आपण व आपले उत्सव-- मातृदिन
हमारी मातृभूमी को देव-देवताओंकी भूमी माना
जाता है | इसका कारन हमारे यहाँ सृष्टी हर साल तीन ऋतु याने बरसात, ठंडी और गर्मी के स्वरुप में प्रगट होती है | यह सृष्टी निर्माता की हमपर कृपा है | हमारे आयुर्वेद के अनुसार बरसात ऋतु रोगी, ठंडी भोगी और गर्मी योगी माना जाता है | इसिलीए ऋषिमुनियोंने चातुर्मास की रचना स्थापीत कियी और चातुर्मासको एक व्रत पर्वका स्वरूप दिया | इस व्रत पर्व पर देशके सभी प्रांतो में कथा-कथन के कार्यकम हर साल होते है | इसिलीए मै यहाॅ मातृदिनकी महत्ताको प्राधान्य दे रहा हूँ |
श्रावण मास को हमारी संस्कृतीमे पवित्र माना जाता है | नागपंचमी, स्वतंत्रता दिन, रक्षाबंधन-नारीयल - सागर पोर्णिमा, अश्र्वथमारुती, जन्माष्टमी -गोपाळकाला, ज्ञानेश्वर महाराज जयंती, ऐसे उत्सवोंसे हमें मिलनेवाली खुषीके साध उत्साह और बल की प्राप्ती होती है | हमारे समाजके हर घरमें मनाये जानेवाले धार्मिकोत्सव की व्यवस्थाकी जिम्मेदारी बिना किसी प्रकारकी तक्रारके हमारे परिवारकी तथा रिश्तेदारोंके घरकी नारीशक्ती उत्सवोंकी संपन्नता करती है | यह सौ प्रतिशत सच्ची बात है | इसिलीए हमारे ऋषिमुनियोंने श्रावण मासकी अमावास्याके (पिठोरी अमावास्या) दिनको मातृदिन उत्सव की रचना रखी है | गये गुरुवार 10 सिंतबर शामको यह उत्सव मनाया गया | इस उत्सव की खासियत ऐसी है की हम बचपनसे देख रहे की इस उत्सवमें इस दिन धार्मिक पुजा-अर्चन नारीयोंके हात से होती है | नारी याने हमें इस सृष्टीका रमणीय दर्शन देनेवाली माता |
हमारे देशके सभी प्रान्तीय भाषाओंके वंदनिय अध्यात्मिक गुरू, प्रवचनकार, संत-महंत, साहित्यिक, गायक, गीतकार, संगीतकारोंने अपनी वाणी, लेखणी,गायकी और कला द्वारा वैदिक कालसे चलती आयी माताकी महत्ताको लाजबाब ढंगसे आम आदमी तक पहुचांई है | इन सभीकौ मेरा सादर प्रणाम !
देवीयों और सज्जनों, मै जब बोरीवली (प) श्री राम मंदिर मार्ग, बाभई स्थित आनंदराव पवार सरस्वती विद्यालयमे सचीव पद की जिम्मेदारी निभाता था तब मुझे ' मातॄदिन ' पर अकस्मात भाषण करनेकी विनंती प्राथमिक विभाग की तत्कालीन मुख्याध्यापिका कुडईकर मॅडम के तरफ हुई, तब मैने भाषण किया था | उस अवसर से मुझे 'मातॄदिन' पर लेख लिखनेकी प्रेरणा हुई थी | लेकीन अन्य जिम्मेदारी और स्वास्थ्य के कारण मै लेख नही लिख सका | वह भाषण समय के अभाव के कारण संक्षिप्त रहा | लेकीन इस लेखकी अंतिम पॅरा उसी संक्षिप्त भाषणका विस्तार बढाकर किया है |
अमेरिका मे हुई सर्वधर्म परिषदमें स्वामी विवेकानंद के भाषण से प्रभावित अमेरिकन सामाजिक, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं द्वारा स्वामीजी के जगह-जगह मे भाषण एवं हिंदु संस्कृती और हमारी नारीयोंकी सामाजिक स्थान इस विषयपर प्रश्नोत्तर कार्यकमोंका सिलसिला हुआ था | उसमेंसे दो प्रसंग यहाँ रखता हू जिससे हमारे नारीयोंका प्राचिन कालसे कैसा सन्मान होता है इस सत्यकी जानकारी एवं प्रचिती स्वामीजी के व्याख्यान तथा पत्रकार परिषद से दुनिया को हुई |
स्वामीजी के व्यक्तिमत्व से प्रभावित हुई अमेरिकन युवती स्वामीजी के पास आयी और कहा ' स्वामीजी, मुझे आपसे शादी करनेका यौग आता है तो कितना अच्छा होता | मुझे आपके जैसा सुदंर तथा बुद्धिवान पुत्र हो ऐसी इच्छा है | स्वामीजी ने स्मितहास्य से जबाब दिया ' यह तो बहूत साधी बात है, माता तुम मुझे तुम्हारा पुत्र मान लो |' स्वामीजी का जबाब सुनकर वहाॅ उपस्थित पुरूष और महिला चकीत हुए | उन्हे महिला- पुरूष संबंध को ऐसी उदात्त कल्पना अपरिचीत थी |
दुसरी जगह स्वामीजी का भाषण समाप्त होनेके बाद एक श्रोता ने पुछा ' आपके देशमे महिलाओंको पुरूषोंके समान माना जाता है ?' इसपर स्वामीजी ने ' नही ' ऐसा जबाब दिया |' तुरन्त सभागृह में " धिक्कार, धिक्कार, धिक्कार !! " इस आवाज का कल्लोळ मच गया | थोडी देरमें सभागृह मे शांती हुई | उसके बाद स्वामीजी खडे होकर धीरगंभीर मुद्रा, और सभागृह के चारो तरफ नजर डालकर कनखती आवाजमे " कारण भारतमें नारियोंको पुरूषोंसे श्रेष्ठ माना जाता है | " स्वामीजी का पुर्ण जबाब सुनते ही सभागृह मे तालियोंका लगभग तीन मिनीट तक आवाज
घुंमत रहा |
उपर के दो प्रसंग के बारेमे अध्यात्मिक और समाजशास्त्र के गाढे अभ्यासक प्राध्यापक प्र.ग. सहस्त्रबुद्धे जीवनमूल्ये भाग ३ मे कहते है की
" स्वामीजी के अधिकृत चरित्र में ऐसी कथा पढनेको मिलती नही | वह कल्पित याॅ अतिरंजित हो, पर एक बात निश्चित है की इस कथाद्वारें जीवन विषयक एक महान सिद्धान्त का उद्घाटन हुआ | नारीयोंपर देखनेका भारतिय दृष्टीकोन प्रकट हुआ | स्वस्थ, सुव्यवस्थित, आदर्श एवं उन्नतीप्रवण भारतिय समाजकी स्थिती-गती चित्रीत हुई है |"
हमारे, धार्मिक उत्सव के रचनाकारोंने वेद, उपोनिषोद, स्मृती, श्रुती, आरण्यके, ब्राह्मण्यके जैसे ग्रंथ मानवी जीवनमुल्योंसे खचाखच भरे हुए है | उसमे से एक महत्वपूर्ण ' नारीयोंका सन्मान करना ' यह है | इस मुल्य के बारेमे एक श्लोक है,| वह निचे रखता हूँ -----
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवठत: |
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वस्वात्राफला: क्रिया: ||
(जिस घर मे आबालवृद्ध द्वारा नारियोंका उचीत सन्मान किया जाता है ऐसे घर मे देवता वास करते है | जिस घर मे उनका सन्मान नही होता है, वहाॅ दान, जप,तप,आदि क्रिया विफल होती है ) मनुऋषीने बताया यह तत्व भारतीय सुखी एवंम समृध्द जीवनका आधारसूत्र है | यही तत्व रामायण, महाभारत, भागवत आदि ग्रंथोंमे विवीध दृष्टान्त द्वारा पेश किया है |
लडकी- युवती हो, सौभाग्यवती- प्रौढा हो, या विधवा हो, हमारी संस्कृतीमे नारीको हर अवस्था मे वंदनिय माना जाता है | लेकीन माताका स्थान सर्वोच्च माना गया हे | महर्षी व्यास ने कहा है --
' पितृरप्याधिका माता गर्भधारणपौषणात्
अतो हि त्रिषु लोकेषु नास्ति मातृसमो गुरु: ||
( माताका स्थान पिता से भी श्रेष्ठ है | माता बाल-बालिका को गर्भ मे धारण करती है | जन्म होनेके बाद पालन - पोषण करती है | त्रिलोक मे ढुंडके भी माता से अधिक थोर नही दिखता है |)
नास्ति गंगासमं तीर्थ नास्ति विष्णुसम: प्रभु;
नास्ति शंभुसम: पूज्यो नास्ति मातृसमो गुरू: ||
(गंगा जैसा तीर्थ नही है, विष्णूसम प्रभू नही, महादेव जैसा वंदनिय नही, माता जैसा गुरू नही)
देवीयों और सज्जनो, महादेव जैसा वंदनिय नही ऐसे शंकर भगवान के घर मे माता की महत्ता की कल्पना देनेवाली कथा आप सभीको परिचित है | उमा-महेश्वर के दो पुत्र बाल गणेश और कार्तिक के बिच पृथ्वी प्रदक्षिणा की शर्यत मे हार-जीत का फैसला पार्वती देवी के पास जाता है तब माता-पिता को प्रशिक्षणा से बाल गणेश को विजयी घोषित किया गया | अंतिम निर्णय माताका !महाभारत मे ऐसा कहा है की भीम को भूख लगती और खाना तैयार नही हुआ तब उसकी माता कुंती ने दिए चावल के चार दानेसे पेट भरता था | बहुतांश थोर, पराक्रमी, पुरूषोंके यश के पिछे माताका आशिर्वाद तथा पत्नी का सहयोग होता है | इसिलीए माताको शक्तिपीठ और पत्नी को अर्धांगी माना जाता है |
(इस लेख का भाग -२ निचे जोड दिया है | )
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आपण व आपले उत्सव (भाग -२)
माता याने त्याग, तपस्या और निरपेक्ष सेवा ! माताकी वाणी, दृष्टी, और स्पर्श का अर्थ प्यार का निरंतर बहता प्रवाह ! प्रतिष्ठान नगरमें दो पडोसी महिला की एक कथा है | एक का नाम था अकुला और दुसरी का नाम था बकुला | बकुलाको पुत्रप्राप्ती हुई | अकुलाने एक दिन बकुलेके बच्चेकी चोरी कियी | मामला न्यायालया में गया |अकुला ने बहूत साक्षीपुरावे दिये | मामला उलझनकी संभवता नही दिख रही थी | तब न्यायाधिश गुस्सेमें आकर बोले ' ठिक है मैं इस बालक के दो समान टुकडे करके दोनोंको बांटता हूं | ' न्यायाधिश साहब ने हातमे कोयता लिया और बालक के टुकडे करनेका पावित्रा लिया, तब बकुला तुरन्त न्यायधिशके पास गयी, उनके चरण स्पर्श करके रोते रोते विनंती कियी, ' साहब बच्चा अकुला को दिजीए, बच्चेकी हत्या मत करो | वह बच्चा कहा भी रहे, पर सुखी रहें यही मेरी इच्छा
है |' बकुलाकी बात सुनते ही न्यायाधिशने मामला का निर्णय देकर बच्चा बकुला के हवाली किया | माताका अपने बच्चोंके प्रती प्यार का निरंतर बहता प्रवाह, बच्चों की सुरक्षितता की चिंता एवं ईश्वर की नियमीत आराधना और बच्चोंकी सुखी जीवन की आस अतुलनीय है | माता याने ईश्वरी कृपा, माता याने साक्षात उदारता है ! इसिलीए जगद्गुरू शंकराचार्यने बार बार कहा है -----
" कुपुत्रो जायते क्वचिदपी कुमाता नु भवती
( इस जगत मे कुपुत्र निर्माण हौ सकते है |
पर कुमाता? कभी नही )
पुरुषार्थ इस शब्दका अर्थ सिर्फ पुरूषोंकी विशेषत: नही है | पुरूष यह एक मानव नामके प्राणी का एक लिंग (Gender ) है | कोई भी नारी पुरूषोंसे दुर्बल नही होती | स्त्री-पुरुषोंमे सिर्फ साम्य है यह बात पुर्ण नही है | स्त्री-पुरुषका का एकत्व निदर्शित करने वाले भगवान अर्धनारीनटेश्वर भारतीय जनजीवन का महत्वपूर्ण आधार है | इस आधार की पुष्टी हिंदू संस्कृतीके
ग्रंथोंमे इस तरहका है---
' स्वेच्छामय: स्वेच्छया च द्विभार्या बभूव |
स्त्रीरोग वामभागांशो दक्षिणांश: पुमान् स्मृत:||'
(वह स्वेच्छामय परमेश्वर सृष्टीका प्रारंभ मे खुद दो रुपमे प्रगट हुआ | परमेश्वर के वाम अंश को नारी और दाहे अंशको पुरूष कहा गया है |') संत ज्ञानेश्र्वर महाराज अपने 'अमृतानुभव' ग्रंथोंकी शुरूआत उपर के श्लोक की मराठी भाषामे इस तरह पेश कियी है -----
ऐसी ही निरोपाके
जगाची जिथे जनके
तिथे वंदिली मिया मूळिके
देवोदेवी||१||
जया एकसत्तेचे बैसणे
दोघां एका प्रकाशाचे लेणे
जे अनादि एकपणे
नांदती दोघे || ८ ||
(ही एकत्वाची भावना मनात रुजलेली असली म्हणजे द्वैत उत्पन्न होत नाही. द्वैत जर नाहिसे झाले तर आपोआप सगळी भांडणे निर्मूल होतात.)
' नारी बिना पुरुष का जीवन अधुरा और पुरुष बिना नारिका जीवन अधुरा रहता है | प्रपंच नामक रथ के प्रवास मे अर्धनारीनटेश्वर की प्रतिमा सदैव मनमे रखे तो रथमे ना दुरावा रहेगा ना घटस्पोट जैसा अपघात होगा |' यह मेरा उपदेश ना समझे, यह मेरी राय है समझे, ऐसी नम्र विनंती करके मै इस लेखकी अंतिम पॅरा आपके सामने रखता हूँ |
" देवी और सज्जनों, ' स्त्री को शक्तिपीठ और गुरू क्यों माना गया इस पर हमारी चर्चा हुई है | हमारी संस्कृतीका वैदिक कालसे आजतक के इतिहास पढे तो नारियोंकी तपस्या तथा रण मैदान पर का पराक्रम ऋषीमुनीयोंसे और क्षत्रियोंसे कम नही है | जीवन के हर क्षेत्रमे देशका जो आजतक विकास हुआ है उसमें नारीयोंका योगदान भी पुरूषोंके योगदान से कम नही है | लेकीन यह सब बातें स्त्री-पुरुष समानता की है | इसपर स्वंतत्र लेख लिखा जायेगा | स्त्री और पुरूषोंकों हर क्षेत्रमे मिली सफलता के पिछे पिता-माता का श्रम और आशिर्वाद सदैव रहता
है | यह सत्य है |हमारे हिंदू संस्कृतीके ग्रंथोंमे माताका स्थान पिता के स्थानसे उच्च है, यह तो त्रिकाल सत्य है |
मातृशक्ती की महत्ताकी अनुभूती 'शरीर-विज्ञान' जिससे हमारे दैनंदिन जीवन का प्रवास होता है उससे आती है | हर दिन, हर क्षण मे मातृशक्ती विविध रुपमें हमारे साथ रहती है जैसे की ---
१) अन्नधान्य हमे जिससे मिलती है, वह धरणीमाता है |
२) सुबहसे चहापान, नाश्ता, लंच, फिर नाश्ता बादमें डीनर अन्य पक्वान्ने यह चीजे अन्न के ग्रुपमें है | अन्नधान्य से खाना-प्येय, पक्वान्न माता बनाती है | उसे अन्नपुर्णादेवी माना जाता है |
३)अन्न,नाश्ता, पक्वाने और पेय की टेस्ट, हमारी टंक से होती है दंतोसे नही |
४) हम बातें करते है, गीत-कविता गाते है वाणीसे| ५) हम बाते, वार्तीलाप, कलह, भाषण, प्रवचन, गीत-किर्तन-भजन सुनते है उसे श्रवणशक्ती कहते है |
६) जो बातें-वार्ता, कथा, ऐताहासिक-भौगोलिक एवं विज्ञान की जानकारी ग्रंथ-कितीबे, मासिक- साप्ताहिक मँगझिन, दैनिक वृत्तपत्रं जैसे माध्यमों से पढते है वह ऑखोंसें याने दृष्टीशक्तीसे है |
७) एवं अपने परिसरसे लेकर दुनियामे होनेवाली घटनायें प्रत्यक्ष अपनी ऑखोंसे देखें याॅ टिव्ही माध्यमसे उसे भी दृष्टी कहते है |
८)इस ब्रम्हांडसे लेकर ईश्वर निर्मित पंचमहाभूते तथा मानव निर्मित चीजे, विविध प्रकारके यंत्र और तंत्र को हम देख पाते है वह दृष्टीसे !
९) दृष्टीसे दृष्टिकोनका जन्म होता है, लेकीन हमारे शरीर मे जो कल्पनाशक्ती, मनशक्ती, बौद्धिक एवं शारिरीक आदि शक्तीयाॅ विराजमान है उससे दृष्टी को शक्ती प्राप्त होती है |
१०) मानव निर्मित सभी वस्तुयें कारागीर बनाते है उसे हम कारागिरोंकी कला मानते है, वह भी एक शक्ती है | वह शक्ती बहूरूपी है |
११) अन्नधान्य के अलावा, धरणीमातासे खनिज, सोना- चांदी का खजिना, विविध प्रकारके यंत्र, उर्जा, रोड, ब्रीज, निवारा आदि की निर्मिती लिए मटेरिअल धरणीमाता से मिलता है |
१२) दिक्षा, शिक्षा, पढाईमें पठणशक्तीके रुपमें सरस्वतीमाता होती है | उससे ज्ञान नाम का फल प्राप्त होता है |
१३) 'आलस्य कुतो विद्या, अविद्यासे कुतो धनं '
श्रमशक्ती बिना धनशक्ती का दर्शन नही होता है | १४) घरणीमातासे अन्नपूर्णमाताको अन्न-प्रकिपा की शक्ती प्राप्ती होती है | अन्नसे हमे शारिरीक शक्ती प्राप्ती होती है उसे पचन शक्ती माना जाता है | ' शरिर माध्यमं खलू घर्म साधनाम् ' (वास्तव्य में शरीर ही धर्म याने कर्तव्य और साधना को पुरा करनेका सबसे पहला साधन है |) इसिलीए शरीरको सेहतमंत बनाये रखना जरुरी है |
' पहला सुख निरोगी काया '
' करे योग रहे निरोग '
१५) शरीरशक्तीसे पराक्रमका जन्म होता है, उससे विजय नामका फल उगता है | सच बात यह है की निती, सावधानता एवं चलाखिका अदभूत संगम है | देवोंको भी महिषासुर नामक असूर को नष्ट करनेके लिए दुर्गामाताकी सहायता मांगनी पडी | दुर्गामाता और महिषासुर के बीच नौ दिन भयानक युद्ध हुआ | आखीर दसवे दिन दुर्गामाता ने महिषासुर को नष्ट किया | नौ दिन पराक्रम का मधुर फल का नाम ' विजयादशमी उत्सव | '
१६) धनदेव कुबेर हो, लेकीन इसमें शक्ती महालक्ष्मी माता के रूपसे है |
देवीयों और सज्जनों, आषाढ मासकी अमावास्याके दिन द्विपोत्सव मनाया जाता है | जैसे द्विप ज्ञानयोग, भक्तीयोग ओर कर्मयोग का प्रतिक है, उसी तरह 'माता ' महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का प्रतिक है | इसिलीए हर धार्मिकोत्सव तथा विवाह, व्रतबंध, गृहप्रवेश आदि धार्मिक विधी में देव-देवतांओंकी पुजा-अर्चा कें बाद पुष्पांजली और मंगलाष्टक में
उमा-महेश्र्वरकी जय, राधा-दामोदरकी जय, लक्ष्मीनारायणकी जय, सियारामचंद्रकी जय ऐसे घोष वैदिक कालसे निरंतर शुरु है और सृष्टीका अंत तक शुरु रहेगा ऐसी भावना व्यक्त करके मैं विराम करता हूँ |
जय माता दी !