बुधवार, ९ सप्टेंबर, २०२६

आपण व आपले उत्सव--मातृदिन (भाग १)

आपण व आपले उत्सव-- मातृदिन  

देवीयों और सज्जनो नमस्कार !

हमारी मातृभूमी को देव-देवताओंकी भूमी माना
जाता है | इसका कारन हमारे यहाँ सृष्टी हर साल तीन ऋतु याने बरसात, ठंडी और गर्मी के स्वरुप में  प्रगट होती है | यह सृष्टी निर्माता की हमपर कृपा है | हमारे आयुर्वेद के अनुसार बरसात ऋतु रोगी, ठंडी भोगी और गर्मी योगी माना जाता है | इसिलीए ऋषिमुनियोंने चातुर्मास की रचना स्थापीत कियी और चातुर्मासको एक व्रत पर्वका स्वरूप दिया | इस व्रत पर्व पर देशके सभी प्रांतो में कथा-कथन के कार्यकम हर साल होते है | इसिलीए मै यहाॅ मातृदिनकी महत्ताको प्राधान्य दे रहा हूँ | 

श्रावण मास को हमारी संस्कृतीमे पवित्र  माना जाता है | नागपंचमी, स्वतंत्रता दिन, रक्षाबंधन-नारीयल - सागर पोर्णिमा, अश्र्वथमारुती, जन्माष्टमी -गोपाळकाला,  ज्ञानेश्वर महाराज जयंती, ऐसे उत्सवोंसे हमें मिलनेवाली खुषीके साध उत्साह और बल की प्राप्ती होती है | हमारे समाजके हर घरमें मनाये जानेवाले धार्मिकोत्सव की व्यवस्थाकी जिम्मेदारी बिना किसी प्रकारकी तक्रारके हमारे परिवारकी तथा रिश्तेदारोंके  घरकी नारीशक्ती उत्सवोंकी संपन्नता करती है | यह सौ प्रतिशत सच्ची बात है | इसिलीए हमारे ऋषिमुनियोंने श्रावण मासकी अमावास्याके (पिठोरी अमावास्या) दिनको मातृदिन उत्सव की रचना रखी है | गये गुरुवार 10 सिंतबर शामको यह उत्सव मनाया गया | इस उत्सव की खासियत ऐसी है की हम बचपनसे देख रहे की इस उत्सवमें इस दिन धार्मिक पुजा-अर्चन नारीयोंके हात से होती है | नारी याने हमें इस सृष्टीका रमणीय दर्शन देनेवाली माता |

हमारे देशके सभी प्रान्तीय भाषाओंके वंदनिय अध्यात्मिक गुरू, प्रवचनकार, संत-महंत, साहित्यिक, गायक, गीतकार, संगीतकारोंने  अपनी वाणी, लेखणी,गायकी और कला द्वारा वैदिक कालसे चलती आयी माताकी महत्ताको लाजबाब ढंगसे आम आदमी तक पहुचांई है | इन सभीकौ मेरा सादर प्रणाम ! 

देवीयों और सज्जनों, मै जब बोरीवली (प) श्री राम मंदिर मार्ग, बाभई स्थित आनंदराव पवार सरस्वती विद्यालयमे सचीव पद की जिम्मेदारी निभाता था तब मुझे  ' मातॄदिन ' पर अकस्मात  भाषण करनेकी विनंती प्राथमिक विभाग की तत्कालीन मुख्याध्यापिका कुडईकर मॅडम के तरफ हुई, तब मैने भाषण किया था | उस अवसर से मुझे 'मातॄदिन' पर लेख लिखनेकी प्रेरणा हुई थी | लेकीन अन्य जिम्मेदारी और स्वास्थ्य के कारण मै लेख नही लिख सका | वह भाषण समय के अभाव के कारण संक्षिप्त रहा | लेकीन इस लेखकी अंतिम पॅरा उसी संक्षिप्त भाषणका  विस्तार बढाकर किया है | 

अमेरिका मे हुई सर्वधर्म परिषदमें स्वामी विवेकानंद के भाषण से प्रभावित अमेरिकन सामाजिक, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं द्वारा स्वामीजी के जगह-जगह मे भाषण एवं हिंदु संस्कृती और हमारी नारीयोंकी सामाजिक स्थान इस विषयपर प्रश्नोत्तर कार्यकमोंका सिलसिला हुआ था | उसमेंसे दो प्रसंग यहाँ रखता हू जिससे हमारे नारीयोंका प्राचिन कालसे कैसा सन्मान होता है इस सत्यकी जानकारी एवं प्रचिती स्वामीजी के व्याख्यान तथा पत्रकार परिषद से दुनिया को हुई |

स्वामीजी के व्यक्तिमत्व से प्रभावित हुई अमेरिकन युवती स्वामीजी के पास आयी और कहा ' स्वामीजी, मुझे आपसे शादी करनेका यौग आता है तो कितना अच्छा होता | मुझे आपके जैसा सुदंर तथा बुद्धिवान पुत्र हो ऐसी इच्छा है | स्वामीजी ने स्मितहास्य से जबाब दिया ' यह तो बहूत साधी बात है, माता तुम मुझे तुम्हारा पुत्र मान लो |' स्वामीजी का जबाब सुनकर वहाॅ उपस्थित पुरूष और महिला चकीत हुए | उन्हे महिला- पुरूष संबंध को ऐसी उदात्त कल्पना अपरिचीत थी |

दुसरी जगह स्वामीजी का भाषण समाप्त होनेके बाद  एक श्रोता ने पुछा ' आपके देशमे महिलाओंको पुरूषोंके समान माना जाता है ?' इसपर स्वामीजी ने  ' नही ' ऐसा जबाब दिया |' तुरन्त सभागृह में  " धिक्कार,  धिक्कार, धिक्कार !! "  इस आवाज का कल्लोळ मच गया | थोडी देरमें  सभागृह मे शांती हुई | उसके बाद स्वामीजी खडे होकर धीरगंभीर मुद्रा, और सभागृह के चारो तरफ नजर डालकर कनखती आवाजमे " कारण भारतमें नारियोंको पुरूषोंसे श्रेष्ठ माना जाता है | " स्वामीजी का पुर्ण जबाब सुनते ही सभागृह मे  तालियोंका लगभग तीन मिनीट तक आवाज 
घुंमत रहा | 

उपर के दो प्रसंग के बारेमे अध्यात्मिक और  समाजशास्त्र के गाढे अभ्यासक प्राध्यापक प्र.ग. सहस्त्रबुद्धे जीवनमूल्ये भाग ३ मे कहते है की 
" स्वामीजी के अधिकृत चरित्र में ऐसी कथा पढनेको मिलती नही | वह कल्पित याॅ अतिरंजित हो, पर एक बात निश्‍चित है की इस कथाद्वारें  जीवन विषयक एक महान सिद्धान्त का उद्घाटन हुआ | नारीयोंपर देखनेका भारतिय दृष्टीकोन प्रकट हुआ | स्वस्थ, सुव्यवस्थित, आदर्श एवं उन्नतीप्रवण भारतिय समाजकी स्थिती-गती चित्रीत हुई है |"

हमारे, धार्मिक उत्सव के रचनाकारोंने वेद, उपोनिषोद,  स्मृती, श्रुती, आरण्यके, ब्राह्मण्यके जैसे ग्रंथ मानवी जीवनमुल्योंसे खचाखच भरे  हुए है | उसमे से एक महत्वपूर्ण  ' नारीयोंका सन्मान करना ' यह है | इस मुल्य के बारेमे एक श्लोक है,| वह निचे रखता हूँ -----
    यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवठत: |
  यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वस्वात्राफला: क्रिया: || 
(जिस घर मे आबालवृद्ध द्वारा नारियोंका उचीत सन्मान किया जाता है ऐसे घर मे देवता वास करते है | जिस घर मे उनका सन्मान नही होता है, वहाॅ दान, जप,तप,आदि क्रिया विफल होती है ) मनुऋषीने बताया यह तत्व भारतीय सुखी एवंम समृध्द जीवनका आधारसूत्र है | यही तत्व रामायण, महाभारत, भागवत आदि ग्रंथोंमे विवीध दृष्टान्त द्वारा पेश किया है |

लडकी- युवती हो, सौभाग्यवती- प्रौढा हो, या विधवा हो,  हमारी संस्कृतीमे नारीको  हर अवस्था मे वंदनिय माना जाता है | लेकीन माताका स्थान सर्वोच्च माना गया हे | महर्षी व्यास ने कहा है --
' पितृरप्याधिका माता गर्भधारणपौषणात्
अतो हि त्रिषु लोकेषु नास्ति मातृसमो गुरु: || 
( माताका स्थान  पिता से भी श्रेष्ठ है |  माता बाल-बालिका को गर्भ मे धारण करती है | जन्म होनेके बाद पालन - पोषण करती है | त्रिलोक मे ढुंडके भी माता से अधिक थोर नही दिखता है |)

नास्ति गंगासमं तीर्थ नास्ति विष्णुसम: प्रभु;
नास्ति शंभुसम: पूज्यो नास्ति मातृसमो गुरू: ||
(गंगा जैसा तीर्थ नही है, विष्णूसम प्रभू नही, महादेव जैसा वंदनिय नही, माता जैसा गुरू नही)

देवीयों और सज्जनो, महादेव जैसा वंदनिय नही ऐसे शंकर भगवान के घर मे माता की महत्ता की कल्पना देनेवाली कथा आप सभीको परिचित है | उमा-महेश्वर के दो पुत्र बाल गणेश और कार्तिक के बिच पृथ्वी प्रदक्षिणा की शर्यत मे हार-जीत का फैसला पार्वती देवी के पास जाता है तब माता-पिता को प्रशिक्षणा से बाल गणेश को विजयी घोषित किया गया | अंतिम निर्णय माताका !महाभारत मे ऐसा कहा है की भीम को भूख लगती और खाना तैयार नही हुआ तब उसकी माता कुंती ने  दिए चावल के चार  दानेसे पेट भरता था | बहुतांश थोर, पराक्रमी, पुरूषोंके यश के पिछे माताका आशिर्वाद तथा पत्नी का सहयोग होता है | इसिलीए माताको शक्तिपीठ और पत्नी को अर्धांगी माना जाता है | 

(इस लेख का भाग -२ निचे जोड दिया है | )
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      आपण व आपले उत्सव (भाग -२)

माता याने त्याग, तपस्या और निरपेक्ष सेवा ! माताकी वाणी, दृष्टी, और स्पर्श का अर्थ प्यार का निरंतर बहता प्रवाह ! प्रतिष्ठान नगरमें दो पडोसी महिला की एक कथा है | एक का नाम था अकुला और दुसरी का नाम था बकुला | बकुलाको पुत्रप्राप्ती हुई | अकुलाने एक दिन बकुलेके बच्चेकी चोरी कियी | मामला न्यायालया में गया |अकुला ने बहूत साक्षीपुरावे दिये | मामला उलझनकी संभवता नही दिख रही थी | तब न्यायाधिश गुस्सेमें आकर बोले ' ठिक है मैं इस बालक के दो समान टुकडे करके दोनोंको बांटता हूं | ' न्यायाधिश साहब ने हातमे कोयता लिया और बालक के टुकडे करनेका पावित्रा लिया, तब बकुला तुरन्त न्यायधिशके पास गयी, उनके चरण स्पर्श करके रोते रोते विनंती कियी, ' साहब बच्चा अकुला को दिजीए, बच्चेकी हत्या मत करो | वह बच्चा कहा भी रहे, पर सुखी रहें यही मेरी इच्छा 
है |' बकुलाकी बात सुनते ही  न्यायाधिशने मामला का निर्णय देकर बच्चा बकुला के हवाली किया | माताका अपने बच्चोंके प्रती प्यार का निरंतर बहता प्रवाह, बच्चों की सुरक्षितता की चिंता एवं ईश्वर की नियमीत आराधना और बच्चोंकी सुखी जीवन की आस अतुलनीय है | माता याने ईश्वरी कृपा, माता याने साक्षात उदारता है ! इसिलीए जगद्गुरू शंकराचार्यने बार बार कहा है -----
" कुपुत्रो जायते क्वचिदपी कुमाता नु भवती     
 ( इस जगत मे कुपुत्र निर्माण हौ सकते है | 
   पर कुमाता? कभी नही ) 

पुरुषार्थ इस शब्दका अर्थ सिर्फ पुरूषोंकी विशेषत: नही है | पुरूष यह एक मानव नामके प्राणी का एक लिंग (Gender ) है | कोई भी नारी पुरूषोंसे दुर्बल नही होती | स्त्री-पुरुषोंमे सिर्फ साम्य है यह बात पुर्ण नही है | स्त्री-पुरुषका का एकत्व निदर्शित करने वाले भगवान अर्धनारीनटेश्वर भारतीय जनजीवन का महत्वपूर्ण आधार है | इस आधार की पुष्टी हिंदू संस्कृतीके
ग्रंथोंमे इस तरहका है---
' स्वेच्छामय: स्वेच्छया च  द्विभार्या बभूव |
 स्त्रीरोग वामभागांशो दक्षिणांश: पुमान् स्मृत:||'
(वह स्वेच्छामय परमेश्वर सृष्टीका प्रारंभ मे खुद दो रुपमे प्रगट हुआ | परमेश्वर के वाम अंश को नारी और दाहे अंशको पुरूष  कहा गया है |') संत  ज्ञानेश्र्वर महाराज अपने 'अमृतानुभव' ग्रंथोंकी शुरूआत उपर के श्लोक की मराठी भाषामे इस तरह पेश कियी है -----
                ऐसी ही निरोपाके 
                जगाची जिथे जनके
                तिथे वंदिली मिया मूळिके 
                देवोदेवी||१||
                जया एकसत्तेचे बैसणे   
                दोघां एका प्रकाशाचे लेणे
                जे अनादि एकपणे
                 नांदती दोघे || ८ || 
(ही एकत्वाची भावना मनात रुजलेली असली म्हणजे द्वैत उत्पन्न होत नाही. द्वैत जर नाहिसे झाले तर आपोआप सगळी भांडणे निर्मूल  होतात.)

' नारी बिना पुरुष का जीवन अधुरा और पुरुष बिना नारिका जीवन अधुरा रहता है | प्रपंच नामक रथ के प्रवास मे अर्धनारीनटेश्वर की प्रतिमा सदैव मनमे रखे तो रथमे ना दुरावा रहेगा ना घटस्पोट जैसा अपघात होगा |' यह मेरा उपदेश ना समझे, यह मेरी राय है समझे, ऐसी नम्र विनंती करके मै इस लेखकी अंतिम पॅरा आपके सामने रखता हूँ |

 " देवी और सज्जनों,  ' स्त्री को शक्तिपीठ और गुरू क्यों माना गया इस पर हमारी चर्चा हुई है | हमारी संस्कृतीका वैदिक कालसे आजतक के इतिहास पढे तो नारियोंकी तपस्या तथा रण मैदान पर का पराक्रम ऋषीमुनीयोंसे और क्षत्रियोंसे कम नही है | जीवन के हर क्षेत्रमे  देशका जो आजतक विकास हुआ है उसमें नारीयोंका योगदान भी पुरूषोंके योगदान से कम नही है | लेकीन यह सब बातें स्त्री-पुरुष समानता की है | इसपर स्वंतत्र लेख लिखा जायेगा | स्त्री और पुरूषोंकों हर क्षेत्रमे मिली सफलता के पिछे पिता-माता का श्रम और आशिर्वाद सदैव रहता 
है | यह सत्य है |हमारे हिंदू संस्कृतीके ग्रंथोंमे माताका स्थान पिता के स्थानसे उच्च है, यह तो त्रिकाल सत्य है |

मातृशक्ती की महत्ताकी अनुभूती  'शरीर-विज्ञान'  जिससे हमारे दैनंदिन जीवन का प्रवास होता है उससे आती है |  हर दिन, हर क्षण मे मातृशक्ती विविध रुपमें हमारे साथ रहती है जैसे की --- 
१) अन्नधान्य हमे जिससे मिलती है, वह धरणीमाता है | 
२) सुबहसे चहापान, नाश्ता, लंच, फिर नाश्ता बादमें डीनर अन्य पक्वान्ने यह चीजे अन्न के ग्रुपमें  है | अन्नधान्य से  खाना-प्येय, पक्वान्न माता बनाती है | उसे अन्नपुर्णादेवी माना जाता है | 
३)अन्न,नाश्ता, पक्वाने और पेय की टेस्ट, हमारी टंक से होती है दंतोसे नही |
४) हम बातें करते है, गीत-कविता गाते है वाणीसे| ५) हम बाते, वार्तीलाप, कलह, भाषण, प्रवचन, गीत-किर्तन-भजन सुनते है उसे श्रवणशक्ती कहते है |
६) जो बातें-वार्ता, कथा, ऐताहासिक-भौगोलिक एवं विज्ञान की जानकारी ग्रंथ-कितीबे, मासिक- साप्ताहिक मँगझिन, दैनिक वृत्तपत्रं जैसे माध्यमों से पढते है वह ऑखोंसें याने दृष्टीशक्तीसे है | 
७) एवं अपने परिसरसे लेकर दुनियामे होनेवाली घटनायें प्रत्यक्ष अपनी ऑखोंसे देखें याॅ टिव्ही माध्यमसे उसे भी दृष्टी कहते है |
८)इस ब्रम्हांडसे लेकर ईश्वर निर्मित पंचमहाभूते तथा मानव निर्मित चीजे, विविध प्रकारके यंत्र और तंत्र को हम देख पाते है वह दृष्टीसे !  
९) दृष्टीसे दृष्टिकोनका जन्म होता है, लेकीन हमारे शरीर मे जो कल्पनाशक्ती, मनशक्ती, बौद्धिक एवं शारिरीक आदि शक्तीयाॅ विराजमान है उससे दृष्टी को शक्ती प्राप्त होती है | 
१०) मानव निर्मित सभी  वस्तुयें कारागीर बनाते है उसे हम कारागिरोंकी कला मानते है, वह भी एक शक्ती है | वह शक्ती बहूरूपी है | 
११) अन्नधान्य के अलावा, धरणीमातासे खनिज,  सोना- चांदी का खजिना, विविध प्रकारके यंत्र,  उर्जा, रोड, ब्रीज, निवारा आदि की निर्मिती लिए मटेरिअल धरणीमाता से मिलता है | 
१२) दिक्षा, शिक्षा, पढाईमें पठणशक्तीके रुपमें  सरस्वतीमाता होती है | उससे ज्ञान नाम का फल प्राप्त होता है |
 १३) 'आलस्य कुतो विद्या, अविद्यासे कुतो धनं '
 श्रमशक्ती बिना धनशक्ती का दर्शन नही होता है | १४) घरणीमातासे अन्नपूर्णमाताको अन्न-प्रकिपा की शक्ती प्राप्ती होती है | अन्नसे हमे शारिरीक शक्ती प्राप्ती होती है उसे पचन शक्ती माना जाता है  | ' शरिर माध्यमं खलू घर्म साधनाम् ' (वास्तव्य में शरीर ही धर्म याने कर्तव्य और साधना को पुरा करनेका सबसे पहला साधन है |) इसिलीए शरीरको सेहतमंत बनाये रखना जरुरी है | 
          ' पहला सुख निरोगी काया '
           ' करे योग रहे निरोग '

१५) शरीरशक्तीसे पराक्रमका जन्म होता है, उससे विजय नामका फल उगता है | सच बात यह है की निती, सावधानता एवं चलाखिका अदभूत संगम है | देवोंको भी महिषासुर नामक असूर को नष्ट करनेके लिए दुर्गामाताकी सहायता मांगनी पडी | दुर्गामाता और महिषासुर के बीच नौ दिन भयानक युद्ध हुआ | आखीर दसवे दिन दुर्गामाता ने महिषासुर को नष्ट किया | नौ दिन पराक्रम का मधुर फल का नाम ' विजयादशमी उत्सव | ' 
१६) धनदेव कुबेर हो, लेकीन इसमें शक्ती महालक्ष्मी माता के रूपसे है | 

देवीयों और सज्जनों, आषाढ मासकी अमावास्याके दिन द्विपोत्सव मनाया जाता है | जैसे द्विप ज्ञानयोग, भक्तीयोग ओर कर्मयोग का प्रतिक है, उसी तरह 'माता '  महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का प्रतिक है | इसिलीए हर धार्मिकोत्सव तथा विवाह, व्रतबंध, गृहप्रवेश आदि धार्मिक विधी में देव-देवतांओंकी पुजा-अर्चा कें बाद पुष्पांजली और मंगलाष्टक में 
उमा-महेश्र्वरकी जय, राधा-दामोदरकी जय, लक्ष्मीनारायणकी जय, सियारामचंद्रकी जय ऐसे घोष वैदिक कालसे निरंतर शुरु है और सृष्टीका अंत तक शुरु रहेगा ऐसी भावना व्यक्त करके मैं विराम करता हूँ |
                    जय माता दी !



               
          
                 
                   



  

 

 

शुक्रवार, ४ सप्टेंबर, २०२६

आपण व आपले उत्सव -- रक्षाबंधन भाग १

       आपण व आपले उत्सव--- रक्षाबंथन 
                      (भाग १)

नमस्कार  मंडळीं,
वयोमानानुसार  तब्येतीच्या कुरबुरी सुरू होणे हे स्वाभाविक आहे. केस पांढरे होणे, दृष्टी कमी होणे, ऐकू कमी होत जाणे, सांधेदुखी सुरू होणे असे आजार साठी ओलांडल्यानंतर बहुतांश लोकांना होतात असे डॉक्टरांनीच सांगितले. त्यावर मी डॉक्टरांना म्हटले की 'हे सारे आजार एक प्रकारे आपला भार सांभाळणाऱ्या धरणीमातेकडे भरलेला कर आहे. ' यावर डॉक्टर हसत हसत म्हणाले  ' तुम्ही CAच्या भाषेत आजाराचे वर्णन केले .'  मंडळी, पैशाचे सोंग घेता येत नाही. तसेच निरोगीपणाचा आव आणू नये. डॉक्टरांच्या सल्ल्यानुसार पथ्यपाणी व औषध घेत राहिलो तर तब्येतीत सुधारणा होते हे मला अनुभवयास आले. जवळपास एक वर्षांनंतर ब्लॉगवर आपल्या भेटीस आलो आहे.  

सन २०१७ ला हिंदू नववर्ष प्रतिपदा गुढी पाडव्याच्या दिवशी  ' विचारमंथन ' ब्लॉगची मुहूर्तमेढ रोवली. ब्लॉगवर राजकीय घडामोडींवरील लेखांची संख्या थोड्या प्रमाणात अधिक असली तरी 'आपण व आपली दैवते',  'आपण व आपले उत्सव ', 'तस्मात उत्तीष्ठं कौन्तेय  युद्धाय कृतीनिश्चय:।'  'कर्मण्ये वाधिकारणास्ते मा फलेषु कदाचन |' 'सर्वात मौल्यवान शिक्षण कोणते?,  पर्यावरण,    
' चित्रपट व समाजमन '  सामाजिक व शैक्षणिक क्षेत्रातील विषयांवर ही लेख लिहले आहेत. आपणांस हे केवळ ठाउकच नव्हे तर अशा लेखांवर ही आपण माझे कौतुक  केले आहे. वस्तुत: मी लेखक नाही. आपल्या संस्कृतीच्या अभ्यासकांनी विविध विषयांवर लिहून  ठेवलेल्या पुस्तकांचा आधार घेत मी लिखाण करतो.  आपल्या सारख्या वाचकांच्या प्रतिसादांतून लेख  लिहण्याची इतकी प्रेरणा मिळत आहे की मी आपला सदैव ऋणी राहणार हे निश्चित. तोच माझा स्वर्गीय आनंद आहे .

रक्षाबंधन हा उत्सव अनादि  काळापासून  आपल्या देशात साजरा होत आहे. म्हणून  या उत्सवावर आपल्याशी संवाद करावा अशी प्रबळ इच्छा निर्माण झाली. म्हणून मी लेखणी हातात घेतली. सन २०२४ पर्यंत दर वर्षाला सरासरी लेखांची संख्या तीस ते पस्तीस होती. आता तितकी संख्या मी पार पाडू शकेन असे मला वाटत नाही. याची आपणांस  जाणीव आहे या बाबतीत माझ्या मनात शंका नाही.  
समर्थ रामदास स्वामींनी म्हटले आहे ' दिसमाजी काही तरी लिहावे. ' समर्थ रामदास स्वामींचे पुढचं वाक्य या ठिकाणी मांडण्पा इतकी क्षमता माझ्यात नाही.
 
लेखनासाठी विषयाचे विशेषत: राजकीय क्षेत्रात जगभर भरघोस पीक उगवत आहे. त्यासंबंधी आश्चर्य वाटत नाही. राजकारण एक असे क्षेत्र आहे की सकाळी माध्यमात जे पीक उगवते ते दुपारी कोमजून जाते आणि दूसरेच पीक उगवते. संध्याकाळ होताच दुपारचे पीक कोमजून जाते. कारण Throughout  the world politics has become a matter of perception and narrative only. त्यामुळे राजकीय क्षेत्रातील घडामोडीं संबंधित चर्चा, मुलाखती, लेख इत्यादींची सर्व प्रकाराच्या माध्यमांत प्रचंड गर्दी झालेली दिसते. गर्दीतून गोंधळ होत असतो. This is also one of the laws of Nature.  असे असले तरी ब्लॉगवर राजकीय लेख लिहणार आहे .

जवळपास एक वर्षभर दूर राहिल्याची खंत आहे, ती कमी करण्याची सुरवात रक्षाबंधन सारख्या पवित्र उत्सवा संबंधित लेखाने करावी अशी  इच्छा झाली. आपल्या संस्कृती मधील उत्सवांवर चर्चा, संवाद किंवा लेख इत्यादी उपचार उत्सवाच्या समाप्ती नंतर  करू नयेत असे बंधन नाही. हीच आपल्या संस्कृती ची महत्ता आहे.  मागे  नवरात्रोत्सव व विजयादशमी उत्सवा च्या समाप्ती नंतर मी  ' शक्ती उपासना ' या शिर्षकाचे  नऊ लेख ब्लॉगवर पब्लिश केले आहेत. आपल्या उत्सवातूनच आपल्याला उत्साह तसेच  बळ प्राप्त होत असते. आपल्या संस्कृतीचे व आपल्या देशाचे रक्षण करण्यासाठी समाजात एकोपा वाढला पाहीजे हीच विविध उत्सावातून शिकवण मिळत असते.

रक्षाबंथन या उत्सावाच्या नावातील रक्षा आणि बंधन या दोन शब्दांचा स्वतंत्र रित्या अभ्यास केल्यानंतर रक्षाबंधनाचा उत्सव भाऊ-बहिणी पुरता मर्यादीत नाही हे कळते. विद्यमान जागतिक राजकारण तसेच विदेशी शक्तीच्या आहारी गेलेल्या काही विरोधी पक्षांच्या नेत्यांना जडलेल्या अवदासा मुळे रक्षाबंधन उत्सवाची व्यापकता वाढविण्याचा प्रयत्न  देशाच्या कानाकोपऱ्यातून होणे आवश्यक झाले आहे.  सीमेवरून  होऊ शकणार्या धोक्यापासून  एक नागरिक म्हणून प्रत्येकाला सजग राहावे  लागेल. रक्षाबंधन उत्सव हा केवळ उत्सव नसून मानव म्हणून जो जन्म मिळाला आहे त्याची सार्थकता ठरावी ही शिकवण त्यातून मिळाते. आपला देश सुरक्षित राहीला तरच आपली संस्कृती टिकेल. संस्कृती टिकली तरच आपले उत्सव टिकतील.  

वाचकहो , रक्षाबंधन उत्सवाच्या एक दिवस अगोदर X वर भाजपाचे प्रकांड पंडीत श्रद्धेय डाॅ. सुधांशु त्रिवेदी यांनी संस्कृत श्लोकाने सुरवात करीत रक्षाबंधनाच्या दिलेल्या हार्दिक शुभेच्छा    वाचल्यानंतर माझा आत्मविश्वास वाढला. तसे पाहता सामान्यात: हार्दिक शुभेच्छाचं स्वरूपच गोड असते. असे असले तरी  X वरील डॉक्टर सुधांशु त्रिवेदी यांच्या हार्दिक शुभेच्छा वाचल्यानंतर आपल्या रक्षाबंधन उत्सवाची सुंदरता व व्यापकताचं विलोभनिय दर्शन झाले. म्हणून Xवरील त्यांच्या हार्दिक शुभेच्छा आपल्या समोर प्रथम ठेवत या लेखाची सुरुवात करतो.

" येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वाम् अभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चला॥"
(अर्थात जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र मैं तुम्हें बांधती हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा, हे रक्षा तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना।)
रक्षाबंधनके अवसरपर, रक्षासुत्र  बांधते समय बोला जानेवाला यह श्लोक याद दिलाता है की भारतिय  संस्कृतीमे असुर माने जानेवाले  राजा बलिमे यदि कोई गुण है तो उसका भी सन्मान और रक्षाबंधन किया जाता है | मुझे लगता है की इससे अधिक  उदार और  उदात्त  विचार पुरे विश्वमे देखनेको नही मिल सकता | If any so called self proclamaid liberal can find it in any other  culture ?  अत: हम सब आजके  इस पावन पर्व पर इस महान संस्कृती पर होनेवाले प्रत्यक्ष और वैचारिक दुष्प्राप्य के आकमण से रक्षा का संकल्प भी देना चाहिये | " डॉक्टर सुशांधु यांच्या हार्दिक शुभेच्छा आपल्या सर्वांना पसंत पडल्या असाव्यात या बाबत माझ्या मनात किंचीत ही शंका नाही. 

रक्षाबंधन उत्सवाच्या अनेक कथा आपल्या पुराणात आहेत. आपल्या समाजातील बहुतांश लोकांनी त्या कथा वाचल्या आहेत. माहिती आणि तंत्रज्ञान क्षेत्रातील प्रगतीमुळे आपल्याला 
यु ट्यूबवरील विडीओ द्वारे आपल्या बहुतांश उत्सवांची माहिती ऐकावयास मिळते. म्हणून या ठिकाणी फक्त भगवान श्रीविष्णू च्या वामन अवतार काळात घडलेली रक्षाबंधनाची कथा  थोडक्यात मांडतो.  

बळी राजा दानशूर  होता. इंद्रपद जिंकल्या इतकी ताकद त्याला मिळत गेली. त्यातुनच  देव व असुर यांच्यामध्ये  घनघोर युद्ध सुरु झाले होते. देव  पक्षाचा पराभव दिसू लागला, इंद्रदेवाचे आसन धोक्यात आले तेव्हा इंद्राच्या पत्नीने आपल्या पतीच्या उजव्या हाताच्या मनगटावर रक्षा सूत्र बांधले. येथूनच रक्षाबंधनाची सुरवात झाली आहे असे मानले जाते. 

वरील कथेतून हे स्पष्ट होते की राजेशाही राज्यव्यवस्थेत युद्ध- स्थितीत राजाचा विजय व्हावा म्हणून त्याच्या पत्नीने पतीच्या हाताला रक्षा सुत्र बांधण्याची रीत होती. राजाचा विजय म्हणजे राज्यातील प्रजेचं रक्षणच की !. आपल्या देशात सन १५३४-३५ च्या सुमारास गुजरातच्या सुलतान बहादूरशहाने प्रचंड सैन्यासह मेवाडच्या चित्तोडगडावर आकमण केले होते. तेव्हा राणी कर्णावतीने आपल्या राज्याच्या रक्षणासाठी      मोगल बादशहा  हुमायुनला भाऊ मानुन राखी पाठविली होती. हुमायुनने कर्णावतीच्या  राणीचा आदर राखत आपले सैन्य पाठविले हौते. पण दुर्दैव असे की ते सैन्य मेवाडला पोहोचण्यास उशीर झाला होता. मेवाड राज्याचा पराभव झाला होता. पुढे हुमायुनने मेवाड जिंकून ते राज्य कर्णावतीच्या मुलाला बहाल केले. यातुन राखी ची म्हणजे रक्षा सुत्राचं पावित्र्य आणि बळाची प्रचिती येते.

बळी राजाचा प्रभाव तिन्ही लोकात वाढला होता.त्यामुळे असुरांनी थैमान घालण्याची सुरवात केली होती. हा प्रकार ऐकुन बळी राजाचे आजोबा भक्त प्रल्हाद नाराज झाले होतेच. देवांनी भगवान विष्णूला अवतार घेण्याची विनंती केली.  भगवान विष्णूनीं बटूचे रूप घेऊन बली राजाकडून तीन पावलांची भूमी मागितली.  बटूच्या दोन पावलात बळी राजाचे साम्राज्य संपले. बटूचे तिसरे पाऊल ठेवावयास जागा शिल्लक  राहिली नाही. बळी राजाने वामन देवास तिसरे पाऊल स्वत:च्या माथ्यावर ठेवण्याची विनंती केली. वामनाने तिसऱ्या पावलाने बळी राजा पातळात गेला. भगवान वामनाने बळी राजाच्या दानशूरतेचं कौतूक केले आणि  बळीराजाला त्रिलोक पैकी पाताळ लोक स्वाधीन केला. बळी राजाने वामनाकडून एक वचन मागितले होते. ते म्हणजे पाताळातील राजमहालाच्या द्वारावर भगवान वामनाने तिष्ठत राहावे. वामनाने ते मान्य करुन पाताळात बळीच्या दारात तिष्ठत राहिले. इथे वैकुंठात आपले पतीराज परत आले नाही म्हणून माता लक्ष्मीदेवी चिंतेत पडली. तिने नारद मुनींना विचारले तेव्हा त्यांनी हकिकत सांगितली. नंतर महालक्ष्मी बळी राजाच्या घरी जाऊन बळीच्या उजव्या हाताच्या मनगटावर राखी बांधून आपल्या पतीला वैकुंठात घेऊन जाण्याची विनंती केली. ती बळीने मान्य केली. रक्षाबंधन उत्सवात पावित्र्य  किती अमर्याद आहे या कथेतून उमजते.
                   धन्यवाद!
( या लेखाचा भाग --२ सोबत जोडला आहे.)
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          आपण व आपले उत्सव 
               रक्षाबंधन (भाग -२) 

आपल्या ॠषीमुनींनी प्रत्येक उत्सावाचे  प्रयोजन अशा प्रकारे केले आहे की त्यातून आपला समाज प्रगतीपथावर राहावा, आपल्या जीवन मूल्यांचा  जगभर  प्रसार व्हावा आणि आपला देश विश्वगुरू राहावा, या हेतूनेच  उत्सवांची रचना ऋतुनुसार आखली आहे. ऋतुनुसार आहार - विहार तसेच विविध  आजारांपासुन रक्षण व्हावे  म्हणून आयुर्वेद निर्माण करुन ठेवला आहे.

स्वाध्याय  परिवाराचे प्रणेते पुजनीय पांडुरंगशास्त्री आठवलेजींनी  संस्कृति - पुजन या ग्रंथात ' श्रावणी  पौर्णिमा ' वर केलेल्या व्याख्यान द्वारे रक्षाबंधन उत्सवाची महत्ता व पावित्र्य मांडले आहे ते आपल्या समोर सारांश रुपात ठेवतो आहे. 
" रक्षाबंधन म्हणजे प्रेम-बंधन. आजच्या दिवशी बहीण भावाच्या हातात राखी बांधते आणि त्याच बरोबर त्याला ह्रदयाच्या प्रेमाने बांधते आणि त्याच्या रक्षणाची कामना करते. हा उत्सव म्हणजे पराक्रम, प्रेम, संयम आणि भक्ती यांचा संगम होय. रक्षाबंधनाचा  उत्सव म्हणजे दृष्टि परिवर्तनाचा सण. बहिणीने हातात राखी बांधताच भावाचा दृष्टिकोन बदलून जातो. बहिणीच्या रक्षणाची जबाबदारी तो स्वत:वर घेतो. त्यामुळे बहीण समाजात निर्भय बनून फिरु शकते. "

राखी बांधण्यापुर्वी  बहिण भावाच्या कपाळाला टिळा लावते, तो टिळा म्हणजे  म्हणजे दोन डोळ्यां शिवाय भोगाला विसरुन भाव-दृष्टिने जगाला पाहण्यासाठी  जणू तिसरा एक पवित्र डोळा होय. भावाच्या हातात रक्षा बांधून बहीण त्याच्या पासून केवळ स्वत:चे रक्षण इच्छिते असे नाही तर समस्त स्त्री जातीला स्वत:च्या भावाचे रक्षण मिळावे अशी व्यापक इच्छा करत असते.  त्याच बरोबर बाह्य शत्रूवर  व आंतरविकारांवर भावाने विजय मिळवावा ही भावना देखील त्यात सावरलेली आहे. "

स्त्रीकडे विकृत नजरेने न पाहता पवित्र दृष्टी  हा महान संदेश देणाऱ्या रक्षाबंधन उत्सव कुटुंबा पुरता मर्यादीत न राहता त्याचे सामाजीकरण होणे आवश्यक आहे. शक्ती उपासना या लेख मालिकेत जिहादी वृत्तीची टोळी प्रेमाचे नाटक करीत शालेय व महाविद्यालयीन मुलींना कसे आपल्या पाशात घेतात यावर  सविस्तर  माहिती मी मांडली आहे.  कुटुंब प्रमुखांनी आपआपल्या गावात, चाळीत, गृहसंस्थात सामुहिक रित्या जागरूक  राहून जिहादी वृत्तीच्या टोळीचा वावर आसपासच्या शाळा व महाविद्यालय परिसरात दिसला तर लागलीच छत्रपती शिवाजी महाराजांच्या गनिमी काव्याचा उपयोग करून त्या टोळीचा नायनाट करण्याची हिम्मत व शक्ती निर्माण करणे आवश्यक झाले आहे. त्यासाठीच  रक्षाबंधन उत्सवाची रचना ऋषिमुनींनी आखली आहे. समाजात हिम्मत व शक्तीची वृद्धी  सांघिकतातूनच होत असते .

वाचक मित्र हो, आपल्या उत्सवांच्या रचना व त्याच्या पाठीमागील प्रयोजनाचा थोडाफार अभ्यास केल्यानंतर उत्सवांची खोली थोडाफार प्रमाणात आपल्याला कळू शकते. मला रक्षाबंधन उत्सवा संबंधित जे थोडेफार आकलन झाले आहे ते सांगून या लेखाची समाप्ती करतो. 

" रक्षाबंधन ' या उत्सवाचं एक आगळं-वेगळं स्वरूप आहे असे मला वाटते. वैदिक काळात आपल्या देशातील राजे -महाराज आपआपल्या राज्यात अश्वमेध यज्ञ, होम, विविध शांती,  युवराजाचाा गुरुकुलात प्रवेश, पुढे  राज्याभिषेक इत्यादी विधी पार पाडणारा, पुरोहित विधीच्या आसनावर बसणाऱ्या यजमानांच्या उजव्या हातात रक्षा सुत्र बांधून विधीकार्याची सुरवात करीत असत. आजही आपण आपआपल्या कुटुंबात गृह प्रवेश, मुलगा-मुलीचा विवाह, बालकाचं बारसं, सत्यनारायणाची पूजा इत्यादी विधी यजमानाच्या उजव्या  हाताला 
रक्षा-सुत्र बांधल्या शिवाय सुरवात होत नाही. या सर्व प्रसंगी आपल्यातील चंचलता, क्रोध, मोह इत्यादींचा नाश होउन त्या जागी एकाग्रता, मृदुता  निर्मोह इत्यादींचा आधारवड आपल्याला मिळतो. 

आपल्या हातालाच राखी बांधली जाते याचे कारण आपला हात पुरूषार्थचे प्रतिक मानले जाते. सकाळी हाताचे दर्शन घेतो तेव्हा आपला पुरुषार्थ जागृत होतो. मी कुठलेही कठीण कार्य करु शकतो असा आत्मविश्वास बळावतो. तर सायंकाळी देवघरात दिवा लावतो. दिव्याची प्रार्थना करतो. अति आत्मविश्वास संकटात फेकुन देतो. दिवा विनम्रतेचं प्रतिक आहे. म्हणून आपणांस आपल्या पुरुषार्थ किंवा कठीण कार्यात मिळालेले यश  ईश्वराची कृपा असल्याची भावना आपल्या मनात जन्मत: रुजलेली असते ती दिवसेंदिवस वाढत असते असे मला वाटते. ' जसे आपल्या घरातील देवघरात सायंकाळी जो दिवा लावतो त्या दिव्याची ज्योत, तेल,आणि वात हे ज्ञानयोग, भक्तीयोग आणि कर्मयोग यांच्या  मधील एक अलौकिक समन्वय आहे, असे माझ्या वाचनात आले आहे. तसेच रक्षासुत्र म्हणा वा राखी त्यातील तीन धागे तिन्ही योगाचे प्रतिक असावे.
                     धन्यवाद !

   







































































आपण व आपले उत्सव--मातृदिन (भाग १)

आपण व आपले उत्सव-- मातृदिन   देवीयों और सज्जनो नमस्कार ! हमारी मातृभूमी को देव-देवताओंकी भूमी माना जाता है | इसका कारन हमारे यहाँ सृष्टी हर ...