सोमवार, १२ नोव्हेंबर, २०१८

अस्पृशता एक बडी भूल



दसवी शताब्दीमे हमारे देशमे रामानुजाचार्य नामके एक महापुरूष हुये थे | वह विशिष्टाद्वैत मतके प्रतिपादन करनेवाले वैष्णव आचार्य थे | उनका प्रतिपादन था कि जीव और जगत ब्रह्मके ही चेतन और अचेतन अंश है | उनकी 29 आक्टोबरको जंयती थी | राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघके सभी शाखाओंपर रामानुजाचार्यके प्रती आदरांजली प्रगटके कार्यक्रम हुये | उस कार्यक्रमे रामानुजाचार्यके चरीत्रमेसे एक कथा सुनाई गयी थी उससे मै बहुत प्रभावित हुआ और यह लेख लिखनेकी मुझे प्रेरणा मिली | मै वह कथा आपके सामने पेश करता हू , बादमे अस्पृशता विषयपर चर्चा छुरू करेंगे | 
    
वृध्दावस्थामे रामानुजाचार्य प्रतिदिन नदीपर स्नान करने जाया करते थे | वे स्नान करने आते समय एक ब्राह्मणके कंधके सहारा लेकर आया करते और लौटते समय एक शुद्रके कंधेका सहारा लेते | वृद्धावस्थाके कारन उन्हे किसीकी सहारेकी आवश्यकता है, यह बात तो सभी समझते थे किंतू स्नान करने आते समय ब्राह्मण और लौटते समय शुद्रका सहारा, यह बात  सबकी समझ से परे थी | उनसे इस विषयमें प्रश्न करनेका साहस किसी भी के पास नही था | सभी आपसमे चर्चा करते कि वृद्धावास्थामे रामानुजाचार्यकी बुद्धी भ्रष्ट हो गयी है | नदी स्नान करके शुद्ध हो जानेके बाद अपवित्र शुद्रको छूनेसे स्नानका महत्त्व ही भला क्या रह जाता है? शुद्रका सहारा लेकर आये और स्नानके बाद ब्राह्मणका सहारा लेकर जायें तो भी बात समझमे आती है | एक दिन एक पंडीतसे रहा नही गया, उसने रामानुजाचार्यको पुछा ही लिया | " प्रभू आप स्नान करने आते हो तो ब्राह्मणका सहारा लेते हो किन्तु स्नान करके लौटते समय आप शुद्रका सहारा लेते हो | क्या यह धर्म शास्त्रोंके  विपरित नही है ?"  यह सुनकर आचार्य बोले, " मै शरीर और मनका दोनोंका सहारा लेता हू | ब्राह्मणका सहारा लेकर आता हू और शरीरका स्नान करता हू | किन्तु तब मनका स्नान होता नही, क्योंकी ब्राह्मण के मनमे बैठा हुआ वह उच्चता का भाव पानीसे नही मिटता है | वह तो शुद्रका सहारा लेकर ही मिटता है और मेरा अहंकार धुल जाता है, और सच्चे धर्मकी पालनकी अनुभूती होती है | 

देशके सभी संतोंके चरीत्रसे ऐसी कथायें हमने पढी  और सुनी भी है | जब मैने यह कथा पढी, तब मुझे महाराष्ट्रके संत तुकाराम महाराजका एक अंभग याद आया जिसमे कौन व्यक्ती वंदनिय होती है ? इसका जबाब सिर्फ दो पंकत्तीयोंमे 
है | वह इस प्रकार है,
                     बोले तैसा चाले |
                     त्याची वंदावी पाऊले ||
अपने सभी महापुरूष तथा संतजन हमे वंदनीय है , इसका कारन उनके कहनी और करनी में अंतर नही था | सभी महापुरूषोंने समाजमे सालोंसे चलती आयी अस्पृशता प्रथाको गैर बताया, और नष्ट करनेके लिये सिर्फ मार्गदर्शनही नही किया बल्की जो सलाह लोगोकों उन्होंने दि उसे स्वयं अपने कृती और व्यवहारमे उतारकर अपने सामने एक उदाहरण पेश किया | 

सामाजिक व्यवस्थामें कर्मकी अभिरूची याॅ गुणवत्तानुसार व्यक्ती-व्यक्तीमें  विविधता और भिन्नता होती है | लेकीन इसका अर्थ यह नही की समाजमें कोई लोग ही योग्य होते है, और दुसरे लोग अयोग्य और  अछूत होते है | हमारी संस्कृती कहती है " अयोग्यः पुरूषा नास्ती नास्ती योजकस्तत्र दुर्लभः|"  अपने हृदयसे निकली रोहीणी नामकी धमनी (रक्तवाहीनी) जिस तरह शुद्ध रक्तका वितरण सभी इन्द्रयोंको समान रूपसे करती है, उसमे भेदभाव नही रखती है, उसी तरह  हमें  समाजके हर वर्गोको समान रूपसे देखना चाहीये | सभीका इस समाजमे योग्य स्थान है | समाजके अस्तित्व, सार्वजनिक जीवन व्यवस्था और व्यवहार तथा समाजकी  उन्नतीमे सबका योगदान होता है | मै आपके सामने एक उदाहरण रखता हू | समझ लो मै एक चावलका व्यापारी हू | इसिलीये समाजके सभी लोग चावल खरीदने लिये मेरे पास आते है | मै थोडा किसीको जातके आधारपर चावल बेचना मना करता हू ?  क्यों की चावल बेचनेसे मेरा उदरनिर्वाह होता है | वही मेरा कर्म है; वही मेरा धंदा है; वही मेरा धर्म है | मेरे दुकानमे चावल कहाॅसे आता है ? किसान अपने खेतोमें कडी मेहनतसे चावल उगाता है | पर वह अकेलेके दमपर चावल उगाता नही , यह तो बात साफ है | किसान किसी मजदूरोंको रोजगार देकर उनकी  मदद लेता है | बादमे किसान चावलकी फसाईको सफाई करता है| उसमे भी वह मजदूर तथा सफाईवालोंकी मदद लेता है | उसके बाद मशीनसे चावलके उपरके छिलके निकालकर चावलको खानेलायक बनाता है | वही छिलके पालतु पशुऔ जैसे की गाय, भ्हैस इनका अन्न है, उसे ऐसे जगह रखता है जहाॅ धूप तथा बारीससे बचाव हो | यह कामके लिये किसानको सफाई मजदूरोंकी मदद लेनी पडती है | बादमे किसान किसी दलालको याॅ दुकानदारको सफाई हुआ चावल बेचता है | दुकानदरके पास याने मेरे पास वही चावल टेम्पोसे आता है | इसका अर्थ समाजमे ट्रान्सपोर्टका धंदा करनेवाला भी कोई होता है | अब बताओ,  चावलकी फसाईसे  लेकर चावल मेरे पास आनेतक जिनकी मेहनत लगी है उनका काम महत्वपुर्ण है या नही? वह सब अपने समाजके ही लोग है ना | तो उनमेसे मजदूर याॅ सफाई करनेवालेको हम क्यों अछूत माने? स्वच्छताका नाम ही तो ईश्वर है | चावल उगाते समयसे दुकानदारको बेचनेतक कचरा तो होता है उसे महानगर पालिका तथा ग्राम पंचायतके सफाई कर्मचारी उठाते है और यदी वह काम एक दिन भी रूका हुआ तो भी सर्वत्र बिमारी फैल जाती है | अपने शरीरमे सभी वर्ण है | कोई इंद्रिये ज्ञानार्जन करते है, तो कोई इंद्रिय देहमे सफाई करता है | हमारे ज्ञानेंद्रियेको(आॅखें,  नाक, कान, कांती, दिमाग)  देहका ब्राह्मण माना जाता है, तो अपना उदर( पोट) वैश्य वर्ग है | हात क्षत्रिय है इससे हम अन्न (जिससे शक्ती प्राप्त होती है) खाते है और वही हाथसे हम अपनी रक्षा भी करते है | खाया हुआ अन्नसे रक्त तैयार होता है और वह रक्त शरीरके हर इंद्रीयके पास जाता है | इसका मतलब शरीरमे भी ट्रान्सपोर्टकी व्यवस्था है | न हजम हुआ अन्न, मल-मुत्र रूपसे बाहर फेकनेकी व्यवस्था अपने शरीरमे विद्यमान है | वह व्यवस्था संभालनेवाले इंद्रिये भी महत्वपुर्ण होते है | वैसे ही समाजका हर वर्ण, हर व्यक्ती महत्वपूर्ण होती है | हमारे शरीर की यंत्रणामे उच्च-नीचकी भावना नही है, तो समाजमे हम उच्च-नीच की भावना रखना अनुउचीत है ना ! शरीरके मल-मुत्र विसर्जन करने वाले इंद्रियोंमे बाधा उत्पन्न हुई तो पुरे शरीर बाधाओंके लपेटमे आनेकी संभावना होती है | उसी तरह समाजमे कोई वर्ग अछूत माना गया, तो समाज व्यवस्था ना कभी स्थिर होगी, ना वह विकासकी गती प्राप्त  कर सकेगी | समाजमे जाती व्यवस्था और आपसमे भेद यही एक मूल कारन है जिसके वजहसे  हमारा देश, समाज विदेशी आक्रमकोंके सामने पराजित हुआ | वही विदेशी ताकदोंने एक हजार सालसे अधिक काल अपने देशपर राज करके संपत्ती तथा संस्कृतीका भारी मात्रामें नुकसान किया |

सच देखा जाये तो जब मै मेरे परिवारके बिमार सदस्यकी सेवा करता हू, तो मै सालोसे चलती हुई प्रथासे मै भी शुद्र हू | पर मुझे अछूत नही माना जाता है, और सार्वजनिक जगहोंको सापसुत्रा रखनेवाले सफाई कर्मचारीको अछूत समझें, यह ना इन्साफी है | क्योंकी हमारी धर्म की मान्यताओंके मुताबिक सेवा भी  एक धर्म है,  तो धर्मकृत्य  भला हीन  कैसे हो सकता है? हरेक व्यक्ती के भीतर  ज्ञान, शौर्य, व्यापार, सेवा इस तरहकी चार तत्वे विराजमान रहती  है | जब  मै मेरे बच्चोंकी पढाई लेता हू, उनके पढईमे मदद करता हू तब मै ब्राह्मण बनता हू | यदी मै मेरे बच्चोंकी पढाई नही लेता हू , मै ज्ञानसाधना नही करता हू तो  किस आधारपर मुझे ब्राह्मीन कहलाया जा सकता है? सिर्फ जन्म ब्राह्मीन घरमे हुआ इसिलीये? यह बात अतार्किक है | जबकी ब्राह्मीन का अर्थ है जो ज्ञान-जिज्ञासाका प्यासा हो और जिसका आचार-विचार सात्विक हो | समझ लो मै ज्ञानकी साधना करता हू ,पर किसी समारोहमे लोगोंसे अपना परिचय करते वक्त ' मै शुद्र नही ' यह भावना मनमे रहेगी तो भी मै ब्राह्मीन होनेसे वच्छींत रहूंगा | यही तो रामानुजाचार्यका हमे संदेश है | उन्होंने स्नान करनेके बाद शुद्रका सहारा लिया इसका कारन उनकी ज्ञान तपस्या चौबीस कॅरेट सोने जैसी शुद्ध थी,  और जिस ब्राह्मीन के कंधेका सहारा लेकर गुरूदेव रामानुजाचार्य नदीस्नान करने आते थे उन्हे ब्राह्मीन होनेका गर्व था | वैसेही जिसे हम अस्पृश्य मानते वह अपने बच्चोंकी पढाई  लेते है, ज्ञानकी साधना करते है, तो केवल शुद्रमे जन्म लिया, इसिलीये हम उसे अछूत समझना, यह सृष्टीके नियमोके विपरित है | मुझे लगता है की छुत-अछूतकी कल्पना अपने समाज व्यवस्थामे गलत ढंगसे आ गयी है जबकी सत्य यह है की समाजमे कोई उच्च-नीच नही है |

भगवान श्रीकृष्णने गीता मे कहा है, 
             चातुर्वण्यम् मया सृष्टी गुणकर्मविभागशः |
                                 
(इस सिद्धांतको  विस्तारसे जाननेके लिये ' चातुर्वण्यम् मया सृष्टी गुणकर्मविभाशः|' इस शिर्षकका लेख इसी ब्लाॅगपर  इसी सालके 4 फेब्रुअरीको पब्लीश किया हुआ है | कृपया उसे पढीये | यह लेख मराठी भाषामे है, आप अपने मोबाईलके अॅपके सुविधासे अपने मातृभाषामें पढ सकते है)

अपनी सृष्टी विविधताकी सम्राज्ञी है, मानव समाज उसी सृष्टीका एक हिस्सा है | निसर्गमे नागफनीके संग अप्रतिम सुवास लेकर  मोगरा खिल जाता है, कणेरी के साथ  आकर्षक गुलाबका फूल खिलता है , तो हम एक दुसरेको सद्भावसे, समानताके दृष्टीसे क्यो न देख पाते है? निसर्गमे पशूपंछी, वनस्पतीयाॅ और मानवजातीमे एकही चेतना स्वरूप ईश्वर निवास करता है, फिर भी हम क्यो आपसमे उच्चनीच का भेद रखते है?  वैसे तो इस तरहका भेद सिर्फ हमारे देशमे है, ऐसा नही है | दुनियाके सभी देशमे, सभी मानव समाजमे कुछ ना कुछ तरहके भेद चलते आ रहे है |  पंधरह साल पहले दरबान शहरमे वंशभेदको नष्ट करने हेतू आतंरराष्ट्रीय संमेलन हुआ था, उस संमेलनको अल्प प्रतिसाद मिला और संमलेनभी बिना कुछ खास यश मिले खत्म हुआ | पर इससे हमे अपने देशमे चलती आयी अस्पृशता प्रथा जारी रखनेका कोई परवाना मिला है,  इस समझमे  रहना उचीत नही है |

जैसे सृष्टीमे विविधता, वैसी ही समाजमे विविधता है | पर सभीके भीतर विराजमान चेतनास्वरूप परमात्मा एक है , और वही हरेक व्यक्तीमे स्थित है, उसीको तो प्राण या आत्मा कहा जाता है | लेकीन सृष्टीकी इस  विविधता देखनेकी क्षमता हम जैसे जनसामान्यांओंमे नही रहती है | इसिलियै हम सामान्यजन है | जिन्होने इस सृष्टीकी सदाबहार  विविधताको अच्छे ढंगसे, पवित्र मनसे देखा और उसी तरह अपने जीवनको सजाया, और सजाते सजाते उन्हे व्यक्ती और समष्टीमे समाही हुई चेतनाका  दर्शन हुआ, वह सब महामानव है | वही महामानव, संतजनोंने उच्च-नीचकी प्रथाको गलत माना | और अपनी पुरी जिंदगी अस्पृशताके निवारणमे लगाई | हम सब भाग्यवान है की हमारी भूमी संत-महंतकी है, और  समय समय पर ऐसी विभूती जन्म लेते रहे और लेते रहेंगे |

हमारे देशके मानबिंदु मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री रामके चरित्रसे  इस संदर्भमे वही संदेश मिलता है जो रामानुचार्य जैसे गुरूदेव और संतोने दिया है | राज्याभिषेकका समारोह होने जा रहा है और आज्ञा आती है, कपडे उतारो, वल्कले पहनो और निकलो वनवासको | कितना साल? चौदा साल |  ना वनवास जानेका दुख , ना सिंहासनकी गद्दी हाथोसे छुट गयी उसका दुःख |  सुख और दुःख के प्रती समभाव, और असामान्य धैर्य यह प्रभू रामके जीवनचरीत्रकी विशेषता थी | अयोध्यासे निकले, तब वे दशरथ राजाके सुपुत्र थे | चौदा सालके बाद अयोध्या वापस आये, मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम बनके | अनेक राक्षसोंको पराजीत किया,वालीका दशहतवाद खत्म किया | महान पराक्रमी शक्तीशाली रावण को पराजीत किया | सत्यवचन एकवचन, एकपत्नीत्व, पतीधर्म, पुत्रधर्म ऐसी बहुत गुणोविशेषतायें राममे थी, जिससे उन्हे मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान यह उपाधी प्राप्त हुई | आजके इस विषयपर चर्चा करते समय, वनवासी रामका एक अतुल्य संदेश मेरे कानोंमे गुंज रहा है | पत्नीका हरण हुआ तब पंचवटीसे नजदीक रहनेवाले अपने नाना और मामाकी सहाय्यता राम ले सकते थे | ईश्वाकू खानदानका युवराज,  श्रीरामको किसी भी राजासे सेना मिल जाती  और उस सेनाके ताकदपर रावणको पराजीत करके सीताको छुडवाकर आ सकते थे | पर वैसा विचारही नही आया मनमे | समाजके शोषीत, वंच्छीत, लोगोको इक्कठा करके सेना बनाई;  उनकी जात नही देखी | उनके साथ खाना खाया, युद्धकी नितीयाॅ रची, ना जातका विचार, ना पातका; हम सब भारतमाताके पुत्र; हम सब भाई भाई; ना कोई अछूत, ना कोई ज्ञानी, सब समान यही भावना मनमे  थी | इससे ही युवराज राम भगवान राम बने | ' समाजमे कोई अछूत नही है ' यही संदेश हमे त्रेता युगसे हमे मिला | 

यही संदेश हमे द्वापार युगसे भी मिला | एक सामान्य गुराखी, बचपनमे  छोटे छोटे मित्रको जोडता है; मख्खन चोरता है ,सब मित्रोंका बाटता है, किसी मित्रकी ना जात मालूम, ना खानदानका पता; खुदके घरमे तो मख्खन, घी की कुछ कमी नही थी | फिरभी मख्खनकी चोरी? मख्खनकी चोरी नही, बल्की  गरीब मित्रोंको मख्खन देनेकी एक व्यवस्था थी | गोपीयोंके साथ रासगर्बा खेल खेला; ना जात देखी ना खानदान;  ना राजा बननेकी लालसा, ना खानदानका दंभ; सुदामा जैसे गरीब मित्रको गले लगाया; कोई भेदभाव नही; किसीको अछूत नही माना; इंद्रकी पुजा बंद करवायी और गोवर्धनकी पुजा छुरू की | आजके मानवी जीवनके संदर्भमे  भगवान श्रीकृष्ण समाज-उध्दरक ही थे | शांती प्रस्ताव लेकर हस्तीनापुर गये, तब खाना खाया दासी पुत्र विदूरके घर; क्यों ? विदुरजी दासी पुत्र थे पर विद्वान थे, नीतीमान थे | धर्म और सत्यके पक्षमे थे | श्रीकृष्णने विदुरजींके जन्मकी कहानीपर नही बल्की विदूरजींका व्यवहार, ज्ञान, और शालीनताको महत्त्व दिया | बालक अवस्थासे जिनके पास अपरिमीत शौर्य, धैर्य, सभी विद्या-कलाकी आसक्ती, चतुराई,  ऋषीजनोंके प्रती आदर, प्रजाके प्रती प्यार और औदार्य, अन्यायको निपटनेकी शक्ती थी ऐसे श्रीकृष्णने  कंस, जरासंध, नरकासुर जैसे राजांके अत्याचारसे पिडीत सोला हजार महीलाओंको समाजमे  स्थान न मिलते देखा, तो उन्हे अपनी पत्नीयाॅ बनाकर सन्मान दिया | समाजमे अछूत रहनेकी आपत्तीसे उन्हे बचाया | आजकल महीलांओ प्रति सन्मान देनेके लिये कानून बनाये जा रहे है, वह कार्य श्रीकृष्णने द्वापार युगमे किया था | उच्च-नीच्चकी भावना या प्रथा उनके मनको स्पर्श भी न कर सकी | इसीलीये कुरूक्षेत्रसे वह गीताका ज्ञान विश्वको दे सके और जगद् गुरूके पदपर विराजमान हुये और भगवान श्रीकृष्ण बने | संदेश कौनसा था, वही 'कोई अछूत नही |'

फिर एक बार अपने शरीरकी रचना और कार्य व्यवस्था पर नजर डालके इस चर्चाको हम विराम करेंगे | अपने शरीरका कार्य भी  लोकतंत्रके मुल्योओंके आधारपर चलता है | एक इंद्रीय दुजे इंद्रीयके कार्यमे हस्तक्षेप नही करते है | इसका कारन हर एक इंद्रियका कार्य दुसरे इंद्रिय के कार्यको पुरक होता है | हर एक इंद्रिय दुसरे इंद्रियको मददके लिये तत्परता दिखाते है | आखोंसे न दिखनेवाली वस्तु स्पर्शसे मिलती है | इंद्रीयोंमे  आपसमे प्यार भी रहता है | जब पेटमे दर्द हो तो अपने दोनो हाथ पेटके उपर आते और हमे धैर्य देते है | शरीरका कोई भी हिस्सेमे गडबड हो जायेगी तो बुरा बदन दुखता है | इसका मतलब यह है की एक इंद्रीयके बीमारीपर सभी इंद्रीये संवेदनशील है | आॅखोकी तकलीफ हो याॅ कानकी, असर तो शरीरपर होता है | अशुद्ध रक्त हृदयके पास जाता है और वही शुद्ध बनके फिर सभी इंद्रियोंके पास जाता है उस क्रियाको हम रक्ताभिसरण कहतै है | वह क्रिया जिस तरह समताके तत्वसे (ना जरूरतसे ज्यादा ना जरूरतसे कम ) चलती है,  ठिक उसी तरह समाज और व्यक्तीमे विचार--भावना, आशा-आकांक्षा, सुख-दुःखका आदान-प्रदान होना चाहीये | समाजके एक वर्ग सुखी है, और बाकी वर्ग दुःखी हो तो पुरा समाज दुखी है | सभी वर्ग सुखी और एक वर्ग दुःखी है तो भी पुरा समाज दुःखी है | ऐसी भावना हर व्यक्तीके मनमे प्रस्थापित होगी, तो सामाजिक समरसताका सुंदर, निर्मल सरोवर देशके कोने कोनेमे तैयार  होगे | हम सब एक साथ ऐसे सुंदर, निर्मल सरोवरमे विहार करने जिस दिन शुरआत करेंगे,  तब हमारी भारतमाता कृतार्थ हो जायेगी | देशके हर प्रान्तमे होनेवाले त्योहारको अच्छी तरहसे समझे, तो हमें मालूम होता है की त्योहारका नाम अलग हो लेकीन त्योहारका तत्व सभी प्रान्तोमें समानही दिखता है | अभी, अभी हम सभीने दीपावलीका त्योहार मनाया | दीपावलीका त्योहार की विशेषता यह है की  जम्मु--काश्मीरसे लेकर कन्याकुमारी तक और कच्छसे लेकर  उत्तरी-पुर्व प्रान्त तक पुरे भारतवर्षमे मनाया जाता है | लोगोंने आपसमे अपनी मातृभाषा, तो कहीं राष्ट्रभाषामे  दीपावलीकी शुभकानायें शेअर की | उस सभी शुभकामनायोंकी झलक दिखानेवाली एक पोस्ट मुझे WhatsApp पर आयी है | भाषा अनेक लेकीन शुभकामनायेंकी भावना एक | इससे यह भी स्पष्ट होता है की, दीपावली सभी प्रान्तमे मनायी जाती है, और उस त्योहारका मूल हिंदु संस्कृती ही तो है | समाजके सभी बांधव, माता-भगिनी इस महान संस्कृतीके अधिकारी है | फिर हम जाती- भेद, प्रान्त-भेद लिंग-भेद क्यो करें? देशके सभी प्रान्तीय भाषामे प्रचलित मुहावरोंको हम ध्यान देकर पढे तो मालुम होता है,  सिर्फ भाषा अलग अलग, लेकीन अर्थ एक है | सभी प्रान्तके मंदिरोंमे भगवानकी मुर्तीया अलग हो, नाम भी अलग हो पर मुर्तीयोंके पिछे जो तत्व है वह भी एक है | मुर्तीयोंकी प्राणप्रतिष्ठपनाकी विधी एवं पुजा-पाठ के लिए संस्कृत भाषाकाही प्रयोग होता है , और वही पुजा-पाठ अपने अपने मातृभाषामे करेंगे तो भी हमारी संस्कृतीका दर्जा ना कम होनेवाला है ना पुजा-पाठ करनेमे मिलनेवाला आनंद कम  होगा | सबकी संस्कृती एक है, सबकी ग्रंथ संपत्ती एक है | बस आपसमे समझदारी बढायें और जो कुछ भेद सालोंसे चलते आये उसे मिटा देना है | कार्य कठीन है, पर असंभव है, ऐसा मुझे लगता नही | इस कार्यको सफलता मिलनेमे देर भी होगी, पर इसका कारन यह नही की हमारी संस्कृती  दोषपुर्ण है | जो दोष है उसे तो निकलनेका काम करना ही होगा | अपने समाजकी एक विशेषता यह है, की उसे  किसी भी व्यवस्थामे बदल क्रान्तीसे हो, यह बात पसंद नही आती है | हमारा समाज उत्कान्तीपर भरोसा रखता है | पहले जाती-जातीयोंमे संवाद बढानेका कार्य छुरू करना होगा, बादमे सहमती, उसके बाद सहकार्य जुटाना है धिरे धिरे समाजमे सद्भावका राज होगा  और अन्तिमतः हमें समाजमे सख्य, और शाश्वत ऐक्य प्राप्त करनेमे सफलता प्राप्त होगी | कालके प्रभावसे समाजमे  कुछ नयीं समस्यायें उत्पन्न होगी, तो उसे भी ठीक करते रहना है | यह एक निरंतर चलनेवाली प्रक्रीया है, उसीका नाम है जिंदगी  |

समाजमे फैली हुई अस्पृशता नामकी बिमारीपर इलाजकी  शुरूआत  देशके सभी प्रान्तोंके संत-महंतो द्वारा हुई है | महात्मा गांधीजी, साने गुरूजी, पंडीत दिनदयाळ उपाध्याय, स्वातंत्र्यवीर सावरकर, डाॅ बाबासाहेब आंबेडकर, नानाजी देशमुख, डाॅ बाबा आमटे आचार्य विनोबा भावे जैसे महापुरूष, सभी प्रान्तके साहित्यिक , समाजसेवक, प्रबोधनकार, एवम् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, स्वाध्याय परिवार जैसे  सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाका भी अस्पृशता कम करनेमे बडा योगदान रहा है | स्वतंत्रताके बाद सरकारके ओरसे कानून बनाये गये; अनुसूचित जाती, जनजाती और अन्य मागासवर्गीयोंकी भलाई और उन्नतीके लिये संविधानमे प्रावधान रखे गयें, जिससे देशके सभी संस्थाओमें और क्षेत्रमे उनको  प्रतिनिधित्व और रोजगारभी उपलब्ध हो गये | फिर भी समाजमें फैली हुई अस्पृशताकी बिमारीका संपुर्ण उच्चाटन क्यों नही हुआ?  इस असफलताका कारन लोगोंको जातीवादके आधारपर बाटकें  खुर्सीकी राजनीती करनेवाले नेतागण  है? और है तो,  सिर्फ नेताओंको क्यों जिम्मेदार ठराया जाता है?  उन्हीको हम ही चुनावमे जिताते है | चुनावकी प्रक्रीयामे सुधार लाना होगा | और इस कार्यमे हम बडी जिम्मेदारी क्यों नही उठा सकते है? आज सवर्ण समाज भी  देशके कोने कोनेसे आरक्षण मांग का आवाज उठा रहे है | सवर्ण समाजसे ऐसी मांग  क्यों आ रही है ? उसके पिछे राजनीती है क्या?  कहीं ऐसा तो नही की, पिछडे जाती और जनजातीके लिये संविधानमे रखे हुये प्रावधानको समयकी सीमा न रखनेसे  कहीं 'अती सर्वत्र वर्जते' ( Excess in anything is poision)  ऐसी स्थिती हो गयी है ? पिछडे जनजातीके लोगोंको क्रान्तीके नामपर समाजसे अलग होनेकी चेतावनी देनेका निरंतर प्रयास करनेवाली शक्तीयाॅ कौनसी है, उनका मकसद कहीं देशकी एकात्मताको कमजोर करनेका तो नही है? स्वतंत्रताके सत्तर सालके बाद आज भी इस सामाजिक समस्याने हमें त्रस्त करके रखा है,  यह हमारे लोकतंत्रको शोभा देता है क्या?  इस सभी बातोंपर मैने ब्लाॅगपर निम्नलिखीत लेखोंमे थोडी-बहूत चर्चा कियी है |

1)' मुक्काम पोस्ट भीमा कोरेगाव येथून '
2)' चित्रपट आणि समाजमन' और
3) 'देशभक्ती नारेबाजीत नव्हे अंतःकरणात हवी '
4) ' मिडीयातील सूत्र नावाचे अपत्य '
हालांकी यह सब लेख मराठी भाषामे है, इसिलीये  जिनकी मातृभाषा मराठी नही है ऐसे पाठककों विनंती है की वह अपने मोबाईलके अॅपसे जरीये अपने मातृभाषामे अनुवाद करके उपर बताये हुये लेख पढें | 

आज प्राथिमकता यह है की, सरकारने सभी प्रांतीय भाषाके उत्तोमत्तम साहित्यकृती, महापुरूषोओके, महायोद्धाओंके, संत-महंतओंके, और वैज्ञानिकोंके चरीत्र, उनका कार्य और उनके विचारोंकी,  किताबें और कथायें देशके सभी भाषामे अनुवादीत हो, इसिलीये एक व्यवस्था तैयार करनी होगी  और स्कूल तथा काॅलेज विद्यार्थीओंको विदेशी भाषाका सिखनेका जैसा ऑप्शन रखा जाता है, वैसे हमारे देशके प्रान्तीय भाषा(कमसे कम दो पडोसी प्रान्तीय भाषा) सिखनेको बढावा देना होगा | साथमे वैज्ञानिक दृष्टीकोनके प्रचारपर जोर लगा दिया जाय | उस कार्यमे किसी भी नागरिकके धर्म या जातीके प्रथा या प्रान्तीय अस्मिता जैसे विषयोंको राष्ट्रभावनासे अधिक महत्व देनेकी जरूरत नही है, ऐसा निग्रह सरकार तरफसे होना चाहीये | इतिहासकी कम जानकारी और सत्यताको नजरअंदाज करके, राजनैतिक फायदाके वास्ते  सार्वजनिक मालमत्ताकी तोड-फोड करनेकी वृत्तीपर लगाम लगाना होगा | दसवी कक्षाके बाद सभी राज्योंके विद्यार्थीयोंको राष्ट्रीय एकात्मता, राष्ट्रीय सुरक्षा, समाजसेवा, समाजशास्त्र  यह चार  विषयका एक सालका अभ्यासक्रम अनिवार्य करें तो, ना जातका भेद रहेगा ना धर्मका भेद ; ना गरीब-श्रीमंत भेद रहेगा ना मजदूर मालक भेद ; ना भाषाका भेद रहेगा ना प्रान्तका भेद रहेगा | उससे राष्ट्रीय एकात्मता मजबूत बनेगी और भारत एक महान शक्तीशील देश बन सकता है | हमारे समाजमे वह क्षमता है | बस समाजबांधवओंमे आपसमे समझदारी बढाना और उनकी उर्जाको सही दिशामे लानेकी जरूरत है |

       

सोमवार, २९ ऑक्टोबर, २०१८

शशीथरूरचे वक्तव्य, सीबीआय, शबरीमाला व श्री राम

  
'२०१९ च्या निवडणूक प्राचाराच्या तुंबळ युद्धाचे ढग' अशा शिर्षकाचा मी ७ सप्टेंबरला लेख ब्लाॅगवर पब्लीश केला आहे. त्यात मी म्हटले होते की आता देशात घडणार्या प्रत्येक घटनेवर राजकारण होणार पण न घडल्या जाणार्या घटनाही घडविल्या जातील तसेच न घडेलेल्या घटनाही घडलेल्या आहेत असे भासवून त्यावर राजकारण केले जाईल असे म्हटले नव्हते. पण दुर्दैवाने अलीकडे ज्या घटनावर सर्वत्र चर्चा होताना दिसत आहेत त्या दुसर्या सदरात मोडतात.

केरळ मधील शबरीमाला येथील अय्यपाच्या मंदिरात स्त्रियांना असलेली बंदी, सीबीआय ह्या संस्थेत दोन सर्वोच्च अधिकार्यात झालेला  कलगीतुरा, काँग्रेसचे नेते शशीथरूर ह्यांनी पंतप्रधान मोदी आणि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघा संबधी केलेले वक्तव्य, आज पासून रामजन्मभूमी खटल्याची सुरू होणारी सुनावणी इत्यादी विषयावर प्रिन्ट, ईलेट्रानिक्स, आणि सोशल मिडीयामध्ये होत असलेली चर्चा ही राजकीय स्वरूपाची असली तरी त्या पाठीमागे सुरू झालेल्या राजकारणाचा पोत निश्चितच भिन्न आहे. आपण म्हणाल, राजकारणात कसला आला आहे हो पोत? राजकारण हे राजकारणच असते. आपलं म्हणणं खरे आहे. तरीही मी राजकारणाचा पोत असा शब्द प्रयोग केला आहे,  ह्याचं कारण असे आहे की राजकारण हे बहुतांशी घडलेल्या घटनांवरून सुरू होत असते. ह्याचा अर्थ घडलेल्या घटनांवर आपल्या सोयीचा अर्थ काढून विविध पक्ष आपल्या प्रतिक्रीया देतात,  तेव्हा ते असते रूढार्थाने राजकारण. परंतु ज्या गोष्टी घडलेल्याच नाहीत, किंवा ज्या घटना मुद्दामहून घडवून आणलेल्या असतात त्यावरील वाद-विवाद, चर्चा, टाॅक शोज इत्यादीमध्ये राजकारणाचा पोत घसरलेला असतो. त्याला रूढार्याने राजकारण म्हटले जात नाही. कारण त्यात  फेक न्यूज, फेक आरोप, फेक विडीओज् ह्यांचा समावेश असतो.

प्रथम आपण शशीथरूर काय म्हणाले, त्याकडे पाहु या. शशीथरूर ह्यांनी पंतप्रधान मोदींसंबंधी अवार्च शब्दात हिणविले त्यावर काही चर्चा करण्याची जरूरी नाही. कारण काँग्रेसमध्ये जे वाचाळवीर आहेत, त्यावर समाजही दुर्लक्ष करतो आणि शशीथरूर उद्या परवापर्यंत ह्या संबंधीत माझ्या म्हणण्याचा विपर्यास केला असे म्हणणार. ज्या चॅनेलवरून शशीथरूरने मोदींना अवार्च शब्द वापरला ते चॅनेल हा विषय पुन्हा आणणारच नाहीत. कारण त्यासाठी त्यांना पाकीट मिळाले असणार. पण दुसर्या पद्धतीने कारण आता मोदींनी सर्व उत्पन्नाची तपशिलावर माहीती देण्याचे बंधनकारक केले आहे. शशीथरूर ह्यांचे दुसरे वाक्य असे आहे, "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंतप्रधान मोदीबाबत समाधानी नाही." हे वक्तव्य म्हणजे न ऐकलेल्या, न  घडलेल्या, न पाहीलेल्या घटनेचा गोबेल्स तंत्र वापरून समाजमन काँग्रेसकडे वळविण्याचा प्रयत्न आहे. आजचा काँग्रेस पक्ष किती केविलवाण्या स्थितीत आहे हे शशीथरूर ह्यांच्या वक्त्यावरून दिसते. त्यांच्या पक्षांचे राष्ट्रीय अध्यक्षा पासून ते प्रत्येक राज्यातील नेते भाजपावर टिका करताना म्हणत आहेत की भाजपाचे सरकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचा अजेन्डा राबवित आहेत. ह्या टिकेत जर तथ्य असेल तर राष्ट्रीय स्वयंसंवक संघ मोदीबाबत समाधानी नाही असे जे वक्तव्य शशीथरूरनी केले आहे ते खोटे आहे. ह्यातही गोम अशी आहे की, भाजपाचा उल्लेख न करता फक्त मोदीबाबत संघ असमाधानी आहे असे जाणून-बुजून म्हटले आहे. शशीथरूर हे ज्या काँग्रेसचे नेते म्हणून मिरवित आहेत त्या काँग्रेसचे सर्वसर्वा असलेल्या घराण्यातील पंडीत नेहरू, इंदिरा गांधी, संजय गाधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी व राहूल गांधी ह्यांचा अजेन्डा प्राधान्याने 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघावर टिका' करणे हाच राहीलेला आहे. ह्या अजेन्डामुळे बरीच वर्षे काँग्रेसला सत्ता प्राप्त होत राहीली. परंतु २०१४ सालच्या लोकसभा निवडणूकीत तसेच बर्याच राज्यातील निवडणूकीत काँग्रेसचा पराभव झाला. आणि ह्या पुढे डिसेंबर महीन्यात होणार्या चार राज्यातील निवडणूकीत आणि पाठोपाठ येणार्या लोकसभा निवडणूकीत काँग्रेसला निदान ह्या घटकेपर्यंत तरी मतदार आपल्याकडे वळतो आहे असे दिसत नसल्यामुळे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाला मानणारा हिंदु समाज आपल्याकडे वळविण्याचा प्रयत्न शशीथरूर ह्यांनी काँग्रेसच्या बड्या नेत्यांच्या संमतीने केला असावा असे वाटते आणि असेच असेल तर इतक्या आडवळणाने  प्रयत्न करण्याची काँग्रेसला गरज का पडावी ह्यातच काँग्रेसच्या पराभवाचे मुख्य कारण दडले आहे. काँग्रेसला हिंदु समाजाची मते हवी आहेत पण त्यासाठी सर्वधर्मसमभावाचे ओझे कमी न करता हवी आहेत. हे म्हणजे आपल्या डोक्यावर हजार किलोचे वजन घेऊन न थांबता दहा-वीस हजार पायर्या असलेल्या डोंगरावरील हिंदु मंदिरातील देवाचे दर्शन घेण्यासारखे आहे. म्हणून शशीथरूर ह्यांच्या विधानामुळे भाजपाचे नुकसान होईल असे वाटत नाही. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ह्या बाबत काही प्रतिक्रीया देईल असे वाटत नाही.  शेवटी पंडीत नेहरू, इंदिरा गांधी, संजय गांधी व  राजीव गांधी ह्यानां संघ नामशेष करण्याच्या प्रयत्नात जिथे दम लागला तिथे सोनिया, राहूल व शशीथरूर किस झाडकी पत्ती? हेच खरे.

आता केरळ मधील शबरीमाला येथील अय्यपाच्या  मंदिरात स्त्रियांना प्रवेश नाकारला जातो त्यासंबधीत चर्चा करू या. मूळात हा विषय केरळ सरकारने जाणून-बुजून उभा केलेला दिसतोय. अयप्पाच्या मंदिरात सर्वच स्त्रियांना प्रवेश नाकारला आहे असे नाही. शबरीमाला येथील मंदिराची जागा हे अयप्पा ह्या ब्रह्मचारी देवाचे मूलस्थान मानले जाते. तेथे १० ते ५० वयोगटातील स्रियांना प्रवेश नाकारला गेला व त्यास उच्च न्यायालयाच्या आदेशाने शिक्कामोर्तब केले होते. आता हा सरसकट महिलांविरूध्द लिंगभेद आहे कि अयप्पाच्या भक्तांचा श्रध्देचा विषय हे पहावे लागेल कारण केरळमधील हिंदू स्त्रियांनी बिनशर्त प्रवेश मिळावा ह्यासाठी अजूनपर्यंत  हट्टाहास केलेला आढळत नाही. हिदू धर्मात विविध देवाची रूप पूजली जातात त्यात काही मंदिरे अशी आहेत जेथे पुरूषांना प्रवेश नाही उदाहरणार्थ अत्तुकल व लिंगभैलवी. शबरीमालाचा विषय हिंदू धर्मातील तमाम महिलांच्या अन्यायाचा आहे की तीन तलाकाच्या अध्यादेशाला प्रतिवाद म्हणून सोयीचा आहे म्हणून केरळ सरकारने उरकून काढले  असावे अशी शंका स्थानिक केरळवासियांना वाटत असावी, नाहीतर हिंदूच्या तमाम स्त्रियांनी जल्लोष नसता का केला? एका ननच्या विनयभंगाबद्दल ख्रिश्चन धर्मगुरू विरूद्ध उठलेले वादळ, रॅफेल विमान खरेदी संबधीत मोदी विरूद्ध सुरू केलेल्या मोहीमेत न मिळणारे यश, इतर विरोधी पक्षाचे न मिळणारे सहकार्य, त्यातून  आलेल्या नैराश्यामुळे धर्म न मानणार्या केरळच्या साम्यवाद्यांनी हे प्रकरण हाताशी घेतले आहे असे दिसते. शबरीमाला मंदिरात प्रवेश घेण्याचा प्रयत्न करण्यासाठी ज्या दोन स्त्रिया पुढे सरसावल्या होत्या त्याही अहिंदू होत्या. एखाद्या धार्मिक रूढी वा पंरपंरा संबंधी संविधानात सर्वकष माहीती नसते. संविधानात  प्रत्येकाला आपल्या धर्मानुसार आचरण करण्याची मुभा दिलेली असते. त्यामुळे संविधानात स्त्रि-पुरूष समान ह्या नियमाखाली न्यायालयाने स्त्रियांना अय्यपा मंदिरात प्रवेश द्यावा हा निर्णय दिला आहे. मग ह्याच न्यायाने काँग्रेस आणि साम्यवाद्यांनी तीन तलाकाच्या निर्णयाला पाठींबा  दिला असता तर शबरीमाला प्रकरणात राजकारण नाही आणि साम्यवाद्यांना महीलांचा कळवळा आहे हे सिद्ध झाले असते. तीन तलाका संबंधीची याचिका मुस्लीम पीडीत स्त्रिने केलेली होती हे लक्षात घेणे आवश्यक आहे. उद्या एखाद्या गोव्यातील बिगर ख्रिस्ती नागरिकाने गोव्यातील चर्चमधल्या कथीत फादरचे शव अजूनही सडलेले नाही हे पाहण्यासाठी याचिका दाखल केली तर कोर्ट दाखल करण्याचे नाकारील का? आणि नाकारले तर संविधानानुसार वैज्ञानिक दृष्टोकोन बळाविण्यासाठी दिलेला नागरिकाचा हक्क धुडकावला असे होईल की नाही? असे प्रकरण जाणून बूजून गोव्यातील भाजपाच्या सरकारने उभे केले आहे का? नाही ना !  शेवटी लोकशाही ही संविधानातील कायद्यापेक्षाही राज्यकर्ते, राजकीय पक्ष आणि समाज ह्यांनी दाखविलेल्या समंजसपणावर अधिक शोभून दिसते. आपली संसदिय पद्धत ब्रिटनाच्या धर्तीची आहे. तिथे युरोपियन युनियन मधून बाहेर पडावे की न पडावे ह्यासाठी सार्वमत घेतले गेले ना ! केरळ सरकारला हा विषय आपल्या राज्या पुरता सिमीत करून सोडविता आला असता. पण धर्म अफूची गोळी आहे असे मानणार्या साम्यवादांना ख्रिश्चनांच्या चर्चमधून राजकारण करण्याची अवदसा आठवली आहे. ह्यांची  बंगालमधून हाकलपट्टी झाली. त्रिपूरातही ही मंडळी संपली. केरळ सरकारने सुरू केलेल्या राजकीय खेळीला भाजपाच्या अध्यक्षाने राजकीय खेळीने उत्तर दिले. त्यावर ज्यांना टिका करावयाची असेल त्यांनी जरूर करावी. पण केरळमधील डाव्यांचे बहूमत त्रिपुरा प्रमाणे हातून गेलेले दिसेल एवढे राजकीय भविष्य सामान्य मतदारही वर्तवू शकतो. एकंदरीत तिथली राजकीय हवा पाहता, लोकसभेच्या निवडणूकीत ह्यांना यशाची खात्री नसावी म्हणून भाजपाने राजकरणात धर्म आणला हे पराभवासाठी कारण अगोदरच पुढे करून ठेवलेले बरे, ह्याहून ह्यांच्यासाठी मोठी राजकीय सोय आहे कुठे?  

आता सिबीआयमधील दोन शिर्षस्त अधिकार्यामधील बेवनाव ह्यावर चर्चा करू या. कुठल्याही संस्थेत समशिक्षित, समवयस्क असणार्या दोन वा अधिक नेत्यांमध्ये परस्पर मतभेद, सत्तास्पर्धा ह्या स्वाभाविक असतात. परंतु अशा मतभेदातून मनभेद होत ते चव्हाट्यावर येतात तेव्हा त्यावर मिडीयात व  जनसामान्यात चर्चा घडू लागतात. काँग्रेस पक्षाचे अध्यक्ष राहूल गांधीनी पंतप्रधानांवर टिका केली आहे की नरेद्र मोदी हे सीबीआय संस्थेला स्वतंत्रपणे काम करू देत नाहीत. पंतप्रधान मोदीकडील रॅफेल विमानाच्या  व्यवहारासंबंधी असलेल्या फाइल आहेत व त्यासंबंधी आलोक वर्मा लवकरच चौकशी करणार होते असेही राहूल गांधीनी म्हटले आहे. मूळात पीएमओ आॅफीस मधील फाईल व सिबीआय मुख्यालयातील हालचाली संबंधीची माहीती राहूल गांधी कडे कशी आली ? असा प्रश्न भाजपा विचारणार हे ह्या पप्पू महाशयांना समजलेच नाही. तसेच जाहीरपणे सीबीआय प्रमुखाची तक्रार राहूल गांधी कशी काय मांडू शकतात ह्यावरही चर्चा सुरू झाली. एकंदरीत ह्या चर्चेवरून एकाच पक्षामधील एकाच घराण्याची अनेक वर्षे देशावर सत्ता होती, त्या पक्षाचे पंतप्रधानपदाचे उमेदवार राहूल गांधी हे उमेदवार नसून राजेशाहीच्या वारसाच्या थाटात वावरत आहेत हे स्पष्ट झाले आहे. राहूल गांधीच्या वक्तव्यावरून सीबीआयचे प्रमुख अलोक वर्मा सोनिया गांधी आणि चिदंबरमचे एजंट म्हणून काम करीत होते हा निष्कर्ष  सत्याच्या जवळपास जात आहे. पंतप्रधान मोदींनी सीबीयचे प्रमुख अलोक वर्मा आणि त्यांच्याशी मतभेद असलेले स्पेशल आॅफीसर राकेश आस्थाना ह्या दोघांना रजेवर पाठवून, श्री राकेश आस्थानांवर आपली खास मेहरबानी होती ह्या आरोपाचे निराकरण केले. राहता राहीला प्रश्न श्री अलोक वर्मा ह्यांनी श्री नरेद्र मोदीच्या घरावर धाड टाकण्याची तयारी केली होती त्या बातमी संबंधीचा. ही बातमी सत्य असो वा आवई पण त्यामुळे नुकसान होत आहे ते काँग्रेसचेच. कारण ह्या बातमीमुळे दोन सीबीआयच्या वरिष्ठ अधिकार्यामधील भांडणाचे स्वरूप भ्रष्ट सोनिया गांधी- चिदंबरम ही जोडी  विरूद्ध पंतप्रधान मोदी असे निर्माण झाले आहे. आता ह्यात पंतप्रधान मोदींची प्रतिमा स्वच्छ असल्यामुळे फायदा भाजपाला होणार हे निश्चीत. दुसरे असे की काँग्रेसचे साम्यवाद्या व्यतिरिक्त मित्रांची  'आपण का ह्या भानगडीत पडावे' अशी भावना झाली आहे हे ही दिसू लागले आहे. देशात सर्वत्र साठ वर्षाहून अधिक काळ काँग्रेस सत्तेवर तर प्रशासनात साम्यवादी होते हे जनतेला कळून चुकले आहे. त्यामुळे सीबीआय, आयबी, सर्वोच्च न्यायालयातील अंतर्गत भानगडी चव्हाट्यावर येतात ह्याचे कारण पंतप्रधान मोदीनी ह्या संस्थेत सुरू केलेली साफ-सफाईची  मोहीम, अशी जनसामान्यात भावना होत आहे. चार न्यायधिशांनी केलेले  बंड जसे फसले तसेच सीबीआयतील हे प्रकरण शांत होणार. त्यामूळे काँग्रेसचे मित्र पक्ष येणार्या निवडणूकीत कुपंणावर बसण्याची शक्यता अधिक दिसते. कारण आज गांधी घराणे आणि चिदंबरम जात्यात तर आपण  सुपात आहेत ह्याची जाणीव राष्ट्रवादी, डीएमके, तृणमूल, आरजेडी, मायावती, मुलायम इत्यादीं मित्रांना झालेली असणारच.

रामजन्मभूमी संबंधीतील खटल्याच्या सुनावणीला आजपासून सुरू होत आहे. हा खटला खरं म्हणजे रामजन्मभूमीच्या जमीनीसंबंधी. पण भाजपेतर सर्व पक्षांनी बाबरी मज्जीद पाडली गेल्यानंतर भाजपा आणि संघावर आरोपाचा भडीमार करीत  सत्ता उपभोगली. त्या सत्तेचा कैफ त्यांना इतका आला की त्यातून हे पक्ष ह्या प्रश्नाबाबत निव्वळ कोडगे बनले. मग हा प्रश्न आपोआप बहूसंख्याक हिंदूच्या भावनाशी निगडीत बनत गेला. त्यामूळे निकाल काहीही लागो, कधीही लागो, विरोधकांनी कितीही भाजपावर सांप्रादायिकचा आरोप करो, भाजपा सरकारने मूळ प्रश्नाकडे दुर्लक्ष केले असा टाहो त्यांनी कितीही फोडो, पण हा खटला भाजपाला विजय मिळवून देणार असे दिसते. विरोधी पक्षांच्या हातात आणि मुखात सतत एकच कार्यक्रम राहत आलेला आहे  तो  म्हणजे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाला झोडपण्याचा आणि तोच त्यांना नडणार आहे कारण तसे करताना त्यानी टोकाचे मुस्लिम लांगुलचालन व टोकाचा हिंदू द्वेष राबवला. राम खरच जन्मला होता का? हे विचारण्या इतपत पुरोगामीत्वाचा कैफ ह्याना चढला होता. वेळ पडल्यास मोदी सरकार आपल्या पोतडीतून अध्यादेशाचा रामबाण काढायला मागे पुढे बघणार नाही इतकी शक्ती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघानी भाजपासाठी उभी केलेली आहे हे विरोधकांनी मान्य केलेले बरे. ह्या विषयाशी निगडीत अधिक सविस्तर माहीती ब्लाॅगवरील  ७ आक्टोबरच्या लेखात दिलेली आहे. त्यामुळे ह्या ठीकाणी थांबतो.

शुक्रवार, २६ ऑक्टोबर, २०१८

काश्मीर विलय दिन



काश्मीर विलय दिनानिमित्त केलेले हिंदीतील भाषण येथे प्रकाशित करीत आहोत


आज २६ आक्टूबर | आजके दिन काश्मीर प्रान्त अपने भारत देशमे विलीन हुआ | देशके  सीमाओपर लढनेवाले हमारे जवानोंका साहस और पराक्रमको सलामी देनेका दिन है ,इसी  दिन उन्नीस सौ सैतालीसमे (1947) मे पाकिस्तानने काश्मिर प्रान्तपर किया हुआ हमलेको अपने जवानोंने करार जबाब देकर विजय हासील की थी | स्वतंत्रता के बाद पहलेही युद्धमे विजय प्राप्त करके भारतने दुनियाको दिखाया कि अब हम देशकी अंखडताका सौदा नही कर सकते है | आजही हम दुनियाको बताते है की काश्मीर भारतका अविभाज्य प्रान्त है और इस प्रान्तकी सीमापर होनेवाली दुश्मनकी कोई भी सैनिकी हमलेको करार जबाब देते रहेंगे | इस दिनका औचित्य नजरमे रखकर हम आज काश्मिर प्रान्तका इतिहास तथा वर्तमान स्थिती एवम् भविष्यमे हमारे देशकी नीती कैसी हो इसपर हम चर्चा करने जा रहे है | मै ना इतिहास विषयका तज्ञ हू, ना मै विदेश नीती और रक्षा नीतीका तज्ञ | मै एक आम नागरिक हू और जो कुछ मैने पढा है , सुना है, उसमेसे जो कुछ समझा हू वही कहने जा रहा हू | 

हम सभीने मंगलवार २२ आक्टोबरको 'कोजागिरी पुर्णिमाका' त्योहार मनाया | वह त्योहार आजके विषयके संदर्भमे क्या मायने रखता है उसपर थोडी नजर डाले तो हम सही दिशामे काश्मीर प्रान्तपर चर्चा कर सकेंगे ऐसा मुझे एहसास हुआ है |

क्या अर्थ है कोजागिरीका? मुलतः यह शब्द संसकृतमे है और वह है 'को जागर्ती ' ऐसा है | याने 'कौन जाग रहा है ?' और क्यू?  लक्ष्मी माता प्रसन्न होती है इसिलीए हम जागते है, यह हुआ धार्मिक अर्थ | इसका मतलब यह है की आम तौरसे मानव जातीको ऐश्वर्य एवं वैभव प्यारा होता है, और इस सिद्धान्तको ऋषीमुनी भलीभाॅती जानते थे |  इस सत्यका हम इस कलीयुगमे भी अनुभव करते है | लेकीन लक्ष्मी कब और किसको प्रसन्न होती है, यह जानना ऋषीमुनीओंने हमपर छोड दिया है | मेरी समझ यह है की 'जब हमारे अन्दर विराजमान हुई दुर्गामाता (शक्तीकी देवता)  जागृत रहेगी तब लक्ष्मी प्रसन्न होती है | शक्तीकी देवताका अर्थ है, ' मजबूत एकता |'  वैयक्तीक जीवनमे हमारे सभी इंद्रियें मिलजूलकर कार्य करते हो, तो हमारा शरीर तंदरूस्त रहता है | शरीर तंदरूस्त होगा, तो कर्म अच्छी तरहसे निभाना शक्य होता है | बादमे फल भी अच्छा मिलता है | आजके युगमे फलका अर्थ पैसा, वैभव यही है | हमारे समाज और राष्ट्रके संदर्भमे कोजागिरी पौर्णिमेका  याने ' कौन जाग रहे है '  इसका सही अर्थ है, ' कौन समाजकी एकता और मातृभूमीकी अखंडताके लिए जाग रहे है? ' यदि देशकी स्वतंत्रता नही टिकेगी तो  माता लक्ष्मी भी घरसे चली जायेगी | यह तो हमने अपने देशके इतिहाससे सिखा है | स्वतंत्रता देवीका नाम है, दुर्गा माता है और इसका बेहतरीन वर्णन स्वातंत्र्यवीर सावरकरजीने मराठी काव्यरचना लिखकर  बताया है | यदि हमारे अंदर विराजमान शक्ती देवताका हम सन्मान रखनेके लिए जागरण नही करेंगे तो माता लक्ष्मी कैसे हमारे घरमे रहेगी, आखिर लक्ष्मी भी दुर्गामाताकी ही रूप है ना |मुझे विश्वास है की  मैनै काश्मीर विलय दिनकी  चर्चाका प्रारंभ सही ढंगसे किया हो |

हमे काश्मीर विलय दिन क्यो मनाना चाहीये? हम स्वयं अपने आपको एक साधा और सिधा प्रश्न पुछें की, यदि हमारे परिवारके किसी एक सदस्यको गुंडोने किडनॅप किया हो और उसको हम गुन्डोसे छुडवाकर घरपर वापस लाते हो, तो हमें आनन्द होगा कि नही?  होगा, जरूर होगा | पाकिस्तान सैनिकों द्वारा काश्मीरपर  किया हुआ हमलेपर हमारे जवानोंने करारा जबाब देंके पाकिस्तान सैनिकोंकी पिटाई की, तो हमे आनंद होना स्वाभाविक है | हम गोवा मुक्ती दिन मनाते है, हम जुनागड मुक्ती दिन मनाते है , हम निजाम मुक्त हैद्राबाद दिन मनाते है | आजका दिन भी हमारा राष्ट्रीय त्योहार है | अब त्योहार मनाना है तो जिम्मेदारी भी स्विकारनी है | वैसे ही हमारे सभी त्योहारमे सामाजिक एकताको दृढ करनेकी जिम्मेदारी रहती तो है| इसमे कौनसी नयी बात है? सवाल यह है की काश्मीर विलय दिन मनानेसे हमपर कौनसी जिम्मेदारी है ? उसपर भी चर्चा करें | 

हमारा पहला कर्तव्य यह है की हमे अपने देशका वैदिक कालसे लेकर अबतक का इतिहासको सही ढंगसे समजना होगा | वैदिक कालसे हमारे देशकी सिमायें कहातक थी, इसकी जानकारी होना जरूरी है |  हम ना किसी अन्य देशकी भूमी चाहते है और ना कभी लेना सोंचेंगे | यही तो देशके सभी राजनैतिक पार्टीयोंकी भूमिका रही है और इसमे संदेह नही है | पर आज काश्मीर एक बडी समस्या बनी है, यह देखकर मुझे लगता है की काश्मीरके इतिहासको बेदखल करना यह एक बडी भूल हो सकती है | इसमे दो राय नही होनी चाहीये | जब काश्मीरके इतिहासपर चर्चा करते है तो प्रथमतः अपने देशका वेदकालीन उत्तरी-पश्चीम इतिहासका जिक्र करना जरूरी है |  आम तौरसे देखा जाय तो इस्लामी आक्रमक ज्यादा तर इस रास्तेसे भारतमे आये है|

विश्वके सभी देशोमें मध्ययुग या उसके पुर्व छोटे-मोठे स्तरपर राजेशाही नामकी व्यवस्था थी | इस दृष्टीसे अपने देशकी स्थिती अनन्य थी | क्योंकि इस अति पुरातन राष्ट्रका आधार सदासे ही सांस्कृतिक रहा है, राजनीतिक नहीं | यहाॅ राज्य आये और गये | एक नही, अनेकानेक राज्यों का भी एक साथ अस्तित्व रहा, गणराज्यसे लेकर राज्यतंत्र तक विविध प्रकारकी शासन पद्धतिया रही | नतिजा यह हुआ कि राष्ट्रके एक अवयव 'राज्य ' की ओर कालक्रम में समुचित ध्यान न दिये जानेसे कारन हानी भी हुई, यहाॅतक कि विदेशी-विधर्मी बर्बर आकान्ताओंने इस देशको लुटा,खसोटा और नोचा भी | अधिकतर हानी काश्मीरमे हुई | वैदिक कालमे हमारे देशकी उत्तरी-पश्चीम सीमा अरबस्थानतक थी | यही प्रदेश है जहाॅ यहुदी , ख्रिश्चन और इस्लामका जन्म हुआ| इनका मूलस्त्रोत भी एकही था | लेकीन इस्लाम और ख्रिश्चन धर्ममे अमानवी मूल्ये की चलती होनेके कारन विश्वकी शांतीपर खतरा खडा हुआ और वह आजतक है ऐसा मेरा मानना है | तुर्कस्थानी भी इस्लामके पुर्व कुशाण नामसे परीचित थे, और उनके प्राचीन भारतसे अच्छे संबंध थे | भारतिय भाषामेसे हिन्दी, संस्कृतकी जानकारी तुर्की लोगोंको भूतकालमे थी और आजभी है | जब पंतप्रधान मोदीजी तुर्कस्थानमे गये थे तब टिव्ही चॅनलपर तुर्की लोगोंको कूछ हिन्दी शब्दका अर्थ पुछा गया, उनका जबाब सही निकला| अफगणिस्थान तो महाभारत कालमे उपगणस्थान एवम् गांधार नामसे जाना जाता था| महमंद पैगंबरके जन्मसे पहले मक्का यह प्रदेश हरिहरका तीर्थक्षेत्र से जाना जाता था | मक्का से लंकातक यह भूभाग सैंधवतटी नामसे जाना जाता था, और ब्रह्मपुत्रा नदीके उगमस्थानसे पुरा उत्तरी भाग, निचे बंगालसे  केरल, कोंकण, कर्नाटक सिंहद्वीप भूभाग आर्यावर्त नामसे जाना जाता था | यह सब जानकारी  'विश्वव्यापी हिंदु संस्कृती' नामक डाॅ लोकेशचंद्रने लिखा हुआ किताबसे मिलती है | इस किताबका मराठी भाषामे अनुवाद प्राध्यापक उत्तरा हुद्दरने किया है| भारतके अन्य प्रांतिय भाषामे अनुवाद हुआ है याॅ नही यह मालूम नही है लेकीन नही हो तो यह कार्य होना जरूरी है| उत्तरी पश्चीम भारतका इतिहासका संशोधन और पठन करनेके बाद अधिकांश जगमान्य इतिहास तज्ञ इस नतिजेपर पहूचें है की काबूलके आगे ईरान( आर्यान) की सीमातक क्रमु(आजकी कुर्रम) सुवास्तु( स्वात) गोमती(गुमत) आदि नदिंयो के क्षेत्रमे विकसित गणराज्योंका यह केद्र था और इन्ही गणराज्योंने दो शतब्दीयों तक मुस्लीम आक्रमणको रोका था |

अब चर्चा काश्मिरके संक्षिप्त इतिहासपर | आज काश्मीर विलय दिन है इसिलीये हम काश्मीरपर चर्चा कर रहे है | लेकीन मुझे लगता है हमे अपने देशकी सभी प्रांतोका इतिहास तथा भाषाकी, साहीत्यकी थोडी बहूत जानकारी लेना जरूरी है, और यह एक आदर्श नागरिकताका लक्षण मानना चाहीये |  वैदिक कालमे काश्मीरमे हिन्दुओंकी बस्ती थी | इस प्रदेशको धरतीका स्वर्ग माना जाता था | अनेक हिन्दु देव-देवताओंका यहाॅ निवास था और कई हिन्दुकी मंदिरे भी थी | कश्यपके अलावा पतजंली, दृढबल, वसुगुप्ता, आनन्द, क्षेमराज आदि ऋषीयोंका भी इस प्रान्तके विकासमे योगदान रहा है | बारवही शतीमे कल्हण पंडित नामक विद्वानने लिखा हुआ रजतरंगिणी नामके ग्रंथमे महाभारतकालीन पहला गोनार्द राजाके कालसे चार हजार सालका काश्मीर प्रान्त का इतिहासका वर्णन है | कल्हण पंडितने काश्मीर संस्कृतीपर शैवमत तथा आचार्य अभिनव गुप्तका प्रभाव था इस सत्यकी पुष्टी की |  इस ग्रंथमे युधिष्ठरकी न्यायनिपूणताकी पुष्टी की है | इसके साथ  गांधार प्रदेशकी  (आजका कंधहार जो अफगणिस्थानमे है) राजकन्या के स्वयंवरका वर्णन है | उसी स्वयंवरमे भगवान श्रीकृष्णने यादवोको भाग लेनेके लिये भेजा था और उनके साथ दामोदर नामका सचिवको भेजा था जो युद्धमे मर गया इसिलीये उसकी गर्भवती पत्नी यशोमतीको राज्याभिषेक किया | मिहीरकुमार , प्रताप, जलोक इन सभी राजाओंका भी जिक्र किया है | केकय्या नामके काश्मीर नगरके कर्कोटा वंशके राजा ललीतादित्त मुक्तपिंडके कालमे काश्मीरका विस्तार मध्य आशिया और बंगाल प्रान्ततक था | काश्मीरमे ही शैवदर्शन, विष्णुधर्मोत्तर पुराण, योग वसिष्ठ जैसे ग्रंथोकी निर्मिती हुई है | सम्राट अशोक और कुषाण सम्राट कनिष्कके कालमे काश्मीर बौद्ध धर्मका केंद्र बना था | हिंदु देव-देवताके मंदिरओंका अस्तीत्व और अवशेष विश्वके हरेक प्रदेशमे थे और इसकी पुष्टी जिस तरह विश्वव्यापी हिंदु संस्कृती नामके किताबमे दि है  ऐसेही पुष्टी  काश्मीरके बारेमे रजतंरगिणी ग्रंथमे भी है ,इसिलीए  इसपर और अधिक चर्चाकी जरूरत नही है | काश्मीर प्रान्तमे भी सत्ताप्राप्तीकी स्पर्धा हिंदु राजाओंमे थी | यह बात कोई आश्चर्यकी नही है | विश्वके सभी देशमे इस तरहके वर्गयुद्ध होते थे | इसिलीए वहा भी अंतर्गत सत्ता स्पर्धा थी | जिस रजतंरगिणी ग्रंथकी मैने चर्चा की वह ग्रंथ मैने पढा नही है लेकीन उस ग्रंथका मराठीमे अनुवाद किया हुआ लेखिका डाॅ. अरूणा ढेरे और लेखक प्रशांत तळणीकर का किताब कुछ दिन पहले प्रकाशित हुआ है और उस किताबकी जानकरी मराठी वृत्तपत्रमे आयी थी | उसके आधारपर मैने आपको यह जानकारी दियी है |

मध्ययुगमे मुस्लीम आकान्तने मूल काश्मीर हिंदूओंको मुसलमान बननेपर या काश्मीर छोडनेपर मजबूर किया गयाउसके बाद काश्मीर प्रदेशकी सत्ता बारी बारीसे अफगाण और काश्मीर मुस्लीमके हाथोमे गयी | इसका कारन हिंदू समाजकी अतिसहिष्णूता और हिंदु राजाओंमे आपसी बैर भी कारन था | और यही कारन है की हिंदुस्थानकी पुरी सत्ता मुघलों और ब्रिटिशकोंके हाथमे गयी, यह इतिहास हम सभीको ज्ञात है | अंग्रजोंने उनकी अपने देशपरकी हुकमत  स्थिर करनेके लिये अठरासौ सत्तावनके पहीला स्वातंत्र्यसंग्रामके पश्चात  हिंदु-मुस्लीमोंमे भेदभाव बढानेकी कुटील नीतीका आधार लिया | और इसके बाद  'हम मुस्लीम इस देशके शासक थे ' ऐसा अहंकार  मुस्लीम बांधव और बॅरिस्टर जिनाके नेतृत्वमे मुस्लीम लीग पार्टीमे पैदा हुआ,  नतीजा रक्तरंजित खंडीत स्वातंत्र्य हमे मिला | यह इतिहास हम सब पढ चुके है |

स्वतंत्र भूभाग (उत्तरी-पश्चीम दिशाका इलाका और पुर्वीमे बंगालका) और उसके साथ एक्यावन कोटी रूपयोका इजाफा मिला फिर भी पाकिस्तान संतुष्ट नही हुआ और आज भी असंतुष्ट है | सिर्फ असंतुष्ट रहते तो बातचितसे हल निकल सकता, लेकीन पाकिस्तान धर्मके आधारपर निर्माण हुआ एक  राष्ट्र है, इसिलीए उस राष्ट्रके नागरिकोंको एवम् शासनकर्ताको  साम्राज्यवादकी लालसा नींद आने नही देती है | इसके अलावा  हिंदु समाजका नाक नोंचा इसका अहंकार, हरघडी हिंदुओंका द्वेष  पाकिस्तानके शासककोमे आज भी है | देशके विभाजन समय पाकिस्तानने वहाॅके हिंदुओंपर भारी मात्रामे अत्याचार किया | हजारो-लाखो हिंदुबांधवोकी हत्या की, उनकी जायदाद, सामान लुटा, माता-भगिनी पर अत्याचार किया, उनको फटे हुये कपडोमे निर्वासित होकर भगा दिया | और भारतसे जो मुस्लीम बांधव पाकमे गये, वह स्वखुषी और सन्मानसे गये | और जो करोडोकी संख्यामे भारतमे रहे उनको अल्पसंख्याका दर्जा देकर स्वतंत्रताके बाद काॅंग्रेसने ब्रिटीश सरकारकी नीती अपनायी | सिर्फ सत्ताके लिये | वहा पाकिस्तानमे हिंदु मंदिर तोडा गये और यहा राम जन्मस्थलपर  मंदिर निर्माणपर  विघ्न पैदा कर रहे है । कोर्टमें कही हार ना हो जाए इसिलिये ये मामला लटका रहे एैसा प्रयास कर रहे है | भाजपा छोडकर सभी राजनैतिक दल आज भी अपना देश मिश्र संस्कृतिका है, ऐसे  झुठा सिद्धांतको बढावा देते है| देशके विभाजनके समय हिदूओंकी इज्जत लूट गयी, संपत्ती लूट गयी, कभी वापस न आनेवाली जीवीत हानी हुई | कौन काॅंग्रेसी नेता और साम्यवादी नेता, हिदुओंके आंसू पोंछने गये थे? बस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघके  सरसंघचालक गोलवलकर गुरूजी और उनके साथ स्वयंसेवक गये थे |

स्वतंत्रता के दोन महीनेके अंदर पाकिस्तानने  काश्मीरपर हमला किया | हमारे तत्कालीन पंतप्रधान पंडीत नेहरूने हमलेको प्रत्त्युत्तर देनेका निर्णयमे समय गवाया | इसकी वजह क्या थी वह पढनेको मिली है | काश्मीरका सत्ताधिश होनेका स्वप्न देखनेवाले शेख अब्दुल्लाकी पंडीत नेहरूके साथ गहरी दोस्ती थी | शेख अब्दुल्लाने नॅशनल कान्फरन्स नामका राजनैतिक दल स्थापन किया था और उसमे सिर्फ मुस्लीमोंको ही सदस्यता दि जाती थी | उस समय काश्मीरके गद्दीपर डोंगरा वंशजके राजा हरिसींह थे | उनका विचार काश्मीरको भारतमे विलय करनेमे था | लेकीन उसी समय उनको गद्दीसे उठानेकी साजीश शेख अब्दुल्लाने रची थी | और इसी साजिशको तत्कालीन पंतप्रधान नेहरूकी सम्मती लेनेके लिये पंडीत नेहरूको शेख अब्दुल्लाने काश्मीरमे बुलाया था | लेकीन राजा हरसिंहने पंडीत नेहरूको श्रीनगरसे वापस भेज दिया | इस अपमानको नेहरू जिंदगीभर भुले नही | जब काश्मीरपर पाकिस्तानका आक्रमण हुआ तब राजा हरिसिंहको सबक सिखानेके लिये उसी आक्रमणको जबाब देनेके निर्णयमे जानबुझकर देरी की | भारतिय जवान पाकिस्तानके आक्रमणको करार जबाब दे रहे थे उसी समय राजा हरिसिंहने काश्मीरका भारतमे विलय करनेकी शिफारसपर अपनी दस्तक की | इसमे तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघके सरसंघचालक गोलवलकर गुरूजीका बडा योगदान रहा | उधर भारतिय जवान पाक फौजीकी पिटाई कर रहे थे और पुरे हिम्मतसे काश्मीरका गवाया हिस्सा वापस लेनेके मूडमे थे तब पंतप्रधान पंडीत नेहरूने काश्मीरके बारेमे युनोकी मदद लेनेकी घोषणा कर दी | युद्ध विराम हुआ | आक्रमण पाकिस्तानने किया था और उसको जबाब देनेके निर्णयमे भारत सरकारने देरी की,  नतिजा आज भी  काश्मीरका वह हिस्सा पाकीस्तानके पास है, जहाॅसे पाकिस्तान भारतके सीमापार आंतकवादीयोंको प्रशिक्षण देता है | पंडीत नेहरूके इस निर्णयसे उनकेही मंत्रीमंडलके सदस्य डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जीने इस्तिफा दिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघकी मदद लेकर भारतिय जनसंघ नामका राजनैतिक दल स्थापन किया |उसीका परावर्तीत नाम है भारतिय जनता पार्टी | पंडीत नेहरूकी गलतीपर प्रखर गांधीवादी अच्युतराव पटवर्धन जैसे नेताओंने कडी अलोचना की थी | आज उस घटनाको इकाहत्तर साल पुरे हुये फिर भी आज अपने देशका कोई प्रातंका नागरिक काश्मीरमे ना जमीन ले सकता है, ना व्यवसाय करता है | और भी बहूत ऐसे चिजे है जो कलम 370 मे है,  जिससे ना काश्मीरी नागरिकका हित है ना अपने देशका हित है | आज काश्मीरकी हालत क्या है, यह हम सब हरदिन पढते है | देशके तिजोरीपर हरदिनका कितना बोज काश्मीर समस्याके कारन पड रहा है, उसकी गिनती नही हो सकती है |काश्मीरमे पाकिस्तानने छेडा  हुआ छुपा युद्ध हमारे घरके द्वारपर भी आ सकता है |  'सदैव सतर्कता ' यह  एक बहूत बडी,  लंबी, और न खत्म होनेवाली जिम्मेदारी हम जैसे सामान्य देशवासीयोंपर भी है, ना सिर्फ सेनादल याॅ सरकारके खंदे पर है | इसिलीये राष्ट्रीय एकात्मता और देशकी अखंडताको मजबूत करनेके लिये जो भी उचीत सहाय्य हम दे सकते है वो देना चाहीये |

वन्दे मातरम् |

मंगळवार, २३ ऑक्टोबर, २०१८

कोजागिरी पौर्णिमा



परवा एका मित्राचा फोन आला व म्हणाला, आमच्या मंडळाच्या कोजागिरी पौर्णिमेच्या उत्सवाला येशील का आणि येऊन कार्यक्रमाच्या प्रारंभी कोजागिरी पौर्णिमेवर पंधरा-वीस मिनिटे भाषण करशील का? मी म्हणालो, येईन'.फोन ठेवला. मी होकार दिला खरा पण माझी चल-बिचल झाली. आपण म्हणाल, " त्यात काय आहे? भाषण करून परत या. मध्यरात्रीपर्यंत थोडेच थांबायचे? गुरू पौर्णिमेला जातो तसे जाऊन यायचे परत." प्रश्न मध्यरात्रीपर्यंत थांबण्याचा नाही. अलिकडे आषाढी अमावास्याला एक्सर गावदेवी मंदिरात दीपोत्सव साजरा झाला होता. तिथे मी प्रमुख वक्ता होतो. मंदिरात सर्वत्र पेटत्या दिव्यांची आकर्षक रोषणाई पाहून मी भाषणाचा प्रारंभच " कोण म्हणतेय आमावास्या अशूभ असते.हा दिव्यांचा लखलखाट पाहून मन प्रसन्न झाले आहे" ह्या वाक्याने केला. पुढे मी म्हटले " अमावास्येला दिवे लावले की भूत-पिच्चाश वैगरे पळून जातात. दिवे लावले कि अमावास्या शुभ झालीच म्हणून समजा. दिपोत्सव म्हणजे भक्तीयोग, ज्ञानयोग, आणि कर्मयोगाच्या संगमाचं विलोभनीय दर्शन होय.' दिवा म्हणजे तीन पंचमहाभूतांचा संगम. दिव्यात तेल असते. ते मिळते जमीनीतून. म्हणजे पृथ्वी. हे एक पंचमहाभूत.  दिव्याला नमस्कार करताना 'दीपज्योती नमोस्तुते' असे आपण म्हणतो. ज्योत हे तेजाचे प्रतिक आहे.   दिवा लावण्यासाठी अग्नी लागतो. ते ही तेज नावाचेच पंचमहाभूत. दिवा तेवत राहण्यासाठी तेल हवे असतेच. पण हवाही आवश्यक असते. म्हणजे वायू हे पंचमहभूतही दिव्यात समावलेले असते. दिवा तेवत राहणे हे दिव्याचे वैशिष्य. म्हणजे ज्ञानाची कास धरणे. म्हणजे ज्ञानयोगी बनणे. त्यासाठी तेलाची आवश्यकता असते. भक्ती विना ज्ञान अधुरे. तेल म्हणजे भक्तीयोगाचे प्रतिक. सारं काही आहे पण कर्म नाही केले तर कुठला भक्तीयोग आणि कुठला ज्ञानयोग? म्हणून वात आवश्यक. वात हे कर्म योगाचे प्रतिक.." दिव्याचे मला जसे आकलन झाले होते त्यानुसार मी गावदेवी मंदिरात झालेल्या दोपोत्सव समारंभात भाषण केले. ते भाषणच माझ्या मनचक्षूसमोर उभे राहीले. आणि आता तर पौर्णिमेच्या महत्तीसंबंधी बोलायचे आहे. सामान्यतः आपण अमावास्या आपण अशुभ मानतो पण पौर्णिमेला शुभ मानतो. त्यातही ही कोजागिरी पौर्णिमा. तिची महत्तीवर बोलायचे पंधरा-वीस मिनिटात बोलणे थोडेसे अवघडच म्हणायचे.

लागलीच दुसर्या क्षणाला मनात आले की आपण दिवा कशासाठी लावतो? उत्तर सोपे आहे. ' दिवा मांगल्याचे प्रतिक आहे, म्हणून आपण दिवा लावतो.परंतु हे उत्तर अपुर्ण वाटले. मग सुचले अंधार असतो म्हणून दिवा लावतो. आमावास्याला अंधार दाट असतो. ह्याचा अर्थ हाच की दाट काळोखी रात्र असल्याशिवाय ना दिव्याचे महत्त्व जाणता येते, ना पौर्णिमेचं महत्त्व कळणार. एका लेखकाचे बोल आठवले." अहो, जीवनात दुःख , संकटे आहेत म्हणून तर सुखाची मधुर चव चाखता येते.संकटे येतात,ती आपली परीक्षा पाहण्यासाठीच. जगात काळोखी रात्र आहे म्हणून चंद्राला महत्त्व आहे." मुलतः मनुष्याचे स्थानच ह्या विश्वाच्या विराट पसार्यात अगदीच नगण्य आहे. माणूस रड घेऊन जन्माला येतो आणि रडं ठेवूनच जातो. जीवनात अपरिहार्य असलेली दुःखे सहन करून नवनवीन स्वप्न पाहणं, ती फुलविणं, सत्याची पुर्तता करण्याचा आटोकाट प्रयत्न करणं आणि त्या धडपडीतला आनंद चाखणं ह्यातच जीवनाचं सार आहे. जीवनाचे हे सार प्रत्यक्षात कृतीत आणण्यासाठी सर्वात उत्तम मुहूर्त म्हणजे कोजागिरी पौर्णिमा.  

दिवस-रात्र हा निसर्गाचा नियम. चंद्राच्या कला वाढत जातात, आणि कमी होत जातात. अमावास्याला समुद्राला मोठी भरती येते. जर आकाशातील चंद्राच्या भ्रमणामुळे समुद्राला भरती येत असेल, तर चंद्राच्या भ्रमणाचा आपल्या मनावर परीणाम होत नसतो असे कसे मानता येईल? ज्योतिषशास्त्रात चंद्राला मनाचा कारक म्हणतात त्यात सत्य असावे. चंद्र फुलत गेला की आपले मनही फुलत जात असावे. जगभरातल्या सर्व कवी-कवीयत्रींना पौर्णिमेच्या चंद्राच्या सौंदर्याने भुरळ घातली आहे. प्रश्नोपनिषद मध्ये प्रजेची उत्पत्तीचे वर्णन आहे. वनस्पतीरूपी अन्नाच्या मंथनातून जीवबीज तयार होते. सूर्य हा जीवतत्त्वाचा वर्धक असल्याने त्याच्या प्रकाशात जीवतत्त्वाचें संवर्धन, जीवबीजाचा संग्रह होत असतो आणि चंद्राच्या शीतल प्रकाशात त्याचे रोपण केले जात असते. म्हणूनच पौर्णिमेच्या दिवशी कुठला तरी सण व देवादिकांच्या, महानुभवाच्या जंयत्या आल्या असाव्यात. त्यातुन पौर्णिमेच्या उत्सवाला महत्त्व आले असावे. त्यात आजची ही कोजागिरी पौर्णिमा. आपल्या शास्त्रात ह्या पौर्णिमेला अनन्यो महत्त्व आहे. वर्षा ऋतु संपल्यानंतर ही आश्विन महीन्याची पौर्णिमा येते. वर्षा ऋतुत चंद्राचे फारसे दर्शन होत नाही. आपण चंद्राचे दर्शन घेण्यात उत्सूक असतो. घरात नवीन पीक आलेले असते. त्या नवान्नाचे प्राशन ह्या दिवशी केले जाते. रात्री चंद्राच्या किरणात दुध ठेवले जाते व नंतर ते आपण प्राशन करीत असतो. चंद्राच्या शितल किरणात आयुर्वेदीक शक्ती असते. नव्या कल्पना, नवे संकल्प करण्यास ह्या पौर्णिमेसारखा चांगला मुहूर्त नाही. तसे पाहता आपल्या ऋषीमुनींनी आपल्या सणांची योजना अशा रितीने केली आहे की, प्रत्येक सण हे ऋतुमानानुसार आहार-विहार करावा असेच शिकवितात. आहार-विहारावर आपले विचार, कर्म अवलंबून असते. कोजागिरी पौर्णिमेला मौज-मस्ती खाणे-पिणे, गाणे इत्यादी गोष्टी असतातच, पण त्याच बरोबर लक्ष्मी प्राप्तीसाठी जागरण करा असा सल्ला दिला आहे. मनुष्याला ऐश्वर्य आणि वैभवाची ओढ असते ह्या सहजवृत्तीची ऋषीमुनींना जाणीव होती. आज आपण कलीयुगात राहात असताना आपली वरील सहजवृत्ती कायम आहे. उलट वाढलीच आहे. ऋषीमुनींनी आपल्या सहजवृत्तीची जाण ठेवली, पण ' को जागर्ती? ' हा प्रश्न ठेवून. बघु या त्याचा अर्थ.

ह्या पौर्णिमेच्या दिवशी मध्यरात्री लक्ष्मी माता 'कोण जागत आहे ? '( को जागर्ती?) असे विचारीत संचार करीत असते आणि सांगत असते कि, तस्मै वित्तं प्रयच्छामि यो जागर्ति महतले | म्हणजे जो जागत आहे त्याला मी धन देईन. आपल्या शास्त्रात ऐहीक उन्नतीला त्याज्य मानले नाही. उलट लक्ष्मी स्त्रोतात अगस्ती ऋषी म्हणतात,
        " पांडीत्यम् शोभते नैव न शोभन्ते गुणा नरः |
          शीलत्वम् नैव शोभन्ते महालक्ष्मी त्वया विना ||
(धनसंपत्ती शिवाय ना विद्वत्ताला शोभा येते ना गुण शोभून उठतात. शीलाची शोभाही धनानेच वाढते.) 

अर्थात धन चांगल्या मार्गाने कमाविणे हे ही शास्त्रात सांगितले आहे. पण धन कमाविण्यासाठी कष्ट करावे लागतात. त्यासाठी आपले शरीर सक्षम असावे लागते. म्हणजेच आपल्यात विराजमान असलेल्या शक्तीची देवता असलेल्या दुर्गामातेची उपासना आवश्यक आहे. शक्तीची देवता म्हणजे मजबूत एकता. आपल्या शरीरातील सर्व अवयवामध्ये परस्पर ताळमेळ ठेवला की शरीर सक्षम बनते. म्हणजे आपले कर्म आपण चांगल्या रितीने पार पाडू शकतो. एकदा कर्म उत्तम रित्या पार पाडले की कर्माचे फल चांगले मुबलक मिळते. आजच्या युगात कर्मफल म्हणजे पैसा वा धन हेच होय. जो नियम व्यक्तीला तोच नियम समाज आणि राष्ट्राला लागू होतो. को जागर्ती ह्याचा अर्थ कोण जागे आहे.म्हणजे समाजाची एकता आणि राष्ट्राची अखंडतेसाठी कोण खर्या अर्थाने जागे आहे तिथे लक्ष्मी येणार. राष्ट्राच्या जीवनात स्वतंत्रता देवतेचे नाव दुर्गामाता आहे. जर देश पारतंत्र्यात गेला की आपल्या सर्वांची प्रिय लक्ष्मी माता गायब होणार हे आपण अनुभविले आहे. एकदा का आपल्या शरीरातील, समाजातील, देशातील दुर्गामाता गेली की पाठोपाठ लक्ष्मी माता ही तिच्यासोबत निघून जातेच. शेवटी लक्ष्मीमाता ही दुर्गा मातेचेच रूप आहे की. तसेच लक्ष्मीचे वित्तलक्ष्मी, गुणलक्ष्मी, सौंदर्यलक्ष्मी, भावलक्ष्मी इत्यादी रूपांचे वर्णन आहे. ह्या सार्या देवता स्थायी स्वरूपात ठेवण्याची जाणिव रहावी म्हणून कोजागिरी पौर्णिमेच्या उत्सवाची योजना आपल्या ऋषीमुनींनी कलेली दिसते. आपल्या पुराणात वलीत नावाच्या विद्वान ब्राह्मणाची कथा आहे. परंतु अयाचक वृत्तीमुळे तो निर्धन होता. आणि  त्याची पत्नी त्याला दुषणे कशी देत असते, इत्यादीसंबंधीचे वर्णन आहे. तात्पर्य हेच की लक्ष्मीचा अभाव असणे ह्यात पुरूषार्थ नसतो. धनवान, ज्ञानवान, गुणवान, होण्यासाठी सतत प्रयत्न करणे गरजेचे असते. जागरण ह्याचा अर्थ जीवनातील प्राणशक्ती, ज्ञानशक्ती, बलशक्तीचे संवर्धन करण्यासाठी प्रयत्न करणे हेच होय. खगोलशास्त्रात म्हटले आहे की ह्या दिवशी चंद्र पृथ्वीच्या फार जवळ आलेला असतो. म्हणून इतर पौर्णिमे पेक्षा ह्या पौर्णिमेला चंद्र अधिक मोठा दिसतो. त्यामूळेही कदाचित इतर पौर्णिमेपेक्षा ह्या पौर्णिमेचा उत्सव व्यापक रित्या साजरा होताना दिसत असतो. 

ह्या पौर्णिमेच्या दिवशी छत्रपती शिवाजी महाराजाला भवानी मातेने दृष्टांत दिला होता असे इतिहासात म्हटले गेले आहे. छत्रपती शिवाजी महाराज म्हणजे अष्टपैलु व्यक्तीमत्व. सार्या गुणांची खाण म्हणजे शिवाजी महाराज. त्यांच्यातल्या गुणांचे संवर्धन अधिक झाले ह्याचे कारण त्यांनी स्वराज्याचा ध्यास घेतला होता. आपल्या धर्मसंस्कृक्तीचे रक्षण करणे, आपल्या समाजाच्या हातांना असलेल्या परकियांच्या शृखंला काढण्याच्या ध्येयाने ते सतत जागृत होते. कुठल्याही ध्येयाचे स्मरण ठेवुन त्यासाठी प्रयत्न करणे म्हणजेच जागरण होय. संपूर्ण वर्ष चांगल्या कार्यासाठी सतत झटण्यासाठी एक वृत्ती बणावली की आपोआप कोजागिरी पौर्णिमेच्या दिवशी मनाला एक अभूतपुर्व समाधान लाभते. म्हणजेच लक्ष्मीचा वरदहस्त प्राप्त होतो. स्वामी विवेकानंदाच्या आयुष्यातला एक प्रसंग वाचलेला आठवतोय. ते अमेरिकेत व्याख्यान देण्यासाठी अमेरिकेत गेले होते तेव्हाची ही गोष्ट. दिवसभर व्याख्यानं आणि भेटायला येणार्या उत्सुक श्रोत्यांची इतकी गर्दी असे की त्यांना क्षणभरही उसंत मिळत नसे. रात्री अंथरूणावर पडल्यावर मात्र त्यांना उद्याच्या व्याख्यानात काय बोलायचे हे ओठावर येत असे. विशेष म्हणजे याला त्यांनी चमत्कार मानलं नाही. या घटनेचं विश्लेषण करताना ते म्हणाले, एखाद्या गोष्टीचा ध्यास घेतला की मनाला काही जाणवत जातं आणि मग आपलं मनच आपलं गुरू होऊन जातं. कुठल्या तरी ध्यासाने पछाडलेले असले की आपोआप मार्ग दिसतो. आपल्या धर्माचा प्रसार करण्याचे ध्येय, आपल्या समाजातील ग्लानी जावी ही तळमळ म्हणजे जागे राहणे. को जागर्ती ह्या प्रश्नाचे खरे उत्तर शोधावयाचे असेल, तर ते आपल्या संत-महंत आणि थोर पुरूषांच्या चरीत्रात मिळते.

कोजागिरी पौर्णिमेला चंद्र पृथ्वीच्या जवळ येतो म्हणून स्वाभाविकतः चंद्राची सुदंरता व शितलता ह्यांचा समन्वय अधिक असतो. आपले  रामकृष्णादि अवतार पाहात्यांच्या सौदर्याचे, शितलतेचे वर्णन शब्दात  करता येत नाही. म्हणुनच त्यांना रामचंद्र आणि कृष्णचंद्र अशी नावे पडली आहेत.

चंद्राचा प्रकाश केवळ शीतल व शान्त आहे एवढेच नाहीतर तो प्रकाश वर्षा ऋतुत रूजलेल्या वनस्पती, अनेक औषधीच्या गुणांना, शेतात उगवलेल्या धान्याला पुष्ट करीत असतो. म्हणूनच ह्या पौर्णिमेचे महत्त्व अधिक मानले गेले आहे. कोजागिरी पौर्णिमा म्हणजे जागृतीचा उत्सव, वैभवाचा उत्सव आनंदाचा उत्सव ! म्हणूनच भगवंताने  विभूती योगात म्हटले आहे
                  नक्षत्राणाम् अहं शशी
पुढे भगवंत म्हणतात
        पुष्णामि च् औषधीः सर्वः सोमो भूत्वा रसात्मकः |
(अर्थ रसात्मक सोम बनून मी सर्व औषधींना पुष्ट करीत असतो) 
रामकृष्णादि वा संत-महंता सारखे आपण सार्या विश्वाच्या कल्याणाची चिंता वाहवू शकत नसलो तरी आपल्या मनात चागल्या विचारांचे, सद्गुणांचे संवर्धन करण्यासाठी जागरण करणे हेच कोजागिरी पौर्णिमेचा उत्सव साजरा करण्यापाठीमागचे कारण आहे.

आज आपल्या समाजाला कुप्रथेने विळखा घातलेला आहे. भ्रष्टाचार, वैचारिक दिवाळखोरीने समाजाला ग्रासले आहे. माता-भगिनींवर अत्याचार होत आहेत. समाजात जाती-भेदाचे प्रमाण वाढत आहे. समाजातील व्यसनाधिनता, आळस, द्वेष, असुया, नैराश्य, इत्यादी दुर्गूणांचा नायनाट करून प्रेम, शांती, एकतासुबत्ता, शौर्य इत्यादी गुणांचे संवर्धन करण्याचा दिवस म्हणजे कोजागिरी पौर्णिमा होय. 

गुरूदेव रविन्द्रनाथ टागोरांच्या जीवनातील एक प्रसंग आहे. एकदा होडीत बसून ते यमुना नदी पार करीत होते. ती रात्रीची वेळ होती. मेणबत्तीच्या प्रकाशात, टागोर एक कविता करण्याच्या प्रयत्नात होते. परंतु काही केल्या त्यांची ती कविता साकार होईना. शेवटी त्यानी नाद सोडला आणि मेणबत्ती विझविली. मेणबत्ती विझविता क्षणीच शीतल चंद्र प्रकाशाने त्यांची होडी उजाळली आणि फार सुरेख दिसू लागली ! टागोरांना एका महान सौंदर्याची अनुभूती तेथे आली. तत्क्षणी, काव्य त्यांच्या हृदयातून ओसंडू लागले अगदी  विनासायास. तो दिवस कौजागिरी पौर्णिमेचा असावा.

संत कबीर म्हणतात, परमेश्वराचा शोध घेण्यासाठी मी मंदिरे, तलाव, मनोरे, पर्वत सारं काही पालथी घातली. शेवटी थकून भागून मी स्वतःस समजाविले, ' परमेश्वर भेटला नाही म्हणून काय झाले? शेवटी परमेश्वराची माझ्यावर अखंड कृपा आहे असे मानण्यास सुरूवात केली. आपसुकच प्रेम, शांती आणि आनंदाने तृप्त असे दैवी जीवन मी जगू राहिलो. दैवी शक्तीचा अंश माझ्यात आहे असा साक्षात्कार आला. अचानक चमत्कार घडला, आणि हे कबीर ! तू कुठे आहेस? मी तुलाच शोधत आहे, अशी परमेश्वर मला हाका मारीत असल्याचे ऐकू आले. कबीर म्हणतात, मी परमेश्वराला म्हणालो, हे भगवंता, आयुष्यभर मी तुला शोधत राहिलो, परंतु आता मात्र तू मला शोधत आहेस. माझ्या अंतरंगातील परमेश्वराला मी पाहिले आहे . म्हणून आता तुझ्याशी मला काहीच कर्तव्य नाही.

कबीर असो किंवा इतर संतमडळी असो, स्वामी विवेकानंद असो वा त्यांचे गुरू रामकृष्ण, अध्यात्मिक गुरू असो वा वैज्ञानिक असोसाहित्यकार असो वा संगीतकार, शिवाजी महाराज असो वा लोकमान्य टिळक ही सारी मंडळी निद्रेत सुद्धा जागेच असावेत. ध्येयाने प्रेरीत झालेली ही मंडळी.  आपण निदान कोजागिरी पौर्णिमेच्या दिवशी का असेना, चांगल्या विचाराची देवाण-घेवाण करू या. आजच्या रात्री एकत्र कुठल्यातरी सामाजिक समस्येवर चर्चा करून तोडगा काढण्याचा प्रयत्न करू या. देव फुलापासून फक्त सुगंध मागतो. वृक्षाला देव म्हणतो, तु फळाने बहरत राहा. कोकीळेला सांगत तु तुझे कुंजन सुरू ठेव पण मानवाकडून देवाच्या अपेक्षा मोठ्या आहेत. देव मानवाला सांगत आहे,  "मी तुला अंधार दिला आहे. तु प्रकाश निर्माण कर.(तमसो मा ज्योतिर्मय|) जिथे घाण आहे, तिथे स्वच्छता निर्माण कर.(असत मा सद्दगमय) मृत्युवर विजय मिळव. म्हणजे तुला दोन दिले आहेत कर त्याच्या साह्याने असे काही कर कि तु किर्तीरूपाने अमर होशील. तुला मन आणि बुद्धी दिली आहे. त्याचा उपयोग कर.( मृत्युर्मा अमृत गमय |)" मित्रहो, मानव ही ईश्वराची सर्वोत्तम निर्मिती आहे. ह्यात आपल्याला काही संदेह आहे का? नाही ना ! मग आपण संकल्प करू या की निदान मी सर्वांशी प्रेमाने  बोलेन. त्यामुळे माझ्या मनातील अंधकार नाहीसा होऊन एका पणती एवढा प्रकाश निर्माण करीन !      

आपल्या सर्वांना कोजागिरी पौर्णिमेच्या हार्दिक शुभेच्छा !

मंगळवार, ९ ऑक्टोबर, २०१८

आपण व आपली दैवते-(ईश्यावास्यम इदम् सर्वम्)


आपण व आपली दैवते ह्या विषयावर लेखमालिका सुरू केली त्यावेळी सुरवातीलाच मी कबुल केले आहे की हा विषय जसा अनादि तसाच अनंत आहे. पण अनंत म्हणजे तरी किती ह्या प्रश्नानेही मला सताविले. शेवटी अध्यात्म क्षेत्रातील महामेरूंनी 'ईश्यावास्यम् इदम् सर्वम्' ह्या प्रार्थनेचा जो अर्थ स्पष्ट केला आहे तो वाचला. पण केवळ वाचनाने तो  पुर्णपणे कळणार तरी कसा? कारण वाचन तरी किती? महासागराच्या पाण्यातील ओंजळीभर पाण्याहून ही कमी. कारण आपल्या ओंजळीतील पाणीही गळत असतेच ना.  अध्यात्म क्षेत्रातील ऋषीमुनींनी जे काही म्हटले आहे आणि त्यावर काही विचारवंतानी जे काही मांडले आहे त्या सर्वाचे सार इथे मांडण्याचा प्रयत्न करीत आहे. ह्यात माझा वाटा शुन्यच.

आपली उपनिषदे म्हणतात 'हे विश्व ईश्वराने व्यापले आहे.' आज आपण सातासमुद्रापलीकडे जे काही घडते ते सारे टिव्ही चॅनेलवरून पाहतो. तिथे राहात असणार्या आपल्या नातलगाला पाहतो, त्याच्याशी बोलतो. हे सारे विज्ञान युगाचे चमत्कारच. शास्त्रज्ञांच्या कौतूकासाठी शब्द अपूरेच. तरीही हे शेवटी शोधच. संपूर्ण नवनिर्मीती तर निश्चीत नाही. कारण ह्या शोधात जी शक्ती, जी उर्जा, जे पदार्थ कामी येतात ते ह्या विश्वातीलच. ती शक्ती किंवा matter ईश्वरी स्वरूपाचेच एक दर्शन होय. आप, तेज, वायू, आकाश, आणि पृथ्वी ह्या पंचमहाभूतांच्या अनुभूतीतही तो देव आहे. तसाच तो शब्द, रस, स्पर्श, रूप, गंध ह्यामध्येही आहे. मानवाची बुध्दी कितीही प्रगल्भ असली तरी तिला मर्यादा आहेतच. ज्या,ज्या वेळी थोर शास्त्रज्ञांनी ह्या विश्वातील अनाकलनीय रहस्ये उलगडली, त्या त्या वेळेस त्यांनी भावपूर्ण उद्गार काढून ह्या विश्वाच्या रचनाकाराचे आभार मानले आहेत. म्हणून काही तत्ववेत्त्यानी म्हटले कि 'ज्ञान आणि विज्ञानाच्या परिसीमा ओलांडून जो दशांगुळे उरतो, तो देव'.

        वेदानांही नाही कळला अंतपार ज्याचा!
        कानडा राजा पंढरीचा!!
अंतपार नाही म्हणजे अनंत. अनंत हे ही देवाचे नाव. तो अनंत आहे . हेच परम सत्य. त्यातूनच ईश्वर वा देव म्हणजे सत्य. ही एक देवाची आणखीन व्याख्या झाली. मानव विज्ञानाच्या साह्याने ह्या विश्वाची गुढे उलगडीत  आहे. हे कार्य अविरतपणे करणार आणि त्याने करीतही राहिले पाहीजे. त्यातून काही गुढे गवसत जातील तसेच काही गुढे निर्माणही होत जातील. विख्यात शास्त्रज्ञ आईनस्टाईन म्हणतात ह्या विश्वात सर्वात मोठे गुढ कोणते, तर हे विश्वच होय. त्यामूळे विज्ञानाचा प्रवासही अनंत आहे. देव म्हणजे अनंत. त्या अर्थी विज्ञान म्हणजे संशोधन म्हणजेच तपस्या. त्यामुळे वैज्ञानिक म्हणजे आधूनिक ॠषी मंडळी. हेही पटते. विज्ञानाद्वारेही जे काही शोधले जात आहे, ते सत्याशिवाय दूसरे-तिसरे काही नाही. छांदोग्य उपनिषद मध्ये सत्याची छान व्याख्या दिली आहे. सत्य हा शब्द स ति आणि य ह्या तीन मात्राने बनलेला आहे. स म्हणजे अविनाशी म्हणजे ईश्वर म्हणजे कारण. ति म्हणजे नाशिवंत म्हणजे सृष्टी म्हणजे कार्य. आणि य म्हणजे ह्यांचा योग म्हणजे जुळणी य ने झाली आणि सत्य झाले. कुठल्याही प्रसंगी कारण आणि कार्य ह्यामधील संबंधांचा यथार्थ जाणणे म्हणजे सत्य.  विज्ञानाची व्याख्या ह्याहून भिन्न नाही. म्हणजे विज्ञाननिष्ठ असणे हे काही नास्तिकाचं लक्षण नव्हे. कारण देव ह्या शब्दाचा अर्थच मुळी तेज असा आहे. आणि तेजोगोलापासून हे विश्व निर्माण झाले आहे असेच विज्ञान म्हणते. विज्ञानाचा भर असतो सत्य शोधण्यावर असतो, आणि जे वैज्ञानिक पातळीवर सिद्ध होते ते सत्य. सत्याचा महिमा गाताना आर्य चाणक्य सांगतात,

       " सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तापते रवि |
        सत्येन वायवो वान्ती सर्व सत्ये प्रतिष्ठितम् ||"

"ह्या पृथ्वीचा आधार जर काही असेल तर तो सत्य हाच आहे. सत्यामुळेच सुर्य तेजस्वी झाला. सत्यामुळेच वारा वाहू शकतो. या जगात जे जे काही आहे ते ते सगळे सत्यावर अधिष्ठित आहे."

वरील व्याखेवरून असेच म्हणावेसे वाटते की सत्य शोधण्याचा प्रयत्न करणे म्हणजे विज्ञान.  म्हणजे सत्याची उपासना. विज्ञानामूळे मानवी जीवन सुकर झाले आहे. जे काही उपयोगी, सुकर तेही ईश्वर. विज्ञान ही सर्वत्र विद्यमान आहे. हे ही सत्य. वर म्हटले आहेच, 'ईश्यावास्यम इदं सर्वम्!'  ह्यावरून असे ही म्हणता येते की सर्वसामान्य भाविक मंडळी  कुठल्यातरी वस्तूला देव मानतात, ती वस्तु मुर्ती असो वा प्राणी, ती मुर्ती वा प्राणी ह्या विश्वातीलच की. इथे मुर्ती मानवाने निर्माण केली, तिला कसे देव मानता येईल असा आक्षेप पुढे येऊ शकतो, नव्हे येतोच. मग त्यावर उत्तर काय?  सामान्यतः जी काही वैज्ञानिक उपकरणे मानवाने निर्माण केली ती वैज्ञानिकांनी. पण त्यासाठी काही उपजत तंत्रज्ञ म्हणून जन्मले असतील अशांची मदत वैज्ञानिकांना झालीच नाही असे मानता येईल का? ती उपकरणे बनविण्यासाठी लागणारा कच्चा माल हा ह्या सृष्टीतलाच आहे की नाही?  जसे एखादे वैज्ञानिक उपकरणे निर्माण करताना  बुद्धी,  मेहनत, प्रयत्न, कौशल्य वा कसब ह्या सार्या गोष्टी वैज्ञानिकाचे वा तंत्रज्ञाच्या असतात तसेच मुर्ती निर्माण करण्यापाठीमागे मुर्तीकाराचे कसब, चिकाटी, बुद्धी, मेहनत इत्यादी गुण कामी येतातच ना! जसे वैज्ञानिक उपरणे मानवाला उपयोगी पडतात आणि अंततः मानवाचे श्रम वाचतात तसेच मुर्तीची पुजा-अर्चा करताना मानवाची मानसिक शक्ती अप्रत्यक्ष रित्या वृदिगंत  होत असतेच की ! हे सत्य नाकारता येते का? नाही. हेच ह्या सर्व प्रश्नांचे उत्तर. गणपती अथर्वशीर्षम् मध्ये गणक ऋषीने गणपती देवाचे वर्णन करताना म्हटले आहे, 
             ऋतं वच्मि || सत्यं वच्मि || 
ऋतं म्हणजे A fixed or settled rule, law. तर सत्य म्हणजे न बदलणारे. कारण सत्य हे पूर्ण असते. ह्यावर पुढे कधीतरी चर्चा करू. त्यातून 'जे पुर्ण आहे ते देव' ही आणखिन एक व्याख्या उपनिषदकारांनी मांडली.  

ईशोपनिषदाची प्रार्थना आहे, 
           'ओम् पूर्णमिदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते!'
ईश्वर पूर्ण आहे. ईश्वरापासून उत्पन्न झालेले हे विश्व पूर्ण आहे. पूर्णापासून पूर्ण उत्पन्न झाले तरी शेवटी पूर्णच शिल्लक राहते. मातेचे पुत्रावरील प्रेम हे नेहमी पूर्ण असते. पुत्राने प्रत्येक क्षणी या पूर्ण प्रेमातून पूर्ण प्रेमाचा उपभोग घेतला तरी मातेचे हृदय पूर्ण प्रेमाने अथांग भरलेले असते. पार्याला नियमित आकृतीचा आकार असतो. ह्यातून काही पारा वेगळा केला तरी पार्याच्या दोन्ही राशी पुन्हा त्याच आकारात दिसतात. मूळ जीवपेशीची वाढ एका पेशीच्या दोन पेशीत होते. एक संपूर्ण पेशी बाहेर पडली तरी पहिली पेशी पूर्णच राहते. असे विज्ञान सांगते. हेच सत्य अध्यात्मिक पातळीवरून मांडताना आचार्य विनोबा भावे म्हणतात "देवांना ईश्वरी विद्या जिच्यापासून मिळते त्या देवतेचे उपनिषदात नाव उमा आहे." उमा ह्याचा अर्थ ईश्वरी विद्या असा का लावतात, ह्यावर विनोबाजी म्हणतात "ओम् हा वेदान्तात ईश्वराचा अर्थ आहे. ह्या ओमची अ उ म अशी तीन पदे आहेत. उमा हा शब्दही अ उ म ही पदे वेगळ्या अनुक्रमाने (शब्दाचे रूप बदलून) घेऊन आला आहे. म्हणजे क्षणापूर्वी देवासमोर जो ओम उभा होता तो आता पुरूषाचे रूप बदलून स्त्री असे रूप झाले आहे . म्हणजे उ म अ असे होत उमा झाले."  देव हा एकच आहे असे आपण मानतो, तरी अनेक देव-देवता पुजीत असतो. ह्यापाठीमागे विज्ञानातील 'एका पुर्ण पेशीतून दुसरी पुर्ण पेशी, दुसर्यातून तिसरी अशा क्रमाने अनेक पूर्ण पेशी होतात' हा सिध्दांत आहे. त्यामुळे विविध देव-देवता, ही एकाच चैतन्याची रूपे आहेत. जसे की एकाच विद्यूत प्रवाहातून वीजेचे अनेक प्रकारची उपकरणे काम करीत असतात, जणू काही स्वतंत्र अस्तीत्व असल्यासारखी. त्यामुळे तेहतीस कोटी देवाची कल्पना हास्यास्पद वाटण्याची गरज नाही. उलट देव तेहतीस कोटीची संख्या ओलांडून फार पुढे कधीच गेलेला आहे. आज जग जवळ आले आहे असे आपण म्हणतो. का तर माहीती व तंत्रज्ञानाच्या शाखेतील अभूतपुर्व होत असलेल्या क्रान्तीमुळे. ती क्रान्ती अभूतपुर्वच. म्हणजे कालचे तंत्रज्ञान आज टाकाऊ ठरेल; उद्याचे तंत्रज्ञान परवा टाकाऊ ठरणार. वस्तुतः जुने नव्या रूपात येत असते. ह्याचाच अर्थ जग प्रसरण पावत आहे. ज्ञानाच्या कक्षा विस्तारीत होत आहेत. ज्ञान हे पूर्ण तर विज्ञान हे अपूर्ण आहे असे आपले तत्तवेत्ते म्हणतात त्यासंबंधी शंका उपस्थित करण्यात काही अर्थ आहे असे दिसत नाही.  गणक ऋषींनी अथर्वशिर्षात पुढे म्हटले आहे,
                  'त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ||' 
हा बोध देव जाणण्यासाठी निश्चितच उपयोगी आहे. ज्ञान आणि विज्ञान ह्यातील परस्पर संबंध शोधण्याचा प्रयत्न म्हणजे अध्यात्म असावे असे वाटते. आपल्या तत्तवेत्त्यांनी स्पष्टपणे म्हटले आहेच की, 
      ' सर्व देवं नमस्कारम् केशवं प्रतिगच्छती |'   
ही आपली धारणा अयोग्य ठरत नाही. म्हणजे देव जाणण्याचा प्रयत्न करीत राहणे इतकेच काय ते आपल्या हाती असते. तेच आपण ह्या लेखमालिकेतून करीत राहू या.

जय योगेश्वर! 

आपण व आपले उत्सव--मातृदिन (भाग १)

आपण व आपले उत्सव-- मातृदिन   देवीयों और सज्जनो नमस्कार ! हमारी मातृभूमी को देव-देवताओंकी भूमी माना जाता है | इसका कारन हमारे यहाँ सृष्टी हर ...