी सरकारने  कृषी बिलें मागे घेऊन विरोधी पक्षांना निष्प्रभ केल्याची बातमी या लेखाची (भाग २) समाप्ती करतेवेळीच आली आहे. त्यावर चर्चा पुढच्या भेटीत करू या.

गुरुवार, ५ सप्टेंबर, २०२४

शिक्षक दिन - व्यापकता व महत्व (भाग २)

शिक्षक दिन हा एक प्रकारे शिक्षकांच्या जीवनातील एक मोठा सत्कार च आहे. आजच्या मानवाचा सारा विकास हा शिक्षण व्यवस्था व शिक्षकांनी विद्यार्थ्याना दिलेल्या शिकवणीतून झाला आहे. क्षेत्र कुठलेही असो, एका पिढीचा अनुभव हा दुसर्या पिढीला मिळत असतो त्यातूनच दुसर्या पिढीचा अनुभव तिसर्या पिढीला मिळत असतो. 

सामान्यतः डाॅक्टराचा पुत्र डाॅक्टर होत असतो. इजिनीयरचा मुलगा इंजिनियर बनतो. प्रत्येकाचा व्यवसाय हा त्या घराचा कर्ता पुरूष किंवा कर्ती स्त्री पासून दुसर्या पिढीला मिळत असतो. असे असले तरी विद्यार्थी वर्गाला शाळेचा अभ्यासक्रम शिकण्यासाठी शाळेतील शिक्षकांचा आधार लागतोच. ब्रिटीश राजवटीत आपली पुर्वीची शिक्षण व्यवस्था म्हणजे गुरूकूल व्यवस्था संपुर्णतः मोडीत काढली गेली. त्यामूळे शिक्षण देण्यासाठी शाळा उघडण्यात आल्या; शिक्षण देण्यासाठी शिक्षक नावाचा वर्ग निर्माण करण्यात आला. असे  असले तरी गुरू-शिष्य परंपरा आज तागायात टिकून राहिली आहे. याचे श्रेय शिक्षक वर्गाला जाते. प्रश्न असा आहे की गुरू- शिष्य परंपरा अबाधित असतांना शिक्षक दिन साजरा करण्याची प्रथा सुरू का झाली, प्रत्थेक वर्षात ५ सप्टेंबर लाच शिक्षक दिन का पाळला जातो  याची कारणें काय आहेत? यावर चर्चा करू या.

काळानुसार मानवी जीवनातल्या  प्रत्येक व्यवस्थेत बदल होत असतो. आजचे युग हे तंत्रज्ञानाचे आहे. गती हा या युगाचा मंत्र आहे. विद्येचे स्वरूप ही बदलेलं आहे. विद्येचं बदलेल्या स्वरूपाचे प्रशिक्षण शिक्षक वर्गाला दिले जाते. असे असले तरी  वैदिक काळापासून सुरू झालेली प्राचीन शिक्षण व्यवस्था ब्रिटीश सरकारने मूळासकट उखडून काढल्यामूळे, तसेच नवीन इंग्रजी माध्यमाच्या शाळा सुरू झाल्यामुळे देशात कारकून निर्माण होत गेले. तरीही ब्रिटीश राजवटीला खिळखिळी करण्यात अनेक देशभक्तांना यश मिळत गेले. कोणी अहिंसा व सत्याग्रह या शस्त्राच्या साह्याने ब्रिटीश राजवटीशी झूंज दिली तर कोणी हातात शस्त्रे घेऊन ब्रिटीश सरकारच्या अधिकारी वर्गाला यमसदनास पाठविले. 

एक तिसरा वर्ग असा होता की त्याने आपल्या बुद्धीच्या बळावर इंग्रज राजवटीला धक्के दिले. या तिसर्या वर्गात बहुतांशी शिक्षक वर्ग होता. या मार्गावर असलेल्या अनेक थोर पुरूषांनी आपल्या प्राचीन संस्कृतील साहित्य व ज्ञान भांडारचा अभ्यास करीत आपले धर्मग्रंथ व आपल्या संस्कृतीचा प्रसार जगभर केला.  या तिसर्या वर्गात अग्रणी स्थानावर स्वामी विवेकानंद होते. स्वामी विवेकानंद च्या पश्चात जगभरात आपल्या संस्कृतीचा प्रसार करण्याचे शिवधनुष्य लिलयाने पेलविले असे अध्यात्मिक गुरू म्हणजे डाॅ राधाकृष्णन. त्यांच्या व्यक्तीमत्वाचे वर्णन शब्दात मांडणे मला अशक्य होत आहे. मी इथे हिंदी पुस्तकात वाचलेले एक वाक्य मला आठवले ते असे आहे ' व्यक्तीत्वकी भी एक पहचान होती है , वह बिना शब्द और बिना भाषासे दुसरोंके अंतरमनको छू लेता है | 

शिक्षक दिवस हा शिक्षकांच्या कौतुकाचा एक विशेष दिवस आहे. शिक्षक दिवस साजरा करण्याची कल्पना एकोणीसाव्या शतकात अनेक देशांमध्ये रूजली. बहुतांशी स्थानिक शिक्षक किंवा शिक्षण क्षेत्रातील महत्वाचा टप्प्यावर योगदान दिले आहे अशा व्यक्तीचा सत्कार होतो. अनेक आंतरराष्ट्रीय दिवसापेक्षा हा दिवस अनेक देशात वेगवेगळ्या तारखेला होतो. आंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिन ५ ऑक्टोबरला साजरा होतो. तर आपल्या देशात डाॅ सर्वपल्ली राधाकृष्णन यांच्या वाढदिवशी म्हणजे ५ सप्टेंबरला शिक्षक दिन साजरा होतो. 

डाॅ राधाकृष्णन यांचा जन्मदिवस कसा शिक्षक दिन साजरा होऊ लागला, याची एक छोटीसी कथा आहे. सन १९६२ ला डाॅ  राधाकृष्णन भारताचे राष्ट्रपती झाले, तेव्हा त्यांचे काही विद्यार्थी त्यांना भेटावयास गेले. त्यांनी ५ सप्टेंबरला डाॅ राधाकृष्णनचा दिमाखदार वाढदिवस साजरा करण्यासाठी परवानगी मागितली. तेव्हा डाॅक्टर राधाकृष्णन यांनी नम्रतेने नकार दिला. स्वतः शिक्षक असल्यामूळे देशातील तमाम शिक्षकांचा तसाच शिक्षण व्यवस्थेचं कौतूक व्हावे ही इच्छा प्रगट करून विद्यार्थ्यांना ५ सप्टेंबरला शिक्षक दिवस साजरा करण्यास सांगितले. त्यांच्या विद्यार्थ्यांचे समाधान झाले. तेव्हापासून ५ सप्टेंबरचा दिवस शिक्षक दिवस साजरा होऊ लागला. 

एक महान तत्वज्ञानी, सनातन संस्कृतीचे गाढे अभ्यासक, युनेस्कोचे माजी चेअरमन, बनारस हिंदु विद्यापिठाचे कुलगुरू, भारतीय संविधान समितीचे सदस्य, पहिल्या शिक्षण आयोगाचे अध्यक्ष, स्वामी विवेकानंद व स्वातंत्र्यवीर सावरकारांना आपले आदर्श मानणारे अलौकीक विद्वान, ऑक्सफोर्ड विद्यालयात प्राचार्य, तल्लक बुद्धी व स्मरणशक्ती दैवाजात प्राप्त झालेले महान विद्यार्थी व शिक्षक, फिलासाॅफी ऑफ रविंद्रनाथ टागोर, इथीक ऑफ वेंदात, दि रेगीन इन रिलीजन कन्टेमपररी अशा ग्रंथाचे महान लेखक, छोट्या छोट्या कथातून सनातन संस्कृतीचे दर्शन घडविणारे दशसहस्त्रेषू वक्ता, अमेरिका व युरोपमध्ये लोकप्रिय हिंदू नेता, पाश्चात्य व सनातन संस्कृतीचे खंदे समन्वयक आणि ----
        आचारः परम धर्मं |
        विद्या विनयेन शोभते |
        विद्या सर्वत्र पुज्यते |
        सा विद्या या विमुक्तये |
         वसुधैव कुटुम्बकम् |
इत्यादी सनातन संस्कृतीचे बोधवचने आपल्या आचरणात आणली अशा सनातनी अवतारी महापुरूषास माझे कोटी कोटी प्रणाम | 
        




 

बुधवार, ४ सप्टेंबर, २०२४

शिक्षक दिन - व्यापकता आणि महत्व (भाग-१ )

आज गुरूवार ५ सप्टेंबर २०२४ ! देशभरातील शाळांमध्ये तसेच काही स्वयंसेवी संस्थामध्ये शिक्षक दिन साजरा केला जातो. संत तुकाराम साल्वेस्टर मिशन प्रणित, मालाड (प) व विद्याप्रतिष्ठान पुणे संचलीत  आनंदराव पवार सरस्वती विद्यामंदिर वझिरा, बोरीवली (प) या शाळेची कार्यवाह म्हणून जबाबदारी मी सांभाळतो. दर वर्षी एसटीएस मिशनच्या शाळांचा ' शिक्षक दिन ' संयुक्त रित्या साजरा होत असतो. परंतु या वर्षी एसटीएस मिशन मालाड च्या सहकार्यावाह जोग मॅडम यांनी फोनवरून कळविले की या वर्षी शिक्षक दिनाचा कार्यक्रम स्वतंत्र रित्या आपआपल्या शाळेत साजरा करावा.  त्यांच्याशी फोनवर झालेल्या संवादातून या विषयावर लेख लिहीण्याची प्रेरणा मिळाली. 

शिक्षक दिनाचे महत्व या विषयावर लेख लिहणे म्हणजे शिवधनुष्य पेलविण्या इतके महाकठीण कार्य आहे याची जाणिव मला आहे. पण ' प्रयत्नांती परमेश्वर ' हा समर्थबोध लक्षात ठेवून माझ्या कुवतीनुसार मी लेख लिहावयास घेतला आहे. वाचक हो , शिक्षक दिनाचे महत्व मांडताना वैदिक काळातील गुरू-शिष्य परंपरा व गुरूपौर्णिमेचा उत्सव यावर चर्चा केल्याशिवाय हा लेख परिपूर्ण होणार नाही असे मला वाटते. म्हणून या लेखाच्या पहिल्या भागात  गुरू-शिष्य परंपरावर चर्चा मांडत आहे. 

आपल्या देशात प्राचीन काळी म्हणजे वैदिक काळात गुरकूलं होती. त्यातूनच पुढे महर्षी व्यासांच्या 
महानिर्वाणा नंतर त्यांच्या भक्तांनी आषाढी पौर्णिमेचा दिवस हा गुरू पुजन व त्यांच्या प्रती समर्पणाचा भाव समाजात युगानयुगे राहावा म्हणून एक मंच स्थापन केला. त्या मंचावरून सांस्कृतिक कार्यक्रम व्हावेत ही भावना जोपासून गुरू पौर्णिमा उत्सव साजरा होऊ लागला. तेव्हापासून त्या मंचाचे नाव व्यासपीठ या नावाने ओळखले जाऊ लागले. व्यासपीठ म्हणजे निवडणूकांचा प्रचारासाठी वापरले जाणारे मंच नव्हेत. या व्यासपीठावरून फक्त सांस्कृतिक कार्यक्रम ते ही आपल्या संस्कृतीला सुसंगत असावेत अशी जाणीव आपण ठेवावयास हवी, तरच त्याचे पावित्र्य अबाधित राहू शकते.

स्वाध्याय परिवाराचे प्रणेते पुजनीय पांडुरंगशास्त्री उर्फ दादा आठवले यांनी आपल्या संस्कृती पुजन या पुस्तकात महर्षी व्यासांच्या कार्याची महती एका वाक्यात मांडली आहे ती अशी आहे ---
" व्यक्तीचा मोक्ष आणि समाजाचा उद्धार या दोन्ही आदर्शाकडे अभेद दृष्टीने पाहणार्या, अभ्युदय व नि:श्रेयस या दोहोंचा समन्वय साधणार्या अध्यात्म पारायण अशा व्यासाइतका अधिक योग्यतेचा समाजशास्त्रज्ञ कोणी झाला नाही. त्यांचे वैदिक व लौकिक ज्ञान एवढे अमर्याद होते की सर्व लोकांनी कृतज्ञतापूर्वक म्हटले की व्यासोच्छिष्टं जगत सर्वम आणि व्यासवाणी (महाभारत) सारं विश्वस्य."
गुरू पौर्णिमेच्या उत्सवावर ब्लाॅगवर गुरूवार दिनांक २८ जुलै २०१९ ला मी लेख लिहीला आहे. तो ही आपण वाचावा कारण त्यावरूनच या विषयाची व्याप्ती लक्षात येईल. परंतु तो लेख हिंदी भाषेत आहे. म्हणून त्या लेखातील काही भाग संक्षिप्त रित्या मी मांडत आहे. 

विख्यात महाकवी कालिदासांनी म्हटले आहे की, उत्सव प्रियः खलू मनुष्यः| उत्सव साजरे करणे ही माणसाची स्वाभाविक वृत्ती आहे. जगातील सर्वच देशात आपआपल्या संस्कृती व धार्मिक श्रद्धा व परंपरा नुसार उत्सव साजरे होत असतात. अर्थात या उत्सवामध्यें स्वाभाविक रित्या विभिन्नता असते. परंतु गुरू-शिष्य परंपरा सर्वच देशात आढळते. आपल्या देशात जसे वसिष्ठ- श्रीराम, सांदिपनी-श्रीकृष्ण, शुक्राचार्य-जनक, रामानंद-कबीर, रामकृष्ण परमहंस- स्वामी विवेकानंद, समर्थ रामदास- शिवाजी इत्यादी गुरू-शिष्य जोड्या आहेत, तशाच जोड्या साॅक्रेटीस-प्लेटो, प्लेटो-ऑरिस्टोटल, मार्कस्- लेनीन, इन्सेन-शाॅ इत्यादी विदेशात आहेत. असे असले तरी गुरू-शिष्यांची परंपरा व गुरू पुजन उत्सावाचा जनक आपला भारत देश आहे. आपण म्हणाल ते कसे काय ? तशी कबूली अनेक पाश्चिमात्य विचारवंतानीच दिली आहे. जर्मन विचारवंत शाॅपेनहावर म्हणाले आहेत की ' उपनिषादासारखे उच्च व उदात्त तत्वज्ञान व मानवी जीवनाचे समग्र दर्शन जगाच्या पाठीवर कुठेच नाही.' 

आपल्या देशात ब्रिटीशांच्या राजवटीतले दोन खलनायकांनी आपल्या प्राचीन संस्कृतीचे कौतूक केले आहे. ज्याने बंगालच्या फाळणीचं बीज रोवले असे लार्ड कर्झन यांनी एका मेजवानीत ' आम्ही ब्रिटीश लोक जंगलात राहात होतो तेव्हा भारतात गुरूकुलं होती अशी कबुली दिली आहे. दुसरे खलनायक आहेत ते मेकाॅले ! मेकाॅले हे त्यावेळी ब्रिटीश पार्लमेंटचे सदस्य होते. त्यांच्या सल्ल्यानुसार ब्रिटीश सरकारने आपल्या संस्कृती व धर्मशास्त्राचे सारे ग्रंथ जाळून आपल्या देशाच्या इतिहासाचा अभ्यासक्रमच बदलून टाकला व आपल्याला वैचारीक (शैक्षणिक) व मानसिक दृष्ट्या इंग्रजी शिक्षणाचे गुलाम बनविले. मॅक्सम्युलर नावाचा जर्मन विचारवंत हा मेकाॅलेचा मित्र होता. त्याच्याच मार्गदर्शना खाली मेकाॅलेनी आपले सारे ज्ञानभाडांर मोडीत काढले. तेच मॅक्सम्युलर नंतर  म्हणाले आहेत की, ' मी माझ्या अनुभवाच्या जोरावर शाॅपेनहावरांनी हिंदू संस्कृती संबंधीत जे गौरवास्पद उद्गार काढले आहेत त्याच्याशी सहमत आहे.' अमेरिकन इतिहास तज्ञ व विचारवंत विल ड्युरांट म्हणतात,        ' मनाची विशुद्धता, परिपक्वता आणि व्यापकता या तीन मुल्यांचा अद्भूत संगम घडवून सहिष्णूताचे पालन कसे करावयाचे हे फक्त हिंदु संस्कृतीकडून शिकता येते. काही काळ भारतात ब्रिटीशांच्या राजवटीत काॅग्रेसच्या अध्यक्षा असलेल्या डाॅ ॲनी बेंझट यांची तर हिंदु संस्कृतीवर अपार निष्ठा होती. त्यांनी म्हटले आहे की  'जगातील सर्व देशांनी हिंदु संस्कृती ही आपली जननी मानली तर जगात सहिष्णूता व बंधुत्वाचे वातावरण निर्माण होऊ शकेल.'

गुरू-शिष्य परंपरेतूनच मानव जातीचा सास्कृतिक आणि लौकीक दृष्ट्या विकास झाला आहे. या विश्वाच्या जन्मापासून भूतलावरील पशू-पक्षी व इतर प्राणीमात्र आजही त्याच अवस्थेत आहेत. याचे कारण त्या विधात्याने मानवाला दिलेली बुद्धी प्राणिमात्रांना प्रदान केली नाही हेच होय. मानव हा सामाजिक प्राणी मानला जातो. तो समाजात राहतो. तर पशू-पक्षांचे जीवन सामुदायिक असते. आपल्याला काय हवं आहे याची जाणीव पशू-पक्ष्यांना ही आहे. पण ते मिळविण्यासाठी त्यांच्याकडे मानवा सारखी बुद्धी नाही. पक्षी आपल्या पिल्लांना आकाशात भरारी मारणे शिकवत नाहीत. तसेच सिंह वाघा सारखे हिस्त्र पशू आपल्या बछड्यांना शिकार कशी करावी हे शिकवत नाही. ते अन्न मिळवतात व खाऊन टाकतात. दुसर्या दिवसासाठी लागणारे अन्न साठवून ठेवण्यासाठी त्यांच्यापाशी रेफ्रीजेटर नाहीत. त्यांच्याकडे बुद्धी असती तर ते मानव जातीला डोईजड झाले असते. याचा अर्थ असा आहे की पशू-पक्ष्यांचे जीवन निसर्गाच्या नियमाच्या आधीन आहे. मानव जातीला आकाशातून प्रवास करण्याची प्रेरणा पक्ष्याकडून मिळाली; पाण्यात पोहण्याची कला माणसाला जलचर प्राण्यापासून प्राप्त झाली. समुद्रात दुरवर प्रवास करण्यासाठी बोटी निर्माण करण्याचे ज्ञान अवगत झाले. आपल्या चार पायावर भरधाव वेगाने धावण्यार्या पशूकडून मानवाने चार चाकांची वाहने निर्माण केली. जमिनीवरून सरपटणार्या प्राण्यामूळे माणसाला डोंगरावरून सरपटत जाणारी रेल्वेगाडीची प्रेरणा मिळाली. वृक्ष-वेली, छोटेमोठ्या किटकांपासून ते महाकाय पंचमहाभूतांच्या उदारतामूळे मानव पुष्कळ काही शिकला आहे. 

या उदारतेचं भान वैदिक काळातल्या ऋषीमुनींना होते. म्हणून ऋषीमुनींनी ऋतुनुसार आहार ठेवावा, जितकं पचेल तितकंच अन्न घ्यावे, महिन्यातून एक दिवस तरी उपवास करावा असे सांगत अनेक धार्मिक उत्सवाची निर्मिती केली. निसर्गातील चराचर सृष्टीत ईश्वर सामावलेला आहे. त्या सृष्टीतली उदारता अनुभवून ऋषीमुनींनी अनेक बोधवाक्यें आपल्या समोर ठेवली आहेत. त्यातील दोन मी इथे मांडतो आहे -   

ईशावास्यम इदं सर्वं यत्किच्च जगत्यां जगत | तेन त्यक्तेन भुज्जीथाः मा गृधः कस्यचित् धनम् || (अर्थ - या जगात जे जे काही आहे त्या सगळ्यात ईश्वराचा वास आहे. तेव्हा ते आपले नसून ईश्वराचे आहे असे समजून त्या सर्वाचा उपभोग घे. (पण कशाचाही लोभ धरू नको.) या बोधवाक्यातला उपदेश संपूर्ण मानव जातीसाठी आहे. संपूर्ण मानव जात हव्यास सोडून काटसरीत जीवन जगली तर हवा, पाणी, उर्जा, इंधन, जमीन इत्यादी महत्वाच्या घटकाची वानवा पडणार नाही आणि विश्वात शांतीचे राज्य येईल. 

दुसरे बोधवाक्य असे आहे--
'अयं बन्धुरयन्नेति गणना लघु चेतसाम् 
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ||
(अर्थ -- हा माझा बंधू आहे आणि तो नाही असा हिशोब संकुचित किंवा क्षुद्र बुद्धीचे लोक करतात. परंतु उदार-उच्च चारित्र्याचे लोक संपूर्ण पृथ्वी म्हणजेच वसुधा हेच एक कुटुंब आहे असे मानतात. आपल्या ज्ञानेश्वर महाराजांनी ही म्हटले आहे 
' हे विश्वची माझे घर | ऐसी मति जयाची स्थिर | किंबहुना चराचर | आपणची जाहला || 
 अनेक शिक्षण संस्थानी ' वसुधैव कुटुम्बकम् हे बोधवचन स्विकारले असले तरी त्यातील प्रमुख आणि महत्वाचे उदाहरण म्हणजे पुणे येथील सिम्बाॅयोसिस ( Symbiosis) या जगद्वविख्यात शिक्षण संस्थेचे होय. भारतिय विद्यार्थींबरोबरच बहुसंख्येने येणार्या परदेशी विद्यार्थ्यांनी आदराने स्विकारले आहे. दक्षिण मुंबईतील एस् एन् डी टी महिला विद्यापिठाच्या गीतात (प्रार्थनात)  ' विश्व है परिवार, भारत घर हमारा है सामावून घेतले आहे. वाचक हो अनेक शिक्षण संस्था तसेच सांस्कृतिक संस्थानी आपल्या संस्कृतील अनेक बोधवचने स्विकारली असली तरी ' विद्या ' या शब्दावर सर्वात अधिक बोधवचने वैदिक संस्कृतीत आढळलेली दिसून येतात. 

वाचक हो शिक्षक दिन हा उत्सव अलिकडचा आहे. एका परीने हा उत्सव गुरू-शिष्य परंपरेची पुढील आवृत्ती आहे. म्हणून या लेखाच्या भाग-१ चा विस्तार वाढला त्याबद्दल दिलगिरी व्यक्त करून या लेखाची समाप्ती करतो. 



 










आपण व आपले उत्सव--मातृदिन (भाग १)

आपण व आपले उत्सव-- मातृदिन   देवीयों और सज्जनो नमस्कार ! हमारी मातृभूमी को देव-देवताओंकी भूमी माना जाता है | इसका कारन हमारे यहाँ सृष्टी हर ...