गुरुवार, १८ जुलै, २०१९

गुरूपौर्णिमा उत्सव


परसो आषाढ पौर्णिमाका दिन था | इसे व्यास पौर्णिमा तथा गुरू पौर्णिमा भी कहा जाता है | अपने देशके सभी प्रांतमे गुरूपौर्णिमा उत्सव मनाया गया |  विख्यात महाकवी कालीदासजीने कहा है कि,  उत्सव प्रियः खलू मनुष्यः|  उत्सव प्रिय होना यह मानवकी स्वाभाविक प्रवृत्ती  है | दुनियाके सभी देशोंमे अपने अपने संस्कृती, तथा धार्मिक श्रद्धाके नुसार उत्सव मनाये जाते है और स्वाभाविकतः उत्सवमें भिन्नता रहती है | लेकीन ऐसी भिन्नता होनेके बावजूद दुनियामे एक उत्सव ऐसा है जिसका तत्व सभी देशोमें समान है और वह हैं , गुरू-शिष्य परंपरा | इसिलीए साॅक्रेटीस-प्लेटो, प्लेटो-ऑरिस्टेटल, मार्क- लेलिन, इब्सेन-शाॅ, वसिष्ठ-श्रीराम, सांदिपनी- श्रीकृष्ण, याज्ञवल्क्य-जनक, जनक-शुक्रचार्य, रामकृष्णपरमहंस -विवेकानंद, रामानंद-कबीर, समर्थ रामदास-शिवाजी ऐसे महान गुरू-शिष्योंकी दुगल दुनियाके इतिहासमें मौजूद है | हमारे लिए गौरवकी बात यह है की,  'यह गुरू-शिष्य परंपरा ' का जनकत्व हिंदू संस्कृतीके पास है | ब्रिटीश कालमे अपने देशमे व्हाॅईसराय रहे लार्ड कर्झनने एक समारोहमें कहा है " जब इंगलीश लोग जंगलमें रहते थे तब भारतमे गुरूकूलके रूपमे शिक्षा व्यवस्था थी | डाॅ ॲनी बेंझट ने कहा है की,  दुनियाके सभी देशोंने हिंदू संस्कृतीको जननी समझे तो दुनियामें सहिष्णूता और भाईचारका माहोल रह सकता है | दुनियाके मशहूर इतिहास तज्ञ विल ड्युरांट कहते है की, '' मनकी विशुध्दता, परिपक्वता, और व्यापकता इन तीनों मुल्योंका संगम बनाकर सहिष्णूताका पालन कैसा करना है, यह सिर्फ भारत देश और उसकी  प्राचीन संस्कृतीसे सिखनेको मिलता है|  हिंदू संस्कृती दुनियाकी सबसे प्राचीन है यह सत्य अन्य पाश्चीमात्य तथा पौर्वात्य विचारवंतोंने मान्य किया है |
 
अब हम गुरू-शिष्य परंपराको उत्सवका स्वरूप कब आया इसपर चर्चा करेंगे | इसका उत्तर एक सवालमे छुपा हुआ है और वह सवाल है, " आषाढी पौर्णिमाको व्यास पौर्णिमा क्यो कहलाया जाता है ?" वैदिक कालमें हमारे यहाॅ गुरूकूल थे | हिंदू संस्कृतीका ज्ञान भांडार यह गुरू-शिष्य संवादोंसेही मिला है | अनेक ऋषीमुनीयोंने अपनी तपस्यासे सृष्टीमें छिपे हुये शाश्वत सिद्धांतोकी खोज कियी है, और मानव जातीको, ऋचा, स्मृती, श्रुती, आरण्यकें जैसे माध्यमोंसे ( वैदिक कालकी मिडीया) सुसंस्कृत बनाया | महर्षी व्यासने सभी ऋषियोंने रचाया हुआ ज्ञान भांडारका संकलन करके संस्कृतिका एक ज्ञानकोष दिया उसिका नाम है महाभारत | भगवान श्रीकृष्ण    गीताके विभूती योगमे कहते  है, ' मुनीनामप्यहम व्यासः |'  व्यक्तीका मोक्ष और समाजका उद्धार इन दोनों आदर्शपर व्यासमूनीने अभेद दृष्टीसे 
देखा | अभ्युदय और निःश्रेयस इन दोनोंका समन्वय करके विविध ग्रंथ रचना कियी है | मानवी जीवन ना सिर्फ प्रकाशका है, ना सिर्फ अंधकारका है | वह साया और प्रकाशका आँख-मिचौलीका एक खेल है | जो सृजन होती है वह सृष्टी है, और इस सृष्टीको सृजन करनेका दायित्व मानवजातीपर है | इस सिद्धांतका जनकत्व व्यासमूनीके  पास जाता है | इसिलीए उनको मानवी जीवनका अलौकीक भाष्यकार माना गया है | महर्षी व्यासमूनीका अध्यात्मिक और व्यावहारीक ज्ञान इतना प्रभावशाली रहा की ' व्यासोच्छिष्टम जगत ' ऐसी एक उक्ती प्रचलित हुई | मानव जन्म का प्रयोजन तथा सार्थकता किसमे है,  इसका जबाब व्यासमूनीने सिर्फ दो वचनोमें बताया दिया है | दो वचन ऐसे है-
          ' परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीडनम् | ' 

व्यासमूनीके पश्चात उनके शिष्यगणोंने सोचा की अपने गुरूके कार्यको जिंदा रखना चाहीये | तब संस्कृतीका प्रसार तथा रक्षण करनेका कोई भी अच्छा उपक्रम हो तो उसे ' व्यास ' ऐसी संज्ञा दि गयी और जिस मंचसे ऐसा कार्य होगा उस मंचको ' व्यासपीठ ' ऐसी संज्ञा दी गयी | उसी दिनसे ही महर्षी व्यासमूनीके शिष्यगणोंने अपने गुरूकी पुजा छुरू की और  कुछ धन और वस्तू समर्पित किये | तभीसे इस पौर्णिमाको व्यास पौर्णिमा और गुरूपौर्णिमा का नाम प्राप्त हुआ | धीरे धीरे  भारत देशके हर कोनेमे गुरू पौर्णिमा  एक पवित्र उत्सव मनाया जा रहा, वह आजतक छूरू है |

मानव जातीका विकास गुरू-शिष्य परंपरासे ही हुआ है, इसमे कोई दुसरी राय नही है | पहले जनरेशनसे सिखते, सिखते अपना विकास करके जीवनको उन्नत करना, यह मानवकी सहज प्रवृत्ती है | पशु-पंछी तथा और प्राणी-जीवमे गुरू-शिष्य परंपरा नही है, क्योंकी उनका जीवन सिर्फ सामूहीक है, पर मानवका जीवन सामाजिक है | आज ज्ञान-विज्ञानका इतना विस्तार हुआ है, की हर क्षेत्रमें गुरूकी जरूरत पडती है, इसिलीए गुरूपूजन उत्सवका भी विस्तार हुआ दिखता है | बदलते युगमे नई सुविधा एक असुविधाको ही साथमे लेके आती है,  यह अपना अनुभव है | इसिलीए समाज व्यवस्थामे जीवनमूल्योंकी रक्षा करनेकी लिए एक समातंर व्यवस्था बनायी गयी है, उसीका नाम है गुरू-शिष्य परंपरा है | गुरूके प्रती कृतज्ञता व्यक्त करना, यह एक कर्मकांड न हो, इसिलीए समर्पित भावको जगानेके लिए समर्पणको इस गुरूपूजनको जोड दिया है | इसिलीए  गुरू-शिष्य परंपराका स्थान मानवी जीवनमे  सबसे उँचा रहा है | गुरू सिर्फ व्यक्ती हो ऐसा नियम नही है | चराचर सृष्टीमे ईश्वर विराजमान है, इसिलीए सृष्टीमे समाये हुये चल-अचल वस्तुयोंसे भी प्रेरणा मिलती है और उनको  गुरू मानना यह भी एक स्वाभाविक प्रवृत्ती समझा जाता  है | वैसा देखा जाय तो हमारे संस्कृतीमें जो प्रतिकें है, जैसे की कलश, श्रीफळ, कमल, स्वस्तिक दीप, भगवा ध्वज, इनसे भी हमें प्रेरणा मिलती है | निसर्गको ही गुरू माननेकी हमारी संस्कृती है | नदी, वृक्ष-वेली, धरती, सागर, वायु आसमान, सूर्य, आदि पंचमहाभूतें, यह भी मानवके गुरू है | हिंदू समाजके आद्यगुरू श्री दत्तात्रेयस्वामीने निसर्गसेही चोवीस गुरूके चरण छुयें और खुद गुरूस्थानपर विराजमान हुये है | भगवान बुद्ध, भगवान वर्धमान महावीर, गुरू नानक, इन्होनें ही सृष्टीसे ही ज्ञान प्राप्त प्राप्त किया है | आज अपने देशमे अध्यात्मिक गुरूके मठ याँ आश्रममें संस्कारक्षम प्रार्थना होती है, प्रवचन होते है , प्रबोधनके अन्य कार्यक्रमका समय समय पर आयोजन होता है | इससे समाजमे आयी हुई सुस्ती मिटायी जाती है | दत्त सांप्रदाय हो याँ शाक्त सांप्रदाय हो, शीख हो याँ शिव- वैष्णव हो,  जैन हो याँ  बुद्ध हो ,  इन सभी समाजके घटक अपने अपने गुरू-शिष्य परंपराके माध्यमोंसे आजही अन्नदान, रूग्ण शुषुश्रा, दवायें, शिक्षा, रक्तदान, नेत्रदान, वृक्षारोपण, ऐसे अन्य सेवा प्रकल्प चलाते है | परोपकारका  सिधा और साधा अर्थ यह है, कि समाजके कोई भी बांधवको आपत्तीमे मदद करना है | दान और सेवा यह दो सर्वश्रेष्ठ जीवनमूल्यें है |

सेवा परमो धर्मः यह ब्रीदकी दिक्षा लेनेकी क्षमता कब बढती  है ? सामान्यतः कोई भी आदमी अगर उसपर जन्मतः अच्छे संस्कार नही हुये हो तो सहज सरलतासे अच्छा बनने लिए आगे आता नही, आदमीको अच्छा बनाना पडता है | क्योंकी त्यागकी प्रवृत्ती उपभोगता इतनी स्वाभाविक याँ प्राकृतिक नही होती है | इस बारेंमे अधिक स्पष्ट रूपसे जानना है तो गायत्री उपासक वेदमूर्ती स कृ देवधर  इनका " गायत्री मंत्र आणि उपासना " यह किताबको पढना जरूरी है | देवधरजी अपने किताबमे कहते है, की " मन शरीरमे है, लेकीन कोई शस्त्रवैद्य (सर्जन) शरीरका हर भागको फाडके देखे तो भी मन नामकी चीज शरीरमे मिलती नही है | इतना सुक्ष्म इस मनको मानवी जीव जब अर्भकावस्थामें रहता तभीसे उसपर संस्कार हो तो मन सक्षम और संस्कारशील बनता है | " इसका अर्थ यही है की मनुष्यकी शिक्षा, पढाई गर्भवास्थामे छुरू होती है | गुरूकी आवश्यकता जन्मसे पहलेही छुरू होती है और यह आवश्यकता जिंदगीके अंतिम यात्रतक रहती है | स्वामी विवेकानंद कहते है, " यदी कोई इंसान यह कह दे की,  बस हो गया ;अभी जिंदगीमे कुछ सिखनेकी जरूरत नही है |तब समझ लो की वह इंसान बुढा हो गया |" इससे यह स्पष्ट होता है की स्वामीजी हमें जिदंगीके अंतिम श्वासतक सिखते रहनेकी सलाह देते है और उसके लिए हमें गुरूके सानिध्यमे रहना ही है | वह स्वयं रामकृष्ण परमंहसके शिष्य रहे है | हमारे शास्त्रकार कहते है की गुरूके सानिध्यमें हमारा आचरणमे सुधार आता है | " आचारः प्रभवो धर्मः | " इसी तरह " आचारः प्रथमो धर्मः | " यह भी स्पष्ट रूपसे कहा है | जिसे अंतिम ध्येयसिद्धी तक पहूँचना है, उसे पहला आचरण सुधारना होगा |  साधा अर्थ है, मनको अच्छी आदतसे जोडना है | उसके लिए मनको लगाम लगानेके लिए बुद्धी का उपयोग करना है और वह काम गुरूके सहवाससे होगा | अपने आचरणको सही दिशा देनेका काम गुरू अपनेसे कराके लेता है | उसे  गुरू-शिष्य परंपरामे दिक्षा ऐसा नाम है | बादमे धीरे धीरे मनमें संयम बढता है,  संयमसे सद्भभाव निर्माण होता है और सद्वभावसे अंदरका समर्पित भाव ऊँचाईके तरफ जानेकी प्रक्रीया छुरू होती है | उसी पथपर अंतमे ' सेवाः परमो धर्म " इस ब्रीदकी अनुभूती होकर फलासक्ती बिना सामाजिक समरसताका कार्य युहीं अपने हातसे होते है | 

भगवान रामकृष्ण परमंहस अपने शिष्यगणोंके साथ बातो-बातोंमे कहते है की हमे कमल फूल जैसे खिलना चाहीये | शिष्यगण पुछते है कमलके जैसे खिलना कैसा शक्य हो जाता है ? तब परमंहसजी कहते है, " कमल रातदिन खिचडमे संघर्ष करता है | सुरजके तरफ देखके खिलनेका प्रयत्न करता है | उसकी साधना अंखड छुरू रहती है | उसमे वह खुदके खिलना भी भूल जाता है | वह फलको भूल जाता है | ठंडी, गर्मी, बारीस, खिचड इसमे रहकर संघर्ष जारी रखता है और एक दिन सुबह सुरजका प्रकाश उसे स्पर्श करता है , पवन उसे झुलाता है, वृक्षवेलीपर बैठे पंछी अपना सुर लगाते है, इसमे कमल खूद खिला है यह भी भूल जाता है | मैं खिला हूँ, मैं सुगंधसे भरा हूँ, मै आकर्षक बना हूँ, मुझमें मधूर मकरंद भरा हुआ है, यह सब भूल जाता है और अकस्मात एक भूंगा गुं गुं करके कमलके आसपास प्रदक्षिणा डालकर अंदर घुसता है, और भूंगा कमलको कहता है,  " व्वा, कमल, तेरी कमाल है, तु पवित्र है, क्या तेरा रूप है, क्या तेरा रंग, क्या सुगंध है, कितना मधूर रस है !" '  शिष्य भी कैसा हो, कमल जैसा ! निष्काम कर्मयोगी हो ! कमल जैसा ! धौम्य ऋषीके आरूणी नामके शिष्य जैसा !

मित्र हो, अपना देश वाल्मीकी, कृष्णद्वैपायन व्यास , शुक, गोतम बुद्ध, वर्धमान महावीर,  गुरूनानक,  शंकराचार्य जैसी महान गुरूओंका है, उसी तरह  नचिकेता, आरूणी, एकलव्य, अर्जून, कौत्स, विवेकानंद जैसे शिष्योंत्तमका है | शिष्योंने अच्छा शिष्य बननेका प्रयास करें और गुरूजनोंने महान गुरूवर्योंकी  वसीहतको अच्छी तरह निभानेका प्रयत्न करें, तो धिरे, धिरे, अपना देश विश्वगुरूके स्थानपर विराजमान होगा | इस विश्वासके साथ गुरू पौर्णिमा पर चली हुई इस चर्चाको मै यहाँ विराम देता हूँ |

शनिवार, ६ जुलै, २०१९

संजीवनी विद्या आणि आपण



संजीवनी ही एक विद्या आहे. शब्दशः अर्थ मृत्यु पावलेल्या माणसाला पुन्हा जिवंत करण्याची विद्या. असूरांचे गुरू शुक्राचार्य ह्या विद्येचे जनक समजले जातात. ह्यापेक्षा अधिक काही ह्या संजीवनी विद्ये संबंधी मला ठाऊक नाही. नालासोपारा (प ) येथे 'संजीवनी परिवार' नावाची एक समाजसेवी संस्था गेली अनेक वर्षे खंड न पाडता अनेक लोकोपयोगी कामें करीत आहे. आपल्या देशात शहरी, निमशहरी व ग्रामीण भागात अनेक स्वयंसेवी संघटना आहेत. अशा संस्थाच्या कार्यांत  संजीवनी विद्या आहे असे मला सतत वाटत आले आहे आणि त्यांच्या कार्यासंबंधी  व्यक्त व्हावे असे प्रकर्षाने मला जाणवत होते. संजीवनी परिवार नालासोपारा (प) ही संस्था माझ्या परिवारातील आहे, माझ्या गावातील आहे. प्रत्येक कार्यक्रमासाठी  संजीवनी परिवारातले कार्यकर्ते मला आग्रहाचे आमंत्रण देत असतात. ती संस्था येत्या रविवारी ७ जूलै ला आपल्या वृक्षरोहणाच्या मोहीमेचा चौदावा वाढदिवस साजरा करीत आहे. परिवाराचा एक आगळा वेगळा वाढदिवस. नालासोपारा (प )निर्मळ स्थित श्रीमत् आद्य शंकराचार्य मंदिराचा परिसर आज संजीवनी वनराई म्हणून ओळखला जातो. त्या निमित्ताने ब्लाॅगवर एक लेख संजीवनी विद्या नावाच्या देवतेच्या चरणी वाहावा असे वाटले म्हणून हा लेख प्रपंच.

संजीवनी म्हणजे 'मृत्युने कवटाळलेल्या माणसास जीवंत करण्याची विद्या' ही वैदिक काळातील. 'जीवदान देणारी विद्या' ही आजच्या युगातील संजीवनी. कुठले ही लोकोपयोगी कार्य आपल्या जीवनाचे  व्रत आहे असे समजून  कोणी व्यक्ती, वा संस्था खंड न पडता दरवर्षी करीत असेल तर ते कार्य 'कार्यक्रम ' म्हणून राहात नाही. त्या कार्यक्रमाचे रूपातंर मोहीमेत होत असते. त्यातही ते वृक्षारोहणाचे कार्य. हवेतील प्रदुषण दूर करून सृष्टीतील जीवनास आवश्यक असणार्या ऑक्सीजनचा साठा वाढविण्याचे कार्य. अनियमीत आणि बेभरवशाचा झालेल्या पावसाळ्याला नियमित आणण्याचे हे कार्य. पाणी म्हणजेच जीवन. शुध्द हवा आणि पाणी ह्याचा पुरवठा वाढविणे ह्या नवसंजीवनी विद्या आहेत. मागे Whatsapp वर एक पोस्ट आली होती. ती अशी आहे, " The most precious thing u can give some one is the gift of ur time and attention ." ह्या पोस्ट वरून मी सेवाभाव आणि कर्मयोग असा एक सविस्तर लेख लिहीला आहे. त्यात मी जे म्हटले आहे, ते थोडक्या शब्दात मांडतो. "वृक्षारोपण, नद्या स्वच्छ ठेवणे, संयमित जीवनशैली ठेवणे, वन्य प्राण्यांची शिकार न करणे, पशू- पक्षांच्या स्वैर विहारावर प्रतिबंद न लावणे, इत्यादी कार्ये म्हणजे निसर्गाप्रती वाहलेली कृतज्ञता होय. एका परिने आपण आपल्या धरणीमातेला दिलेली Precious gift of time and attention होय." धरणीमातेच्या उपकाराची परतफेड करण्याचे आपल्याला जमत नसेल तर ते ही एक वेळ चालू शकते पण निसर्गाची हानी का करावी? निसर्गाने निर्माण केलेले आपले मन निसर्गाच्या परिसरात अत्यंत प्रभावी बनते त्यामूळे ते स्थिर होते. स्थिर मनाची शक्ती अवाढव्य असते. ऋषीमूनी, तत्ववेत्ते, शास्त्रज्ञ, साहित्यिक  इत्यादींनी शाश्वत सत्ये शोधली, महाकाव्ये लिहीली ती निसर्गाच्या सानिध्यात राहूनच.  ह्या मंडळींचे मानव जातीवर अनंत उपकार आहेत.
आपल्या विज्ञान निबंधात स्वातंत्र्यवीर सावरकरांनी तर निसर्गाला देवाची उमपा  दिली आहे. गायित्री उपासक स. कृ. देवधर म्हणतात, "उपजे तें नाशे  हे विश्वाचे जीवनसूत्र असले तरी अविनाशी अवस्थेशी एकरूपता साधण्यामध्ये मानवी जीवनाचा खरा परमोच्च बिंदू आहे. निसर्ग हा प्राणीमात्रांचा मित्र आहे. मानवाखेरीज इतर पशू पक्षी सर्वस्वी निसर्गाच्या सानिध्यात राहातात त्यामूळे त्यांच्यात निरोगिता अधिक असते. निसर्गाच्या विरूध्द जाऊन मनुष्य जेव्हा जगण्याचा प्रयत्न करतो तेव्हा त्याचे मन दुबळे बनते."  शरीर विज्ञानाचेही असेच मत आहे. वस्तूतः निसर्गामध्ये प्राणीजीवन समतोल राखण्याचे उपजत सामर्थ्य आहे. आपणच नाही तिथे आपले नाक खुपसले आहे.

विख्यात विचारवंत बर्टाड रसेलने एका ठिकाणी म्हटले आहे, "मानवाचा मुलभूत विकास झाल्याशिवाय वैज्ञानिक प्रगती त्याच्या पचनी पडणार नाही." आपले महात्मा गांधीजी म्हणत असत की "आपली धरणीमाता आपल्या सर्वांच्या गरजा भागवू शकते पण आपली लालसा नव्हे." आज प्रदुषणाचा भस्मासूर जगाला विळखा घालत असताना दिसतो. हे आपणहून आणलेले आपले मरण होय. अशा वेळी स्वयंसेवी संघटना जे काही कार्य करीत आहेत त्या सार्या एका परिने संजीवनी विद्याच आहेत.  देवाची व्याख्या अनंत आहे, कारण तो चराचरात व्यापलेला आहे. जे चांगले, जे हितकारक, जे कल्याणप्रद, ते सारे देव असे आपण म्हणतो. त्या अर्थाने ' जीवदानाची ' ही संजीवनी विद्या सुद्धा चराचरात सामावलेली आहे. भगवंताने गीतेत म्हटले आहे (' ईश्वरः सर्व भूतानां हृदेशेऽर्जन तिष्ठती | ') सर्व प्राणीमात्रांच्या हृदयात मी स्थिर असतो. त्या अर्थी जीवदानाच्या विद्या आपल्यातही आहेत. जी व्यक्ती,   संस्था, समाज,  देश जाणीवपुर्वक ती शोधेल त्यांना हि विद्या गवसणार. शेवटी मानवाने जी प्रगती केली त्यासंबंधीचा इतिहास आपल्याला ह्या पेक्षा वेगळे काही सांगत नाही. जे काही विज्ञानाने शोधले ते ह्या विश्वातीलच ना ! पण बर्टाड रसेल ह्यांनी दिलेला धोक्याचा इशारावर आपण दुर्लक्ष केले. आपण निसर्गाला ओरबाडले. Global Warming ची चर्चा सुरू झाली आहे खरी पण चंगळवाद, ऐशबाजी, शस्त्रात्रे आणि साम्राज्यवादाची भूक शमलेली दिसतेय कुठे? त्यामूळे जीवदाना संबंधीच्या नाना तर्हेच्या विद्यांचा प्रसार करण्यासाठी स्वयंसेवी संघटना आज पुढे येत आहेत. ही एक केवळ समाधानाची बाब नसून ती आजच्या युगातील मानवाकडे असलेली सर्वात महत्वाची शक्ती आहे असे मला वाटते.

स्वयंसेवी संघटनामुळेच आजच्या युगात विभिन्न संजीवनी विद्यांची आपल्याला ओळख होऊ लागली, आणि ती केवळ वृक्षरोपणापुरता सिमीत नाही. शिक्षणाचा प्रसार सर्वत्र झाला आहे; सर्वत्र संशोधन, तत्रंज्ञानात अपूर्व क्रान्ती होत असलेली आपण पाहातो. पण जोडीला महासंहारक शस्त्रेही तयार होत आहेत.  मुल्याधिष्ठीत शिक्षणाकडे दुर्लक्ष होत आहे. मानव म्हणजे पशूत्व आणि देवत्व ह्यामधील जीवप्राणी आहे. आपल्या ठायी केवळ पाशवी शक्तीच विराजमान आहेत असे नाही. दैवी शक्ती ही आपल्यापाशी आहेत. त्याचेंच प्रगट रूप म्हणजे संजीवनी विद्या. त्यातील वृक्षरोपणासंबंधी आपण चर्चा वरती केली आहे. ते कार्य महान आहे तरी लेखाच्या विस्तार भिती मूळे आपण थोडक्यात चर्चा मांडली आहे. आता आणखिन काही संजीवनी विद्यांची थोडक्यात ओळख करून घेऊ या. थोडक्यात अशासाठी म्हणतो, की ह्या संजीवनी विद्यांचा आवाका इतका मोठा आहे की ह्यातील प्रत्येक विद्येवर पुस्तक होऊ शकते. त्यातही विज्ञानामूळे एक नवीन सुविधा येते ती सोबत एका असूविधेला घेऊन येते. त्या असुविधेतून सूटका करून घेण्यासाठी नवी संजीवनी विद्या शोधावी लागते आणि उपलब्ध ही होणार.  कारण आजही ह्या जगात सज्जन शक्ती कार्यरत आहे. अतः संजीवनी विद्यावर आपली चर्चा अधून मधून होत राहणार असेच दिसते.

अलिकडे स्वयंसेवी संघटनांमार्फत नेत्रदान, अवयव दान, देहदानाची चळवळ हाती घेतली जात आहे त्या चळवळीला प्रतिसाद मिळू लागला आहे.  अवयवदानातून एखाद्या रूग्णाचे आयुर्मान वाढते, दृष्टी मिळते ही एक आधूनिक नवसंजीवनी विद्याच आहे. वैद्यकीय क्षेत्रात होणार्या नव्या शोधांचे कौतूक सर्वत्र होत असते आणि व्हावयला हवेच, त्याच वेळी स्वयंसेवी संघटना जीवापाड मेहनत घेऊन ही चळवळ राबवित आहेत त्या संघटना ही एक प्रकारे डाॅक्टरांप्रमाणे आधूनिक शुक्राचार्य आहेत असेच मानणे उचीत ठरते.

आज अनेक स्वयंसेवी संघटना वाचन संस्कृती वाढवित आहेत. कोणी घरोदारी पुस्तके, तर कोणी फिरते वाचनालय, कुठे पुस्तकाचे गाव असे कार्यक्रम राबवितांना दिसतात. कोणी फिरता दवाखाना चालवितात तर कोणी विज्ञान कार्यशाळांचे आयोजन करतात. संजीवनी परिवार संस्था सुध्दा आपल्या स्थापनेपासून विद्यार्थ्यांमध्यें वाचनाची गोडी निर्माण करण्याचे कार्यक्रम राबवित आहे. वाढदिवस, विवाह, सत्कार, निवृत्ती इत्यादी समारोहात पुस्तके भेंट देण्याची मोहीम राबवीत आहे. वाचाल तर वाचाल असे म्हटले जाते ते काही खोटे नाही. 'वाचाल तर वाचाल ' ह्या उक्तीचा सोपा अर्थ साक्षर होणे. आजच्या जगात साक्षर नसणे म्हणजे जीवन जगत असतानाच मृतवत होण्यासारखी स्थिती होय. त्यातही नवीन तंत्रज्ञान शिकणे ही अपरिहार्य आहे. पण त्या तंत्रज्ञानामूळे आपण यांत्रीक तोता बनू नये अशी काळजी ही घ्यावी लागते. वाचण्याची गोडी वाढविणे म्हणजे एक प्रकारे जीवदानच की. क्रिकेट खेळात एखाद्या फलंदाजाचा झेल प्रतिपक्षाच्या खेळाडूने सोडला तर त्याला जीवदान मिळाले असे म्हणतात. पण त्याचबरोबर ज्याने झेल सोडला त्या खेळाडूला मरणप्राय यातना होत असतात.  का तर तो ज्या संघाकडून खेळतो, त्या संघाचे लाखो समर्थक नुसती टिका करून थांबत नाहीत तर शिव्यांची लाखोली वाहतात. मग त्याने काय करावे? काही तरी धीर देणारे लेखन वाचावे. काही तरी संगीत ऐकावे. प्रापंचिक जीवनात अनेक दुखाःच्या प्रसंगांना सामोरे जावयास लागते, ज्यामूळे मनुष्य बेजार होतो. निराश होतो. आपण पराभूत झालो आहे, ही भावना सतत मनात घर करून बसते. सोबत  ' लोक काय म्हणतील ' हे भूत आपल्या मनगूटीवर बसलेले असते. श्रीमंत व सर्व प्रकारच्या आधूनिक सुखसोयीने जगणार्यानांही नैराश्य येत असतेच की. उलट त्यांना तर जीवनच नकोसे होते अशी स्थिती निर्माण होते. आज उच्चभ्रू वस्तीतही आत्महत्येचे प्रमाण वाढत असलेले दिसते. एखाद्या कवीला ' जगण्यातही मरण भासते ' अशी कविता सुचू शकेल असे आजच्या कुटुंब व्यवस्थेची स्थिती आहे. नैराश्याच्या गर्तेत आपण जाणार असे भासताच आपल्याला आवडणारे पुस्तक वाचावयास घेतले की सारा तणाव दूर होतो. अनेक पुस्तके असतात ज्यातून आपली पराभूत वृत्तीतून सुटका होत असते. म्हणजे एक प्रकारे जीवदान नव्हे काय ? ही चर्चा फक्त क्रिकेट खेळातल्या झेल सोडणार्या खेळाडूच्या मनस्थिती पुरता मर्यादित नाही. व्यक्ती तितक्या प्रकृती असे आपण म्हणतो, त्याच आधारे ' व्यक्ती तितकी साहित्याची रूची ' असे मानावयास हरकत नाही. साहित्याचे प्रकार अनेक आहेत ; त्यात साहित्यीकांची शैली वेगळी ; ज्याला जे आवडेल ते वाचावयास मिळते. म्हणजेच आनंद मिळतो. ' मन करा रे प्रसन्न सर्व सिध्दि कारण' असे तुकाराम महाराजाने म्हटले आहे. तुकाराम महाराजांची ही उक्ती अभंग नावाच्या साहित्य प्रकारातच मोडते. आनंदी मन म्हणजे निरोगी शरीर हे तर सर्वश्रूत सुत्र आहे. कारण आयुर्वेद असो वा ॲलोपथी, होमीयोपोथी वा नेचर क्युअर, सर्वांनी मांडलेले ते तत्व होय. कधी कधी मला वाटते की वाचन ही एक फक्त शारिरीक क्रिया नाही. वाचन सुध्दा एक प्रकारचा योगाभ्यास असावा. वाचणे हे क्रियापद 'वाचा' ह्यावरून झाले असावे का ? मला त्याबाबत ठोस उत्तर देता नाही पण आपल्याला चार प्रकारच्या वाचा (वाणी) आहेत असे वेदमूर्ती स कृ देवधरांनी त्यांच्या गायत्री उपासना नावाच्या पुस्तकात म्हटले आहे. जी जिभेच्या आघातातून उत्पन्न होते ती वैश्वरी; मध्यमा ही कंठात असते; पश्यन्ति हृदयाजवळ असते आणि परा ही अतिशय सुक्ष्म असते. वरील तिन्ही वाण्यांचे उत्पत्तीस्थान नाभी मध्ये असते. आपण जेव्हा वाचतो, म्हणजे एक प्रकारे आपण बोलत असतो. आपला मेंदू तात्काळ आपल्या कानांना आपले बोलणे ऐकावयाची आज्ञा देत असावा. एक अर्थी आपण बोलतो तेव्हा प्रथम आपणच ऐकत असतो. त्यामूळे आपल्यात संयम बळावत जातो. सततच्या वाचनाने उच्च पातळीवरचा संयम आपल्या अंगी बळावतो. त्यामूळे आपण दुसर्यांचे विचार शांतपणे ऐकून घेतो. त्यातून आपला विचार प्रगल्भ होतो. विचार प्रगल्भ झाला की विवेक सुचतो. विवेकांतून सन्मार्ग दिसतो. सन्मार्गावर होणारे कर्म  सत्कृत्यच ठरते. त्यातून मिळालेले यश व समाधान हाच तो मोक्ष असावा. 

अलीकडच्या काळात पुस्तके वाचणे हा फक्त कला शाखेतील विद्यार्थ्यांचा व प्राध्यापक वा प्रवचनकारांचा प्रांत आहे अशी खूळी समजूत रूढ झाली. साहित्य ही कलाकृती आहे. मानवाची वैज्ञानिक क्षेत्रातील वाटचाल सुद्धा शब्दात बांधावी लागतेच ना ! विख्यात शास्त्रज्ञ आईनस्टाईन म्हणतात Imaginatio is more important than knowledge. साहित्य हे कल्पनेने व सत्याने भरलेला खजिना आहे. त्याची ओढ लागणे आवश्यकच आहे.  कारण ती ही अनादि काळापासून मानवाला तारून ठेवणारी संजीवनी विद्या आहे. 

अनेक स्वयंसेवी संघटना दर वर्षी केंद्रिय अर्थसंकल्प झाला की, त्यावर चर्चा, प्रश्नोत्तरे असा कार्यक्रम राबवित असतात. त्या कार्यक्रमासाठी एखाद्या अर्थशास्त्रातील तज्ञाचे सहाय्य घेऊन जनसामान्यांना मार्गदर्शन होत असते. त्या अर्थसंकल्पात जनसामान्यांच्या जीवनावर अनेक दूरगामी परीणाम करणार्या तरतूदी असतात. त्या जनसामान्यांना जर समजल्याच नाहीत, तर त्यांना मिळणारे अर्थ सहाय्य दुसरेच कोणी लाटतील. म्हणजे आर्थिक निरक्षरता एक प्रकारे जीवावरच बेतते की नाही ? दुसरे असे की आपले प्रतिनिधी सरकारमध्ये बसले आहेत ते आपल्यासाठी काय करणार आहेत ते नागरिक म्हणून कळणे आवश्यकच आहे. पण त्यासाठी नागरिकांना अर्थ संकल्पासंबंधी जुजबी ज्ञान असणे गरजेचे आहे आणि ती गरज ही स्वयंसेवी संस्था भागवित असतात.  माझ्या ब्लाॅगवर ' आपला अर्थसंकल्प व आपण ' ह्या शिर्षकाचा लेख आहे, त्यात आर्थिक साक्षरतेची कशी नितांत गरज आहे हे मी मांडले आहे. म्हणून ह्यासंबंधी अधिक काही मांडत नाही.  संजीवनी परिवार हा कार्यक्रम दरवर्षी न चूकता राबवत आहे.

संजीवनी परिवार मेडीकल चेकअप चे कार्यक्रम आयोजीत करत असते. गरीब रूग्णाला आर्थिक मदत ही पुरविते. ही मोहीम तर प्रत्यक्ष जीव वाचविण्याचीच आहे, ह्यावर अधिक चर्चा करण्याची गरज नाही. दर वर्षी मेडीकल चेकअपचा अस कार्यक्रम घेणे हे सोपे नसते. त्यातही पुष्कळदा मेडीकल चेकअपच्या बाबतीत समाजबांधव  हेडसाळपणा करीत असतात. त्यांना नियमित मेडीकल चेकअपच्या कार्यक्रमाची सवय लावणे हे ही संजीवनी विद्येचाच भाग आहेच की.

ज्ञान-विज्ञानाच्या कक्षा विस्तारत आहे. तंत्रज्ञानातील अपूर्व क्रान्तीमूळे जग जवळ आले असे आपण म्हणत असलो तरी मूलतः जग प्रसरण पावत आहे. त्यामूळे मानवी जीवनाच्या कक्षा वाढल्या आहेत. त्यामूळे प्रत्येक क्षेत्रातील तज्ञ मंडळीकडून समाजबांधवाना मार्गदर्शन मिळणे आवश्यक ठरले आहे. जग पुढे जात असेल तर आपला समाज का मागे राहावा. गती हा आजच्या काळातला मंत्र आहे. थाबंला तो संपला म्हणजे जीवन जगताना पदोपदी अडथळे येणार. त्यातून मार्ग काढणे म्हणजे व्याख्यानाचा कार्यक्रम राबविणे होय. अनेक स्वयंसेवी संघटना विशेषतः उन्हाळ्याच्या सुटीत असे कार्यक्रम आखतात. त्यात वक्ता प्रशिक्षण, नेतृत्व प्रशिक्षण, नृत्य, अभिनय, संस्कार, विविध कला, कोरीव कामें, व्यवसाय, लघु उद्योग इत्यादी विषयावर मार्गदर्शन मिळत असते.  विद्यार्थ्यांना सूट्टी असते, मग पालकांना ही उसंत मिळते. त्यामूळे विद्यार्थ्यांसोबत पालकही अशा प्रबोधनपर कार्यक्रमांना उपस्थित राहतात. म्हणजे समाज जागरणाचा यज्ञच पार पाडत असतात.

प्राचीन काळातले आपण यज्ञ पाहीले नाहीत. त्या काळातही यज्ञाचे प्रयोजन हवा शुद्धीकरण, प्रजेचे रक्षण व विकाससाठी होतेच. शिवाय ज्ञानाचा प्रसार व दानधर्मही होता. आजच्या काळात व्याख्यानें म्हणजे ज्ञानयज्ञ. त्यातून  अनेक संजीवनी विद्याची खैरात होत राहणार आहे. त्यात काळानूसार, वर्षालागी बदल होणार, सोबत वाढ ही होत राहणार आहे. पुष्कळदा अशा छोट्या छोट्या अभियानाचे, जागरणाचे महत्व लक्षात येत नसते कारण अशा स्वयंसेवी संस्था प्रसिद्धीच्या मागे लागत नाहीत.  रात्रीच्या प्रशांत समयी दंव पडत असतांना त्यांचा यत्किंचित आवाज कोणाला ऐकू येत नाही परंतु सकाळी उठून पहावें तो त्या दंवाच्या थेंबांनी सर्व फुले प्रफुल्ल आणि विकसित झालेली आढळून येतात. स्वयंसेवी संघटनाचे कार्यही असेच गाजावाजा न होतां अत्यंत शांतपणे होत असते.

आजच्या घडीला सर्वांना ज्ञात असलेले बाबा आमटेंचे आनंदवन, सिंधूताई सकपाळांचे अनाथालय, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवाराचे  ग्रामीण भागात असणारे विविध आश्रम, सेवा प्रकल्प, संघ परिवारातील डाॅ. कुकडेंचे हाॅस्पीटल, भटक्या व विमूक्त जातींना स्थैर्य देणारे गिरीश प्रभूणे, व्यसन मूक्ताचा प्रचार करणारे डाॅ अभय बंग, नानाजी देशमूख ह्याचां चित्रकूट मधोल प्रकल्प , स्वाध्याय परिवार, दत्त संप्रदायातील सर्व सद्गुरूचे सेवा प्रकल्प ह्या सार्या संस्था संजीवनी विद्याचे आजची विद्यापीठे आहेत. ह्या विद्यापिठा कडून प्रेरणा घेत गावागावात पावसाचे पाणी अडवून शिवारं तयार करणारी मंडळे, शेती क्षेत्रात नवे प्रयोग करून यशस्वी होणारे शेतकरी, स्वच्छतेचं गाव, स्वावलंबी गाव, असे नावारूपास येणारी मंडळे, ही सारी संजीवनी विद्याचा प्रसार करणारे केंद्र आहेत,  शाळा आहेत. उद्योगक्षेत्र, सेवा क्षेत्र, व्यापार क्षेत्र, दळणवळण, खनिजे, अन्न प्रक्रीया, औषधे, खतें, उर्जा, इलेक्ट्रानिक्स, माहीती व तंत्रज्ञान, पाककृती, नृत्य,  नाटके, सिनेमा जगत, संगीत, मिडीया, क्रिडा इत्यादी क्षेत्रात अकंलकीत रित्या टिकून राहण्यासाठी आधूनिक संजीवनी विद्यांचे केंद्र (स्वयंसेवी संघटना) असंख्य आहेत. आणि संख्या ही वाढत राहणार. त्यामूळे अधून मधून ह्या विषयावर व्यक्त होत राहणे, परस्पर संवाद साधणे, हे आलेच. त्यातून आपली आंतरिक शक्ती तजेल राहील व  संजीवनी विद्यांचा प्रसार करणार्यांचे बळ वाढत राहील. म्हणजे हे विश्व अस्तित्वात आहे तोपर्यंत आधूनिक काळातील संजीवनी विद्याचा अभ्यास आपल्या हाती विविध स्वयंसेवी संघटना देत राहणार. ह्याबद्दल त्यांचे कौतूक करण्यासाठी शब्द अपूरे पडतात. देशमुख आणि कंपनी पब्लिशर्स प्रा लि, पुणे ने प्रकाशित केलेले एक पुस्तक आहे, ज्याचे नाव आहे, वि स खांडेकर विचारधारा, संपादक  वि वा शिरवाडकर . त्यातील प्रस्तावनेत ज्ञानपीठ विजेते वि वा शिरवाडकरांनी, ज्ञानपीठ विजेते वि स खांडेकरांच्या प्रस्तावनादी लेखनातील जीवनविषयक विचार काय होता ह्या विषयी जे काही म्हटले आहे, त्यानेच या लेखाची समाप्ती करीत आहे. 

" यंत्र हे आजच्या युगात सर्वव्यापी आहे आणि असणार. पण या यंत्रयात्रेत माणसाने आपला आत्मा गमावला. ऐहिक प्रगतीच्या झंझेत नैतिक निष्ठा जर उन्मळून पडल्या, तर ती प्रगती, प्रगती राहणार नाही. अधोगतीकडे म्हणजे सर्वनाशाकडे जाणारा तो राजरस्ता ठरेल. यांत्रिकेमुळे पराक्रम वाढला त्याप्रमाणे सुखसोयी वाढल्या. शारीरिक आणि मानसिक सुखपभोगाच्या जागा शतगुणित झाल्या. अशा परिस्थितीत सर्वसाधारण माणसाचा ' ययाती ' होणे संभवनीय असते. हे माणसाचे ययातीकरण आज देशात आणि जगात मोठ्या प्रमाणावर होत आहे. ही खांडेकरांची खंत आहे. ' सुखाचा शोध ' हे तर माणसाच्या जीवनाचे आद्य उद्दिष्ट आहे. तो शोध घेण्यात , ते मिळविण्यात काहीही गैर नाही. पण हे सुख पावसाच्या पाण्यासारखे निर्मळ, अकलंकित असावे, ते गटारीच्या डबक्यासारखे अस्वच्छ, आंधळी वासना, अत्याचार, निर्दयता, आक्रमक स्वार्थ इत्यादींनी दूषित झालेले नसावे, हे खांडेकरांनी ययाती आणि अन्यत्रही वारंवार सांगितले आहे. मग या काळोखाच्या समुद्राला प्रकाशाचे किनारे कोठेच नसतात का ? असतात. ते असतात म्हणूनच माणसाची जात धरतीवरून अद्याप नष्ट झालेली नाही ; अथवा होणारही नाही. हजारो-लाखो ययाती निर्माण होतात ; पण या ययातीच्या जमावातूनच एखादा कचही निर्माण होतो. शतका-शतकातून निर्माण होणारे हे कचच माणसाचे, मानवी संस्कृतीचे, त्याच्या भौतिक, अध्यात्मिक विकासाचे प्रवर्तक आणि राखणदार असतात."

रविवार, ३० जून, २०१९

शिवराज्याभिषेक दिन पर्वपर भाग २



शिवाजी महाराजका सुशासन 

दुनियामें कोई भी समाज हो, और दुनियाके कोई कोनोंमे  निवास करनेवाला हो, सामाजिक स्थिती राज्यव्यवस्थापर नही, बल्की राजनीतीके उपर अधिकतम निर्भर रहती है | आज दुनियामे जितनी राज्यप्रणाली अस्तित्वमें है, चाहे वह राजेशाही हो, एक पक्षीय साम्यवादी हो, याँ लोकशाही हो, इन सभीमें शासन नामकी व्यवस्था तो रहती ही है | सत्तापर विराजमान कौन है, यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात 
है | इसिलीये वैदिक कालसे हमारे यहाँ दो वचन कहा गये है, वह इस प्रकार है -- 

' यथा राजा तथा प्रजा |' और   'राजा कालस्य कारणम् |'

सुसंस्कार लेकर तैयार हुये नेताओंके पास सत्ता आती है, तो प्रजा सुखी रहती है | शासन को कब सुशासन कहा जा सकते है, इसकी कुछ कसौटीयाँ रहती है |और वह कसौटियाँ समय बदल गया तो भी उनमेंसे एक भी बदलती नही हैं | इसका कारन यह है की वह शाश्वत सिद्धांत है | पहले उनपर सिध्दांतपर चर्चा करेगे ताकी शिवशाही यह एक सुशासनका ऐताहासिक उदाहरण है, इस सत्यतक हम पहूँच सके | 

१)ऐसा राज जहाँ प्रजाके हितको अधिक प्राधान्य दिया जाता है | इसका अर्थ यहीं है की राजा याँ सत्ताधारी प्रमूख याँ राजनैतिक दल वास्तवमे सत्ताके विश्वस्त है, इस भावनासे काम करें, राज चलायें, तो राजमें कभी बेबनाव बननेकी स्थिती आती नही | 

२) ऐसा राज जहाँ सज्जनोंका गौरव और दुर्जनोंके कूकर्मोंके प्रती  शासन का कडा रव्वैया है | 

३) किसान और सेनादलकी आर्थिक स्थिती अच्छी हो तो वह समाज सुरक्षित भी रहता है और शेतमालका उत्पन्न भी अधिक होता है | अन्न, और सुरक्षा यह दोन प्रमूख जरूरतेंके बारेमें समाज निश्चीन्त होता है तब वह समाज  बौद्धिक, शारिरीक , मानसिक, औद्योगिक, एवं सामरिक दृष्टीसे बलवान बननेकी क्षमता प्राप्त करता है | 

४) महिला, संतजन, विद्वान, ज्ञानी  के प्रती शासकके मनमे आदर होता है तब  समाजकी सृजनशिलता बढती है, वैचारिक उचांई भी बढती है |

५) सत्ताधारी, तथा सरकारी अधिकारियोंकी नितीमत्ता अच्छी है तो समाजके सुख और आनंदमे बाधा उत्पन्न नही होती है | जब समाज सुखी और आनंदी है, तब राज्यव्यस्था स्थिर रहती है और जब राज्यव्यवस्था स्थिर होती है तो समाज प्रगतपथपर चलने लगता है | 

शिवाजी महाराजका शासन काल उनके  राज्याभिषेक के बाद ही छुरू होता है | राज्याभिषेक के तुरन्त शिवाजी महाराजने राज्यव्यस्थामे बदल किया | राज्यके कोषको भार पडनेवाली वतनदार, सरंजमशाही नष्ट की गयी | उसके बदलेंमे शहीद हुये सैनिकोंके परिवारको तनखा देना सुरू किया | अपने राजमहलमे अष्टप्रधान मंडल बनाया, जिससे राज्यका कारोबार जनताभिमुख रहें | वेदकालीन राजधर्मका पालन भी इसी तरहका रहता था | वैदिक कालमे हमारे यहाँ ग्रामपंचायत राज गणतंत्रसे चलता था | ऋग्वेदमें एक ऋचा है जिसमे कहा है की, ' हे राजन आप इस राष्ट्रका स्वामी हो इसिलीए आपको हमने चूनाया है | 'अथर्ववेदमें सभा, समिती जैसे शासन चलानेकी तंत्र का जिक्र किया हुआ  है | वैदिक कालसे चली आयी राज्यव्यवस्थाकी पुनर्स्थापना का छत्रपती शिवाजी महाराजको ही श्रेय जाता है | पाठकोंको विनंती है की भगवानकी आरती करनेके बाद जो मंत्रपुष्पांजली स्त्रोत्र हम गाते है, वह एक वैदिक कालकी प्रार्थना है जिसमें भगवानसे राज्यशासनकी मांग की है | उस प्रार्थनामे आदर्श राज्यव्यवस्थाके बारेंमे जो वर्णन है वह शिवाजी महाराजके सुशासनसे मिला जूला है, इसिलीए छत्रपती शिवाजी महाराज जनसामान्योंके दैवत बने | 

सुलतानशाही, आदिलशाही, निजामशाहीमे भ्रष्टाचार, मुफ्तमें खानेकी, ऐष करनेकी आदत प्रशासनमे बढी थी | उसमे सुधार लानेकी कवायत करनेमे शिवाजी महाराजने थोडीसी भी देरी नही की | राज्याभिषेक बाद सभी अधिकारीओंको "अपनी आदत बदलो  याँ  कुकर्मकी जबर शिक्षाके लिए तयार रहो " ऐसा कडक इशारा 
दिया | प्रशासकीय कामकाजमे एक नया शब्दकोश बनाया, जिसमे संस्कृत प्रचूर मराठी शब्द तथा हिंदी शब्द आये | उर्दू तथा यवनोंके भाषाके शब्द को हटाया गया | एक नया शक सनावलीका भी प्रारंभ किया | सामान्यजनोमें सोया हुआ अभिमान जाग उठा और स्वत्व, स्वराज, स्वधर्म, स्वभाषा का बोलबाला छुरू 
हुआ | मेरा मानना है की मानसशास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार देखे, तो समाजमे एकता तब बनती है जब समाज बांधवके अन्दर धार्मिक उत्सव मनानेका तरीके भिन्न हो पर तत्व समान है इस बातपर, उनका राजा या सत्ताधारी (चाहे वो कौनसी भी राज्यप्रणाली हो,) ज्यादा ध्यान देता है | शिवाजी महाराजने वही किया, जिससे उनके शासन कालमे, समाजमे भाईचारा बढा था, और प्रशासन तथा समाजकी कार्यशक्ती उंचाई के स्तरपर पहूंची थी | अपने ही समाजके शाक्त पंथीयोकों समाजके मुख्य धारामे लानेके लिए शिवाजी महाराजने राज्याभिषेक होनेके बाद बारह दिनपर शाक्त पंथसे रिती रिवाजके अनुसार फिर राज्याभिषेक करवाया | शाक्त पंथ स्वराजमे सम्मेलीत होनेके बाद स्वराजकी सामरिक शक्तीमे वृंद्धी हुई |

प्रशासनकी एक अजब महत्ती है, यदी इसमे नरमाई, ऐषआरामी आ गयी तो समाज गहरी नींदमे जानेका खतरा निर्माण होता है, और राज्यके प्रशासनमे उत्साह, चैतन्य है तो समाजमे एक नई ऊर्जा उत्पन्न होती है | इन दो सिध्दांतको शिवाजी महाराज भलीभाँती जानते थे | जब समाजकी कार्यक्षमता तथा प्रामाणिकता बढती है तो हर क्षेत्रमें समाज तथा देश विकास के राहपर निकल पडता है और तभी तो राष्ट्र बलवान होता है | शिवकालीन प्रशासन के अभ्यासक  छत्रपती शिवाजी महाराजको महान योद्धा तो मानते ही थै, इससे अलावा वह सारे अभ्यासक शिवाजी महाराजको एक कुशल प्रशासक तथा व्यवस्थापन शास्त्रके एक अदभूत गुरू भी मानते है |

जब सुशासनकी बात आती है तो भारत जैसे  कृषीप्रधान देशमे किसानोंकी स्थिती कैसी है, यह अहम बात मानी जाती है, और  इसपर चर्चा होना स्वाभाविक है | जिसे हम आदर्श राजा मानते है ऐसे शिवाजी महाराजका ध्यान किसान वर्गकी परेशानी पर नही जाता तो आश्चर्यकी बात बनती |  शिवाजी महाराज जितने पराक्रमी थी उतनेही  किसान, छोटा-मोटा व्यापारी, कारागिर, मजदूर, ऐसे मेहनत करनेवाले सामान्यजन गरीबीसे त्रस्त देखके वह भावूक भी होते थे | समाजबांधवके प्रती वह संवेदनशील थे | मेरे पढनेमे आया की कभी कभी शिवाजी महाराजका मन बैरागी वृतीसे भी भर जाता था | संतजनोके कार्यसे वह प्रभावीत होते थे | उनकी विरक्ती देखकर जीजाऊ  चिंतीत भी होती थी और एक दिन शिवाजीको बोली " शिवबा, एक बार संत तुकाराम महाराजका किर्तन सूनकर उनका आशिर्वाद ले लिजीये | " अपनी माँ की आज्ञाको पालन करनेके लिए  शिवाजी निकल पडे तुकाराम महाराजके दर्शन करनेके लिए | शिवबामें अपने कर्तव्यके प्रती वैराग्य उत्पन्न न हो ऐसी जिजाऊ की इच्छा थी | आखिर जब तुकाराम महाराजसे शिवाजी मिलते है, तब उन्होंने शिवाजीको सलाह दि की, "मै आपके कुछ कामका नही हूँ, आप समर्थ रामदासके पास जाओ, क्यों की समाजको इस समय आपकी जरूरत है |" आखिर शिवाजी महाराज समर्थ रामदासके शिष्य बने | संत तुकाराम महाराजकी सलाह और जीजामाताकी चिंता व्यर्थ नही गयी| अपने देशके प्राचीन युगमें राजा दशरथको वसिष्ठ, पांडवोको श्रीकृष्ण, चंद्रगुप्तको चाणक्य ऐसे सलाह देनेवाले गुरू थे | यह ऐताहासिक सत्य शिवाजी महाराज भलीभाँती जानते 
थे | उनका साधू-संतोसे सलाह लेना, उनको नमन करना यह आजके राजनेताओं जैसा नाटक नही था | स्वधर्म, स्वजन स्वभाषा, देवी-देवताओकी मंदिरका और माँ-बहनोंकी इज्जतकी रक्षा करनेके लिये शिवाजी महाराजने स्वराज्यका निर्माण किया था | राजा बनकर आदर, मान, संपत्ती पानेकी लालसा शिवाजीके मनको कभी स्पर्श नही कर पायी, कारन जीजामाताके संस्कार जो उनपर हुये थे | कल्याणके सुभेदारको पराजीत करनेके बाद उसके बहनका कब्जा लेकर शिवाजीकी सैनिक जब दरबारमे आये तब शिवाजी महाराजके 'यदि इतनी सुदंर हमारी माता होती ' यह उद्गार नारीकी सर्वोच्च पावन मनसे कियी हुई पूजा है | शिवाजी महाराजने कल्याणके सुभेदारके बहनको सन्मानसे वापस भेज दिया | इसे कहते है ' हिंदू संस्कृती और इसे कहलाया जाता है " हिंदू साम्राज्यका राजा '

शिवाजी महाराजके शासन कालमें किसी नागरिकको जात, भाषा, धर्मके आधारपर दूजा भाव रखकर व्यवहार कभी नही हुआ | हिंदू सहिष्णू है और सहिष्णू रहेगा यह तत्व शिवाजी महाराजके शासन व्यवस्थाकी एक विशेषतः थी | पर धर्मके आधारपर किसीको ना कोई छूट मिली ना कोई स्वतंत्र दर्जेकी सुविधा | सभी जात-पात, भाषा धर्मके लोगोंके लिए समान नागरी कानून था | पर उनकी स्वधर्मपर निष्ठा ऐसी थी की उसे अंतपार नही था| आदिलशाही, सुलतानशाही, निजामशाही, मोगलाईमे जिन हिंदू मंदिरोंको तोडा था उनकी दुरूस्ती कि गयी | आक्रमकोंके घटियाँ चालसे जिन हिंदू बांधवको जबरन तरिकेसे इस्लाम याँ ख्रिस्ती बनाया गया है उनको फिर हिंदू धर्ममे वापस लेनेकी प्रक्रीयामें (शुद्धीकरन) बाधा उत्पन्न करनेवाले प्रस्थापित पुरोहीत वर्गके कुछ कर्मठ लोगोंकी एक भी  नही मानी और नेताजी पालकरको हिंदू समाजमे वापस लिया | 


राज्याभिषेक होनेके बाद तुरन्त शिवाजी महाराजाने सडी हुई  वतनदारी, सरंजमशाही व्यवस्था बंद की | सरंजमशहा और वतनदारोंसे किसानोंपर होनेवाला अन्याय खत्म हुआ और अपने अधिकारीओंको स्पष्ट  चेतावनी दि की " यदी  खेतकी फसल धान्य हो याँ सब्जी हो, मुफ्तमे लेनेकी कोशीश की, तो कडी सजाको तैयार रहना होगा |" सुलतानशाही, आदिलशाही तथा निजामशाही के राजमे किसानोके खेतोमे आग लगनेकी घटनायें नित्यकी वार्ता रही थी और किसानको काफी नूकसान होता था | किसानको राहत मिलनेके लिए रातमे मशाल जैसे दियाका उपयोगपर निर्बंध डाला, परेशानी देनेवाली करप्रणाली तात्काल बंद करायी | किसान वर्गमे जमीन मालकीपर मतभेद थे, इससे गृहकलह गाव-बखेडा बढे थे | इस पर नये ढंगसे फिरसे भूमीमापन किया गया और किसानोकी जमीन की सीमा तय कराके लियी | इससे किसान वर्ग खुष हुआ और नयी उर्जाके साथ काम करने लगा |  कृषी उत्पन्न बढना छुरू हुआ | जिन भूमीपर कुछ भी उगाया नही जाता वहाँ सब्जी फल का उत्पादन छुरू हुआ | सभी गावोंके बजारमे  जरूरतें वस्तूओंका वितरणके एक नयी व्यवस्था छुरू की थी | प्रशासनमे ऐसे नोकरशहा थे जिन्हें सुलतानशाही निजामशाही और आदिलशाही के राजमे  मुफ्तमे नमक, तेल, डाल, चावल, सब्जीयाँ लेनेकी बुरी आदत लगी थी उन्हें तात्काल बरखास्त किया | 

आदिलशाहीके राजमें चिंचवडके मोरया गोसावी नामके सिध्दस्त स्वामीके शिष्यगण, किसान और व्यापारी वर्गसे मुफ्तमे सब्जीया, चावल लेते थे, उस प्रथाको शिवाजी महाराजने बरखास्त किया | एक हिंदू धर्मगुरूको  हिंदू राजाके शासन कालमे  चावल, सब्जी जैसे चिजोंकी पैसा देना पडेगा यह बात स्वामीके शिष्योंको अनुचित लगा,  इससे  गोस्वामीके मनमे गलत फैमानी न हो इसके लिए महाराजने मोरया गोसावीको पत्र लिखकर कहा, ' साधू-संतोंका मान रखना यह राजाका काम है, ना  किसान और व्यापारीयोंका | आपके मठके लिए जो चीजें खरिदने पडेगी, उसके लिए पैसा मै मेरे निजी खर्चके लिये रखे हुये पैसोंसे मिल जायेगा, आप चिंता मत करो | इसे कहते है पारदर्शी राज्यशासन !

यवनोंके राजमे हर क्षेत्रमे अन्याय चल रहा था | सौ वर्षके वतनके बखेडापर कुछ निर्णय नही हुये थे | और ऐसी स्थिती मावळ प्रांतमे ज्यादा थी | अपनेही समाजबांधवोंका सामर्थ्य बेकारमें खर्च होता था | दस सालमे सभी न्यायालयीन केसेको सदरमे सवाल-जबाब तथा निहीत कागदपत्रोंद्वारा निकाली लगायी | समाजमे स्वस्थता आयी जिससे समाजबांधवोकी पिडा नष्ट हो गयी और भाईचार बढते बढते समाज बांधवकी कार्यक्षमता बढी | हर क्षेत्रमे उत्पादन बढा और स्वराजका महसूल भी बढ गया | छोटा-मोटा उद्योग क्षेत्रमे भी सांघीक शक्ती बढ गयी | इन सभी कार्यमें महाराजने बडी कुशलतासे  सामूहीक ( जिनमे  माता जिजाई , दादोजी कोंडदेव, अष्टप्रधान मंडल इनका समावेश था )   न्यायदृष्टीका उत्तम उपयोग किया |

सामान्यजन चाहे किसान हो, याँ व्यापारी हो, सेवा कर्म करनेवाले हो याँ पुरोहीत वर्ग , कारागिर वर्ग हो, याँ कर्मचारी वर्ग सभीको सुखी तथा सुनियोजित जीवनका अनुभव होने लगा | इसमे कायदा और सुव्यवस्थामे सुधारका भी योगदान था | जगह जगह पर 'राजा हो तो शिवाजी जैसा' ऐसा सूर सुननेमे आने लगा | अपने राजाके प्रती लोगोंको अभिमान था तथा लगाव भी था | लोग उन्हें ' जाणता राजा '  और ' लाडला राजा ' इस तरह संबोधन करने लगे | शासन कैसा लोकाभिमूख रहे , इसका एक मुर्तीमंत उदाहरण शिवाजी महाराजने पेश किया है, जिससे हमें आज भी प्रेरणा मिलती है और आगे ही मिलती रहेगी ऐसा विश्वास व्यक्त करके इस चर्चाको मै यहाँ समाप्त करता हूँ |

जय भवानी जय शिवाजी !

सोमवार, २४ जून, २०१९

शिवराज्याभिषेक दिनके पर्वपर भाग-२



इस लेख मालिका का भाग १ पब्लीश करनेके बाद महाराजका महान पराक्रम, साहस, अद्वितीय युध्दनीती, कुटनीती,  राष्ट्रीय सुरक्षा प्रती कटीबध्द नीती, अतूल्य संघटन कला, असीम राष्ट्रभक्ती,  प्रजाहितदक्ष शासन, अपनी सेना और प्रजापर माँके जैसी माया, स्वधर्मपर  निष्ठा, साधू-संत-सज्जनों,और महिला वर्गप्रती आदर और कर्तव्य निष्ठा, दुर्जनोंपर कडी नजर, यवन- आक्रमकोंके स्वजन और स्वधर्म पर होनेवाले अमानुष अत्याचारको ठकासी महाठक ऐसा रूख  इन विषयकी सूची आँखोके सामने आ गयी | यदि हम हर विषयपर संक्षिप्तमें कुछ चर्चा करें,तो भी वह चर्चा एक स्वतंत्र लेख हो इतनी होनेवाली है ,यह महसूस हुआ | अतः आज चर्चा छुरू करनेसे पहले एक बात समझके चले, की शिवाजी महाराजके चरीत्रपर चर्चा नही बल्की पारायण होता है | क्योंकी शिवाजी महाराज एक युगपुरूष है | तो चलो, पहले महाराजका पराक्रम, साहस, युध्दनीती, कुटनीती पर चर्चा छुरू करते है |

छत्रपती शिवाजी महाराज का पराक्रम और युद्धनीती

१) छत्रपती शिवाजी महाराज युध्दमे कभी पिछे नही रहते थे, एक सेनापतीके तरह आगे रहते थे, इसी विशेषताको आज  leading from the front ऐसा कहा जाता है |

२) उन्होंने युध्दमे कभी संरक्षणात्मक तो कभी आक्रमक नीती अपनायी दिखती है | उनकी Gauila Warfare याने गनीमी कावापर दुनियाके सभी देश जितने उत्साहीत ढंगसे अभ्यास करते है उतनेही गंभीरातसे ही करते है क्योंकी युध्दका यह तरिका अंमलमे लानेमे कई कठीनाई भी रहती थी | 

३) दुनियामे, बहूत बडे योध्दा हुये लेकीन युध्दके अभ्यासक शिवाजी महाराजको अग्र स्थान देनेमे हिचकते नही है | इसका कारन शिवाजी महाराजके समकालीन योध्दा हो याँ उनके पुर्वकालीन हो तौलानिक दृष्टीसे शिवाजी महाराजकी देहयष्टी उँचाई तथा चौडाईमे कम थी | फिर भी उनकी शक्ती, नजर और बुध्दी सबसे तेज थी | 

४) शिवाजी महाराजका साहस अद्भूत था और उनकी सावधनता भी उतनीही अद्भूत थी | इसिलीए उनके शत्रू अंदाज नही करपाये |  बार बार एक सवाल उनके शत्रूको सदाके लिए सताता रहा कि इतनी कम संख्याकी सेना लेकर शिवाजी उन्हे पराजीत कसै करता रहा | कम संख्याकी सेनासे जब अपनी बडी संख्याकी सेना पराजीत होती है तो इसका दुःख मृत्यूसे अधिक दाहक होता है | गीतामे भगवान श्रीकृष्णने कहा,' संभावितस्य अकिर्ती मरणात् अतिरिच्यते |  (किर्तीवान आदमीको अपकिर्ती मृत्यूसे ही खतरनाक लगती है) और यही हालत हो गयी औरंगजेब, निझाम, आदिलशाह इनके सेनाका | किसी इतिहासकारने लिखा है कि मोगलोंके घोडे भी इतने डरपोक बने गये थे की, उनको पानी पिते समय भी पानीमे उन्हे शिवाजी महाराजके सेनापती दिखते थे | शिवाजी महाराजकी युध्दनीतीसे प्रतिपक्ष सेनाके मनोबलपर बडा प्रहार हो जाता था |  शिवाजी महाराजकी युध्दनीती के कई उदाहरण है इसमेसे दो मुख्य उदाहरण नीचे देता हूँ |
        अफझलखानका वध
अफझलखानका वध का जो वर्णन, वृत्तांत इतिहासमे पढा है, सुना है, इससे एक बात स्पष्ट है की शिवाजी महाराजका साहस की गिनती ना अंकोमे होती है, ना शब्दोमे की जाती है | किसी शत्रूके सरदारका खात्मा करना है, तो महाराज उस सरदारकी देहयष्टी, ताकद, युध्द कौशल्य, उसका स्वभाव, उसका पेहराव, उसकी कमीयाँ, प्रत्यक्ष युध्दमे उसकी अबतक की सफलता और सफलतामे उसका खुदका योगदान, उसके साथ आये हुये सैनिककी संख्या, हत्यारें-शस्त्रे, इन सब चीजोंकी जानकारी शिवाजी महाराज पहलेही लेते थे ऐसा तर्क याँ अनुमान निकलता है |

अफझलखानको मारते समय सावधानी और चतुराईसे उसे उसकी मुख्य सेनासे अलग करके अपने क्षेत्रमे  बुलाया | बुलानेकी भाषाका इस्तेमाल भी ऐसा था, की अफझलखानको लगा की शिवाजी डर गया है और शिवाजीने तह की इच्छा जतायी है | इससे अंहकारी खानको आनंद लगना स्वाभाविक था | फिर भी खान शिवाजीको अपने शारिरीक शक्तीसे मिटा देनेकी तैयारीसे आया था | बस दोनोंकी भेट होती है, अफझलखानने शिवाजीको गले लगाकर अपने पहाडी शक्तीसे शिवाजीको दबाया और दम घोटनेकी मौत देनेका प्रयास किया तब शिवाजीने अपने कमरके अंदर छिपाया हुआ एक अजीब हत्यारसे (शेरके नाखूनसे बनाया ) खानके पेटमे घुसा घुसाके खानको मौतके घाट उतार दिया | शिवाजी और अफझलखानके भेट जब तय हूई उससे पहलेही अफझलखानको मारनेकी योजना तयार की 
थी | शिवाजी महाराजने पहले अपने जासूद (आजके भाषामे गुप्तहेर) अफझलखानके सेनामे फैलाके रखे थे |आखिरके मौकेपर बहिर्जी नाईक नामक जासूद अफझलके काफीलामें टरबूज बेचनेवालेके बहुरूपमे जाकर उनको टरबूज देनेके लिये आगे गया, टरबूज दिया और सुक्ष्म दृष्टीसे देख लिया की अफझलखानने अपने शरीरपर वस्त्रोके नीचे किसी तरहका  सुरक्षा कवच नही पहनाया था | यह बात शिवाजी महाराजको दुसरे जासूदके माध्यमसे पहूँचा दि गयी | इसका मतलब शिवाजी महाराजने अफझलखानको मिलनेका बहाना करके उसे खत्म करनेकी योजना पहले ही बनायी थी |  युद्धमे रिस्क लेना है  तो सावधानी, नियोजन और कृतीका अच्छा समन्वय पक्का करना पडता है , तो ही जीत होती है | अफझलखानका वध यह एक अर्वाचीन जगतमे एक नया युद्धनीतीका मुर्तीमंत उदाहरण था |

शिवाजींने  शाहिस्तेखानका, मनोभंग और पराजय करते समय वह रणनीती नही दोहरायी | बल्की उनके ३ लाख सैन्यके बीचमे सिर्फ १०० सैनिकको शादीकी बाराती बनकर साहससे  घूसें और रातके अंधेरेमे शाहीस्तेखानके महलमे खूद शिवाजी महाराज गये और बेसावधानीमे शाहीस्तेखानपर प्रहार किया | अचानक हमलेसे डर गये हुये शाहिस्तेखान भाग गये | नसीब उसकी जान बच गयी पर युद्धमे काम आनेवाली उंगलीयाँ तो तोड दियी | युद्धपिपासू और अंहकारी औरंगजेबके महान सेनापती और रिश्तेसे मामा शाहीस्तेखानको युद्धमैदानसे निवृत्त किया |  

शाहीस्तेखान, अफझलखानकी वधके तरीका शिवाजी फिर दोहारेगा यह उमीद करके बैठा और खुदको पागलपनका शिकार बनाया |  इस घटनासे  खतरनाक चाल करनेमे अपना राजा अग्रेसर रहता है यह एक अच्छा संदेश शिवाजी महाराजके सेनामे गया | सेनाको प्रेरणा मिली जिससे उनका आत्मबलमे बढोत्तरी हुई | 

५) बदलता समय देखकर युद्धके हाथियारोंमे आधूनिकता लानेकी कोशीशमे शिवाजी महाराज कुटनीती अपनाते थे | ब्रिटीश के स्पर्धक फ्रान्स तथा कभी कभी पोर्तूगीज के साथ शस्त्र निर्मीती तथा खरीदनेका व्यवहार किया है | नये ढंगके शस्त्रोंका उन युरोपियन देशोंसे जानकारी ली और उसमे अपनी तकनिक डालके शस्त्र बनायें | साथ ही साथ अपने राज्यमे नई ढंगकी तलवारे बनायी जिनकी लंबाई बढायी ताकी अपने कम उँचाईवाले सैनिक  दुश्मनके ऊँचे सैनिकोको मार सके | 

६) शिवाजी महाराजकी दूरदृष्टी भी अजीब थी | जो समुंदरपर राज करेगा वह जगपर राज करेगा यह बात शिवाजी महाराज अच्छी तरहसे जानते थे | युरोपियन व्यापारी जो आते थे वह सिर्फ व्यापारी नही है, यह आक्रमक भी हो सकते है यह विचार शिवाजी महाराज जैसे बुध्दिमान राजाके मनमे आना इसमे आश्चर्य नही है | लेकीन उपायके रूपमे समुंदरपर तट बनानेमे प्राथमिकता देकर कार्यान्वीत करनेमे जो तत्परता शिवाजी महाराजाने दिखाई, इससे महाराजकी प्रशासनपर पकड कितनी मजबूत थी, इसका दर्शन हमें मिलता   है |  हेनरी रेनिंग्टनने एक ब्रिटीश युद्ध अभ्यासक शिवाजी महाराजका वर्णन  General of Hindu Forces इन शब्दोमे किया है |

७) छत्रपती शिवाजी महाराजकी सेनामे सब जात-पातके लोग सम्मेलीत किये जाते थे | ना छुत-अछूतका भेद ना उच्च -नीचका भेद |  समाजके सभी वर्गको रणभूमीपर अपने अपने स्वाभाविक रूची, मनिषा, काबिलीयत के अनुसार प्रवेश तथा जिम्मेदारी दि जाती थी | मैने एक जगह पढा है, कि शिवाजी महाराज खुद समाजके विभिन्न घटकोंके मुखीयाँ और उनके साथीदारोंसे सवाल-जबाबका सत्र रखकर सेनामें भर्ती करते थे | सुना है की महाराष्ट्रमें सुर्यवंशी समाजके मुखियाँ और उनके साथिदारोसें एक बार शिवाजीने पुछा कि " आप इस स्वराजके लिए क्या काम कर सकते है ?" तो उनका ग्रामीण भाषामे जबाब आया, " आमी कुनी बी हाय ; आमी नांगर (हल) बी चालवितो अन् तलवार बी ; आम्हांस्नी सैपांक भी जमतोय. (खाना बनाना)  आमी सैनीक भी हाय अन् शेतकरी बी हाय. " आज वही समाज कुणबी नामसे जाना जाता है | यह उदाहरण इसिलीए दिया की अर्वाचीन भारतमे सेनाकी रचनामें ऐसा  क्रान्तीकारक बदल का जनकत्व शिवाजी महाराजको जाता है | अपने देशमे वर्णव्यवस्था का खतरनाक जातीव्यवस्थामे जो रूपातंर हुआ था उसे शिवाजी महाराजने प्यारके दो शब्दोंसे बदल दिया | जब देशमे सिर्फ  क्षत्रियको ही हथीयार चलानेका हक्क था,  वह बदल गया | शिवाजी महाराजकी इस नीतीसे उनकी सेनामे  ' एकही राष्ट्रके हम सब सैनिक ' यह भावना उत्पन्न हुई जिसका उचीत परिणाम सेनाके परिवारमे तथा नागरी  (सिव्हिलीयन्स) समाजमे भी हुआ | 

श्री शिवाजी महाराज का इतिहास अजब तथा विभिन्न रूप लेकर आनेवाली युध्द नीती, अतूल्य साहस और पराक्रमसे भरा हुआ है | इसिलीए इस चर्चाको इधरही हम रोकते है क्योंकी हमें हरसाल राज्याभिषेक दिनके पर्वपर एक हप्तेतक तीन लेख हो, इस तरह शिवाजी महाराजके चरीत्र पारायण करना है | आनेवाले दो-चार दिनमे शिवाजी महाराजके प्रशासन कौशल्य पर चर्चा करेंगे |

      जय भवानी जय शिवाजी |

सोमवार, १७ जून, २०१९

शिवराज्याभिषेक दिन के पर्वपर - भाग १


शनिवार जेष्ठ शु १३ शा शके १९४१ याने शनिवार १५ जून २०१९ को सभी जगह अपने राष्ट्रके मानबिंदू और प्रेरणस्त्रोत छत्रपती शिवाजी महाराजका राज्याभिषेक दिन उत्सव मनाया गया | इसी दिन आजके पुर्व ३४५ सालमे  शिवाजी महाराजका राज्याभिषेक हुआ था | दिन था जेष्ठ शु१३ शके १५९२ अर्थात तारीख ६ जून१६७४ | शिवराज्याभिषेक दिनके पर्वपर चर्चा करनी है तो पहले वैदिक कालका अपना समाज, संस्कृती एवं राज्यव्यवस्था पर जरासी नजर डालना जरूरी है,  कारन यह है की छत्रपती शिवाजी महाराजका राज्याभिषेक समारोह कैसा था, उन्होंने स्थापित किया हुआ स्वराजका स्वरूप क्या था, कौनसी विशेषतायें थी, इन सब बातोंपर चीजोंपरकी हमारी चर्चा सही दिशामे जा सकती है ऐसी मेरी राय है | 

वैदिक कालमे हमारे यहाँ  दशरथ, जनक जैसे पराक्रमी और ऋषीमुनीओं इतने ज्ञानी राजा-महाराजा थे | गणपती तथा सत्यनारायणादि, दुर्गा और लक्ष्मी इत्यादी देव- दैवताओंकी  पुजा करनेके बाद जो मंत्रपुष्पाजंली करते है वह एक वैदिक कालकी प्रार्थना है | उसका अर्थ है,  हमारे देशमे कल्याणकारी राज्य रहे (आजकी welfare state की कल्पना वैदिक कालसे चलती आयी है), हमारे राज्य उपभोग्य वस्तुओंसे भरा हुआ हो और यहाँ लोकराज्य रहे, (याने अन्न वस्त्र और निवाराकी कमतरता न हो और राज्य लोकतांत्रिक रहे | इसका मतलब Democracy की कल्पनाके जनक भी हमारी वैदिक संस्कृती है) हमारा राज्य असत्य और लोभ विरहीत रहे (राज्यव्यवस्था सत्यमेव जयते और विरक्ती सिध्दांत पर निर्भर रहे, आजके परिभाषेमे राज्यका कारोबार पारदर्शक तथा भ्रष्ट्राचारमुक्त रहे)  हम परमश्रेष्ठ राज्यके आधिपत्य हमारा हो | हमारा राष्ट्र कैसा हो, वह सुरक्षित हो तथा धरतीकी सिमायेंतक और समुंदरकी अंतिम गहराही तक व्याप्त हो और वह राज्य भी सृष्टीके अंततक अजिंक्य रहे |  वैदिक कालमे प्रार्थना और प्रतिज्ञा मे फर्क नही था | प्रार्थना ही प्रतिज्ञा थी और प्रार्थना ही निश्चय था | क्योंकी राजे महाराजे त्यागी थे | समाज भी सत्य और नैतीकता स्विकार करनेवाला था | उस समय अपना देश अजिंक्य तथा वैभवसंपन्न था | गव्हर्नन्स नामकी चीज नही थी | समाज ही गव्हर्नन्सपर बैठा था ऐसा माने तो भी अतिरंजीत न होगा | 

मध्ययुगमेही विक्रमादित्य और चंद्रगुप्त मौर्य जैसे ही आदर्श राजा थे | उनके कालमे भी अपना देश वैभवसंपन्न था | लेकीन इसी युगके कही अंतिम चरणमे वर्णव्यवस्थाका रूप जातीव्यवस्थामे होकर हमारे समाजकी एकतामें इतनी बाधायें उत्पन्न होती रही की विदेशी आक्रमकोंके सामने हमारे राजा महाराजोंकी हार छुरू हो गयी,और दुर्दैवसे  भारतमाताके कंठ  स्थानसे फुलोंकी मालाके जगह  परवेशताका पाश आया | 

इस ७२५ मे अपने देशके उत्तर पश्चीमसे बिन कासीम नामके यवन आतंकवादीने आक्रमण किया और तबसे एक के बाद एक तुर्क, तैमूर, गझनी, चंगीजखान, मोंगल ऐसे यवनोंका अपने देशपर आक्रमणका सिलसिला छुरू हुआ |  हमारे मंदिर उध्वस्त किये गये | माॅ- बहनोकी इज्जत, सोना-चांदी जवाहरकी लुट छुरू हुई | अपना पुरा समाज भयमय हुआ था,  हर पल पर हिंदूबांधव घृणा, अपमान, अत्याचार के शिकार बन गये | लोगोके माथेपर यवन आक्रमकोंने जबरन अपने लोगोंको धर्म परिवर्तन कराके उन्हें इस्लाम बनानेकी एक षढयंत्रकी सुरूवात हुई | उसके बाद अंग्रेज आये | उनके सिर्फ एक हजार सैनिकके सामने प्लासीकी लढाईमें हिंदूस्थानकी हार हुई | वजह क्या थी? जाती-जमातीमे भेद, राजा-महाराजाओंके बीच स्पर्धा तथा उनकी ऐष वृत्ती, शस्त्र चलानेका अधिकार समाजके सिर्फ एक वर्गको था और बाकी समाज किस पक्षकी जीत होगी यह देखता रहा | पुरे समाजको आत्मविस्मृती जैसी बिमारी जड गयी थी | वही एक प्रमूख कारन है जिससे अपना देश एक हजार साल परतंत्रमे गया | 

अर्वाचीन कालमे आजसे ३४५ साल पहले देशके दख्खन प्रांतमे एक सोलह सालके युवक को देश और समाजकी  दयनीय स्थिती देखी नही गयी | उसने हर जात-पातके अपने बालमित्रको एकठ्ठा किया,और  कसम खाई,  'अब नही चलेगी यवनोंकी दादागिरी, अब ना होगा हमारे माँ-बहनकी इज्जत पर हमला, ना हमारे मंदिरोंपर !  हम एक ही नारा देंगे, हरहर महादेव और हमारी राष्ट्रभूमीमे सिर्फ स्वराज्य होगा | ' समाजके हर जात-पातके युवकोंको प्रेरीत करके अपनी सेना तैयार की और तोरणा किला जिताकर वहाँ हिंदू स्वराज्यका भगवा ध्वजका रोहण किया | उस युवक का नाम शिवबा था | उसे आज सिर्फ हिंदूस्थानमे नही बल्की जगतमे  पहचाना जाता है, ' गो ब्राह्मण प्रतिपालक छत्रपती शिवाजी महाराज ' नामसे |

शिवबासे छत्रपती शिवाजी महाराज बननेका मार्ग कितना कंटकाकीर्ण था उसका अंदाज लगाना हम जैसे सामान्यजनोकी शक्ती, दृष्टी और बुद्धीके अर्बो मैल दूरकी बात है | पहले तो  सारा समाज आत्मविस्मृतीमें गया हुआ ; जात-पात, उच-नीच के भेदमे बिखरा हुआ; उसमेसेही पराक्रमी राजे-महाराज, सेनानी, और अभिजन वर्ग आक्रमकोंकी चाकरी करनेमे धन्यता मान रहे थे, उन सभीको  शिवबा की स्वराजकी कल्पना हास्यास्पद लगती थी | इतनाही नही जगह जगहपर, नाकेपर, सार्वजनिक जगहपर ' ये कलका बच्चा कैसे यवनोंकी ताकदवान बडी संख्यावाली सेनाको परास्त करेगा ' ऐसी टिका टिप्पणी भी सुनने पडती थी | लेकीन शिवबा दृढ निश्चय कर बैठा था, और उसके साथिदारोंपर उसका पक्का भरोसा था | गहरी काली रातमे ना ठंडीकी पर्वा, ना बारीसकी | पहाड टेकडीके वक्रगोल, टूटे-फूटे पथ्थरोंसे भरे हुये रास्तेसे अपनी मार्गकी दिशा बनाते, कभी शत्रुको गुमराह करके राह बदललके, अपने साथीदारोंका हौसला बढाके एक के बाद एक शत्रूको पराजीत करके हर किल्लेपर कब्जा करके भगवा ध्वजका रोहण करते करते स्वराज्य निर्माण किया |  राज्याभिषेक समारोह बडी धूमधामसे हुआ और समाज बदल गया | समाजमे नवचैतन्य संचारने लगा |शिवराज्याभिषक दिनोत्सवकी विशेषतः यह थी की समाजका हर वर्ग उसे  'हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव ' ही  मनाने लगा था | ऐसा क्यों, इसपर थोडीसी चर्चा करेंगे| 


शिवराज्याभिषेक --- हिंदू साम्राज्य दिन उत्सव

१) वैदिक कालमे अधिकतम राजघरानाका युवराजका राज्याभिषेक हो जाता था | उस समय जगतके दुसरे कोनेसे देशपर आक्रमण नही होते थे |

२) विक्रमादित्य और चंद्रगुप्त मौर्यके समय मुस्लीम आक्रमकको ज्यादातर उत्तरी-पश्चीम सीमाओंतक रूकाया जाता था | अपने देशपर उत्तरी-पश्चीम दिशासे जो आक्रमक आते थे वह स्वतंत्र रूपसे आते थे | उन्हें  तुर्कस्थानके खलिफासे फतवा नामकी चीज नही थी | 

३) शिवकालमे सारा हिंदू समाज सुलतानशाही, आदिलशाही, निजामशाही, मोगलाईसे त्रस्त था | यवनोंकी यह सभी जुलमी राजेशाही तुर्कस्थानके खलिपाकें नामसे चलती थी | क्योंकी इनके प्रमूख बादशाह तुर्कस्थानके खलिपासे हिंदूस्थानकी अपनी अपनी रियासतें चलानेकी अधिकृत परवाना माँगते थे और खलिपासे उन्हे इजाजतका पत्र मिल जाता था | इसका मतलब पुरे हिंदूस्थानको  इस्लामी देश बनानेकी तैयारी हुई थी| शिवाजी महाराजका राज्याभिषेक समारोह होना हिंदू समाजके लिये एक जरूरत थी | समयकी माँग थी | इन  यवनोंकी दशहतवादी और जुल्मी राज को एक करारा जबाब हिंदू राजासे देनेकी जरूरत थी | इन बातोंपर हिंदू समाजके धार्मिक गुरू, संतजन तथा सामाजिक नेता और विचारवंतोमे सहमती हुई थी | इन सभीकी और जिजामाताकी भी इच्छा थी की शिवबाका राज्याभिषेक हो | इसिलीये शिवाजी महाराज कहते थे कि " हे राज्य होणे ही श्रींची इच्छा आहे." ( यह राज्य निर्माणकी मनिषा ईश्वरकी है )

४) शिवाजी महाराजका राज्याभिषेक कैसा था ? इतिहासके अभ्यासक बताते है, की शिवाजी महाराजने जी प्रतीज्ञा ली वह हिंदू पंरपंराके तहत थी | काशीसे विख्यात वेदशालासंपन्न  गागाभट्टा और उसके सहकारी पुरोहीतके वेदमंत्रोकी गुंजमे,सप्तसिंधूके जलसे राज्याभिषेक समारोह संपन्न हुआ था | प्रभू श्री रामचंद्र, चंद्रगुप्त मौर्य और विक्रमादित्य इत्यादी राज्याभिषेक समारोहके बाद जो पंरपंरा जो खंडीत हुई थी वह फिरसे छुरू करनेके लिये शिवाजी सिंहासनापर अधिष्ठित हुए | (संदर्भ लोकराज्य १६-४-१९८५ पृष्ठ १८) 

५) छत्रपती शिवाजी महाराजाने अपने स्वराजका ध्वज हिंदू संस्कृतीका प्रतिक भगवा ध्वज स्विकारा इससे स्पष्ट होता है की शिवाजीकी मनिषा याँ कल्पना हिंदू स्वराज्य स्थापनेकी ही थी, इसमें कोई संदेह नही है | आदिलशाहीके सरदार मालोजी  घोरपडेको तथा मोगशाहीके सरदार जयसिंगको लिखे हुये पत्रसे भी यही सिद्ध होता है छत्रपती शिवाजी महाराजके मनमे हिंदू राष्ट्रकी कल्पना थी | मोगलशाहीके तरफसे जब जयसिंग आक्रमण करने आते थे तब पत्रमे शिवेजी महाराज उन्हे लिखते है, हिंदू स्वराज स्थापन करनेके लिए आप आते हो तो आपका आदरसे स्वागत के लिए मै तैयार हूँ, लेकीन  मोगलशाहीकी उन्नतीके लिए आप आ रहे हो तो आपको मै राष्ट्रद्रोही समझके आपसे व्यवहार करूंगा |

६)छत्रपती शिवाजी महाराजका राज्याभिषेक समारोहसे हमारे संस्कृतीके अनुसार बनायी हुई राष्ट्रकी संज्ञा जो खंडीत हुई थी, वह फिर एक बार व्यक्त रूपमे आयी | ' राष्ट्र  माने समान संस्कृती, समान आदर्श, समान पंरपंरा, और समान शत्रू-मित्र भाव रखकर हम सब एक है, इस भावनासे विशिष्ट भूमीमे वास्तव करनेवाला समाज | ' 

७)सिंधू नदीके आसपास रहनेवाला समाज हिंदू और वह राष्ट्र हिंदूस्थान | कई लोग जो खुदको सो काॅल्ड सेक्युलरीस्ट मानते है वह हिंदू शब्दका अर्थ इस्लामी लोगोंने दियी हुई  'गाली ' मानते है | सच बात यह है, की पश्चिमी तथा मध्य आशियासे आये हुये आक्रमक स इस शब्द का उच्चार ह ऐसा करते थे | सप्त सिंधू प्रदेशका उच्चार ' हप्त हिंदू प्रदेश ' होता था और इसिलीए सिंधूका भ्रमीत शब्द हिंदू हुआ | राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघके द्वितीय सरसंघचालक पुजनीय गुरूजी इस विषयके महान विचारवंत थे, उन्होंने विचारधन नामके किताबमे इसपर गहन चिंतनका दर्शन दिया है |  इग्लीश विचारवंत मोनियर विल्यम इन्होंने भी गुरूजीकी बातपर सहमती जतायी है | 

८)छत्रपती शिवाजी महाराजाका राज्याभिषेकसे अपने समाजमे मूल एकताकी भावना वापस दृढ हुई | हमारी प्रान्तीय भाषा अलग हो, वेषभूशा भिन्न हो, आहार अलग हो, यह सब भिन्नता भौगोलिक स्थितीका परीणाम है | यदि हम रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ की साहित्यिक दृष्टीसे नजर डालते है तो हमे एक सत्य दिखता है की, ' भारतके सभी प्रांतमे उनके भाषामे ये दोनो ग्रंथ लिखीत स्वरूपमे मिलते है |भाजपाके नेता डाॅ मुरली मनोहर जोशी ने कहा है, कि " भारतकी सांस्कृतिक मुख्य धारा ऋग्वेदमे छुरू हुई और आजतक अविच्छिन्न रूपसे चली आ रही है |  काश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे समाजकी जीवन दृष्टीमे एक तत्व है | हमारे यहाँ कहा गया है, ' उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमादृश्चैव दक्षिणं | वर्षत भारतः भारतीय यत्र संतती ' अर्थात समुद्रके उत्तरमे और हिमालयके दक्षिणमे स्थित भूमीभाग भारत है और उसमे रहनेवाले भारतीय उसकी संतान | स्पष्ट यह है की यहाँ भारतके साथ माता और पुत्रका संबंध है | सारे भारतीय संस्कृती-सहोदर है |" 

९)शिवराज्याभिषेक समारोहका पौराहत्य दक्षिण स्थित महाराष्ट्रमे काशी के गागाभट्टाके नेतृत्वमे हुआ यह सत्य है और इससे ही यह सिध्द होता है की भारतमे केवल एक सभ्यता और संस्कृती है और वह है हिंदू सभ्यता और संस्कृती है |' यह ऐताहासीक सत्य लार्ड कर्झन और स्वतंत्रता पुर्व अखिल भारतीय राष्ट्रीय सभाके (याने आजके काॅग्रेस पक्ष) अध्यक्षा डाॅ ॲनी बेंझटने भी स्विकारा था | डाॅ कर्झन १९०४ मे एक पार्टीमे बोले है की  " हम इंग्लीश लोग जंगलमे रहते थे तब इंडीयामे एक विकसित संस्कृती थी | " और डाॅ अँनी बेंझटने कहा है  की, " हिंदूस्थानमे सबसे प्राचीन धर्म हिंदू ही है | अन्य धर्म जैसे आये, वैसे चले गये तो भी हिंदूस्थानका कुछ नुकसान नही होगा, लेकीन हिंदूस्थानसे हिंदूइझम खत्म हुआ तो इस देशका अस्तित्व नष्ट होगा |

छत्रपती शिवाजी महाराजके चरीत्रपर चर्चा हर साल उनके जयंती तथा राज्याभिषेक दिनपर करते रहें तो भी उसे समाप्ती नही है | इसिलीए इस चर्चापर मै यहाँ एक विश्राम लेता हूँ , ताकी हम स्वतंत्र रूपसे शिवाजी महाराजका पराक्रम तथा उनकी युद्धनीती और शासन व्यवस्था पर चर्चात्मक रूपसे अध्ययन कर सके |

              जय भवानी जय शिवाजी !

सोमवार, १० जून, २०१९

मृत्योर्मा अमृतं गमय |



बर्याच महीन्यानंतर म्हणजे ' इशावास्यम इदं सर्वम ' हा लेख लिहील्यानंतर आज मी 'आपण व आपली दैवते ' या विषया वर लेख लिहीण्यासाठी बसलो आहे. तसे पाहता कोजागिरी पौर्णिमा, कार्तिकी एकादशी, अस्पृशता एक बडी भूल, मकर संक्रातीके पर्वपर, इत्यादी अराजकीय लेख पब्लीश केले असले तरी १५ जानेवारी नंतर ब्लाॅगवर  राजकीय घडामोडीनेच जागा व्यापली. समाजाची धारणा ज्यातून होते तो धर्म. धर्म कल्पनेत राज्यव्यवस्थेचाही समावेश असतो. म्हणून राजकीय घडोमोडीवर विशेषतः निवडणूकीच्या काळातील राजकीय पक्षांच्या प्रचार सभा, रणनीती, जय-पराजय ह्या संबंधी लेख लिहीण्याकडे कल अधिक राहीला. पुर्वी सात-आठ वर्षे राजकारणात सक्रीय भाग घेतलेल्या निदान माझ्या सारख्यांसाठी ती स्वाभाविक प्रवृत्ती आहे, असे आपण मानाल अशी आशा व्यक्त करून मी आजच्या विषयाकडे वळतो. 

ईशावास्यम इदं सर्वम ह्या लेखात ईश्वराच्या व्याप्तीचे वर्णन केले आहे. चराचरात ईश्वर व्यापला असल्यामूळे सार्या चल-अचल वस्तूत ईश्वर आहे हे ओघाने आलेच.  ईश्वर दिसत नसला तरी तो आपल्याला चल अचल वस्तूत आहे असे जाणवते. ईश्वराचे आणखिन एक अदभूत  वैशिष्ट्य असे आहे की त्याने आपले भावविश्वही  व्यापले आहे. म्हणून तो करूणासागर आहे ; भक्तवत्सल आहे; तो सगुण आहे तसेच निर्गुण आहे;  तो पतीत पावन आहे;  तो सत् चीत आनंद आहे  असे त्याचे वर्णन कवी, लेखक गीतकार, संतानी आपआपल्या साहित्यकृतीतून केले आहे. त्यांच्या साहित्यकृत्या म्हणजे देवाच्या स्वरूपाची त्यांना झालेली अनुभूती. असा आपला  विश्वास आहे. ह्याच विश्वासाचं हळूहळू श्रध्देत रूपातंर होत गेलं. हे सुध्दा नैसर्गीक आहे. शेवटी जगाचा कारभार श्रध्देवरच  चालतो ना ! आपली दिनचर्या, आपले आचार-विचार, आहार-विहार,  बोलणं-वागणं, इत्यादीवर कोणीतरी  पाळत ठेवीत आहे, आणि ती शक्ती म्हणजे देव आहे असे आपण मानतो. त्यामुळे पापकर्म करण्याचा मोह टळला जातो. अनायसे आपल्यात विविध गुणांची जोपासना होत असते. आपल्या अंतःकरणात विभिन्न गुणांची जोपासना होण्याची जी प्रक्रीया घडत असते तिचेच नाव देवाची अनुभूती असावी. शेवटी चांगले कार्य ते देव. चांगले बोलणे ते देव, चांगणे ऐकणे ते देव. चांगले देणे- घेणे ते देव. चांगल्या प्रकारे उपयोगी पडता येणे ह्या सार्या दैवी शक्ती. त्या अर्थाचं सुभाषितच आहे.
     हस्तस्य भूषणम् दानम् ! सत्यं कंठस्य भूषणम्!      
     श्रोतस्य भूषणम् शास्त्रम्! भूषणैः किम प्रयोजनम्!!  
दान, सत्याची कास, व शास्त्र श्रवण ह्या सार्या दैवी शक्ती वा दैवीसंपत् होत. सोप्या भाषेत म्हणावयाचे तर ही जीवनमूल्यें, म्हणजेच गुणांची खाण समजू या. 

अनेक गुणांची जोपासना करणे हेच मानवी जीवनाचे प्रयोजन असावे. पण ते कार्य महाकठीण असते. म्हणून आपल्या ऋषीमूनींच्या वाणीतून,
                  तमसो मा ज्योतिर्गमय 
                  असतो मा सद् गमय
                   मृत्युर्मा अमृतं गमय 
असा उपदेश सार्या मानव जातीसाठी बाहेर आला. पण ह्या लेखाचे शिर्षक मात्र मृत्युर्मा अमृतं गमय असे का ठेवले हा प्रश्न आपल्या मनात उद्भवला असणार. त्याचे कारण असे आहे की ऋषीमुनींच्या वाणीतून निघालेल्या पहील्या दोन उपदेशाचे अर्थ आपण जाणतो पण मृत्युवर अमृतसिंचन कसे होऊ शकते, ह्याबाबतचे ठोस असे उत्तर मी शोधू शकलो नाही.  मग ठरले की आपल्याशी चर्चा व संवाद करून काही उत्तर मिळते का हे पाहावे. म्हणून हा लेख प्रपंच.

देव चांगला आहे. मग आपल्यावर संकटे का येतात?   संकटे आपली परीक्षा पाहण्यासाठी येतात. हे ही क्षणभर मानले, तरी एखाद्या घरात एकूलता एक मुलगा देवाघरी का जातो? मृत्यु अटळ आहे , हे ही मानले तरी माता-पित्याच्या अगोदर मुलाला किंवा मुलीला मृत्यु का यावा? देव करूणासागर आहे, पतीतपावन आहे, मग असे का घडते ? देवाच्या दरबारात न्याय आहे की नाही ?  भुकंप, पूर, अपघात, वादळ, त्सुनामी, अशा आपत्तीत निष्पाप  माणसे आपला जीव का गमावितात? असे प्रश्न सदैव आपल्याला सतावीत असतात. अशाच प्रश्नांनी एका सिद्धार्थ नावाच्या राजकुमाराला सतावीले होते.  मृत्युचे अनाकलनीय तांडव पाहून त्याचे संसारतून मन उडते. प्रपंच सोडतो. घराबाहेर पडतो  आणि तप करतो. दिर्घ तपश्चर्या नंतर बोधी वृक्षाखाली त्याला ज्ञान प्राप्त होते. तोच राजकुमार सिध्दार्थ म्हणजे भगवान बुध्द, भगवंताचा अंहिसारूपी अवतार ! प्राणीमात्रांवर दया करावी हा सार्या मानवजातीला दिलेला त्याचा उपदेश. सर्व प्राणीमांत्रावर दया करणार्या एकनाथ महाराजांच्या चरीत्रात वाचलेल्या एका कथेची इथे  आठवण झाली . ती अशी आहे ---

एका गावात एक भांडखोर माणूस होता. तो रोज कोणाच्या तरी कामात अडथळा उत्पन्न करीत असे. सतत दुसर्याशी भांडण उरकून काढीत असे. त्याच्या भांडकुदळ स्वभावाने त्याची पत्नी व मुले कंटाळून गेली होती. सारा गाव त्याच्या स्वभावाने त्रस्त झाला होता. सार्या ग्रामस्थांनी गावाच्या पंचाकडे काही तरी ह्यावर उपाय शोधावा अशी विनंती केली. पंचांनी एक ग्रामसभा आयोजित केली व सर्वानुमतें त्या भांडखोर माणसावर बहिष्कार टाकावा असा ठराव पास केला. दुसर्या दिवसापासून तो रस्त्यात भेटला की गावकरी मंडळी आपली मान फिरवू लागली. त्या भांडखोर माणसावर त्याच्या पत्नीने व मुलांनीही अबोला धरला. महीना उलटला. त्याला आता एकाकीपणाचा कंटाळा येऊ लागला. आपणच आपल्या पायावर धोंडा मारून घेतला हे त्यास उमजू लागले. पंचाकडे जाऊन त्याने माफी मागितली. पण काही उपयोग झाला नाही. शेवटी तो संत एकनाथ महाराजाकडे गेला. त्याने  आपली व्यथा सांगितली. एकनाथ महाराज म्हणाले, " ठीक आहे,  तुझ्या उजव्या हाताचा तळवा बघू या."  त्याने उजवा हात पुढे केला. त्याच्या उजव्या हाताचा तळवा न्याहाळून एकनाथ महाराज म्हणाले, " मित्रा, तुझा मृत्यु जवळ आला आहे. पुढल्या सोमवारी रात्री बारा वाजता तुझा मृत्यू होणार आहे." तो भांडखोर माणूस घाबरून गेला, आणि काकळूतेने म्हणाला, "महाराज, काही तरी करून मला मृत्युपासून वाचवा." एकनाथ महाराज म्हणाले,"ह्यावर माझ्याकडे काही उपाय नाही. पण एक आठवड्याचा अवधी तुझ्यापाशी आहे. तु सर्वांशी प्रेमाने वाग. लोकांनी तुझ्याशी अबोला धरला आहे. ते तुझ्याशी बोलणार नाहीत. म्हणून  तु कोणाशी बोलण्याचा प्रयत्न करू नकोस. मी तुझ्या मृत्युसंबंधी सांगितलेले भाकीत कोणालाही सांगू नकोस. अगदी तुझ्या पत्नीला व मुलांनाही तुझ्या मृत्युचे भाकीत सांगू नकोस. न बोलता सकाळी लवकर ऊठून घरातील छोटी-मोठी दैनंदिन कामें करीत जा. रस्त्यावर लोकांना ओझे उचलावयास मदत करीत जा. कोणा बाईच्या एका कड्यावर बाळ आहे, व दुसर्या हातात सामानाची पिशवी असेल तर ती पिशवी हातात घेऊन तिच्या घरापर्यंत जा. रस्त्यावरून वृध्द व्यक्ती कोणी दिसली तर तिचा हात धरून चालण्यासाठी आधार देत जा.  सात दिवसात घरातील मंडळी व गावकर्यांना जितकी मदत करता येईल, तितकी मदत कर. बाकी सारे देवाच्या हातात आहे,  म्हणून सतत रामनाम मुखी असू दे. मी तुला सांगितलेले भाकीत कोणालाही सांगू नकोस. फक्त मी म्हटले आहे तसे वागत जा." एकनाथ महाराजांचा सल्ला त्याने मनापासून पाळायला सुरूवात केली. लोकांना आश्चर्य वाटले. लोकांना माहीत पडले कि तो एकनाथ महाराजांना शरण गेला होता. पण लोकांनी त्याच्यावर बहिष्कार टाकला होता, तो सुरूच ठेवला. कारण तो पंचाचा निर्णय होता. मरणाच्या भितीने त्याला ग्रासले होते. पुन्हा गुरूवारी सकाळी तो एकनाथ महाराजाकडे गेला. एकनाथ महाराजाने काही दाद दिली नाही. फक्त दिलेल्या सल्ल्याने वागत जा असे सांगितले.  दुसरा सोमवार उजाडला. त्याला मृत्युची भिती वाटू लागली. सकाळी दहा वाजता तो एकनाथ महाराजांना भेटावयास गेला. एकनाथ महारांजानी फक्त इतकेच सांगितले, की " आज शेवटचा दिवस आहे, लोकांच्या कामात मदत सुरू ठेव, रात्री पावणे बारा वाजता मला भेटावयास ये. ते ही गुप्तरित्या. तो पर्यंत मला भेटायला येऊ नकोस, मी सांगितलेले भाकीत कोणालाही सांगू नकोस. मुखी रामनामाचा जप सुरू ठेव . आता निघ." तो इसम आपल्या घरी परतला. प्रत्येक मिनिटाला त्याच्या छातीतली धडधड वाढू लागली.  रात्रीचे अकरा वाजले. त्याला रहवेना. एकनाथ महाराजांच्या घरी जाण्यासाठी निघाला. दहा मिनिटात नाथमहाराजांच्या घरी तो पोहचला. महाराजांच्या चरणी लोटांगण घालीत रडू लागला. महाराजांनी त्याला धीर देत उठविले व म्हणाले बघ बाराचा ठोका झालेला नाही. तु लौकर आला आहेस, पण हरकत नाही. इथेच माझ्या घरी बारा वाजेपर्यंत रामनामाचा जप चालू ठेव. त्याने नाथांचे म्हणणे ऐकले. व तिथेच बसून रामनामाचा जप पुन्हा  सुरू केला. नाथांच्या घरातील भिंतीवरील मोठ्या घडाळ्यात बाराचे ठोके वाजले. एकनाथ महाराज, त्याला म्हणाले, मित्रा, उठ. तुझे मरण टळले आहे."  एकनाथ महारांजाची इतकी मोठी कृपा पाहून तो पुन्हा पुन्हा त्यांच्या पाया पडू लागला. नाथमहाराजांनी त्याला मिठीत घेऊन कुरवाळले आणि त्याला म्हणाले, मित्रा, मला ज्योतिष विषयातले काही कळत नाही. मी मुद्दामहून तुला खोटे भविष्य सांगितले." तरीही त्याला ते पटेना. तेव्हा नाथ महाराज म्हणाले, मित्रा, आम्हाला आमचे मरण कधी येणार हे कळत नाही, तर आम्ही दुसर्यांच्या मरणाचे भाकीत कसे सांगणार ? " त्यावर त्याने विचारले, महाराज , मग तुम्ही इतके संयमी आणि शालीनतेने कसे सर्वांशी वागता ? एकनाथ महाराज म्हणाले, " मित्रा, मृत्यु हेच जीवनातले अंतिम सत्य आहे, मानवाचा जन्म मिळणे ही आपल्या भाग्याची गोष्ट आहे. कधीतरी आपल्याला मरण येणार आहे, हे सतत ध्यानात ठेवावे, मग आपोआप आपण सर्वांशी प्रेमाने वागू लागतो." एकनाथ महाराजांचा उपदेश ऐकून त्या इसमाचे समाधान झाले. मग पुन्हा एकनाथ महाराजांचे चरण स्पर्श करून त्याने आपल्या घराची वाट धरली. 

मृत्यु हे जीवनातलं अंतिम सत्य. कोणा माता-पित्याला आपला पुत्र वा कन्या गमाविण्याचा शोक वाट्याला येतो, तर कोणाला आपल्या कोवळ्या वयातच आईच्या मायेला व वडीलांच्या छत्राला मुकावे लागते. जीवन हे सुखःदुखाने भरलेले असते. त्यावर शोक करू नका असेच भगवान श्रीकृष्णाने म्हटले आहे.  आपल्याला जी काही संकटे येतात ती आपल्या संचीत कर्माची फलं असतात. हाच नियम भंगवंतांनी गीतेत विस्ताराने समजावून दिले आहे. त्यामूळे ' जसे आपण जीवन जगाल तसाच मृत्यु आपल्या वाट्याला येत असतो ' ह्या विचारपाशी आपली बुद्धी थांबते. त्यातून आपण म्हणतो, ' मृत्यला ना क्रम असतो. ना कोणाच्या शोकाचं व भावनांचं सोयर-सुतक. मृत्युला ह्या भूतलावरील मानवाने बनविलेल्या नियमांचे बंधनही नसते. आपण कोठे, केव्हा, कोणाच्या पोटी जन्म घ्यावा हे आपल्या हातात नसते. आपण केव्हा, कोठे आणि कसे मृत्युच्या विळख्यात सापडणार हे ही सांगता येत नाही.'  ह्या संबंधी पुराणात एक कथा आहे, ती अशी आहे, 

महर्षी व्यासांच्या एका सर्वोत्तम व आवडत्या शिष्याचे मरण जवळ आले होते. व्यासमुनींना त्या शिष्याचे मरण पुढे ढकलावयाचे होते. म्हणून ते आपल्या शिष्याला घेऊन ब्रह्मदेवाकडे जातात. ब्रह्मदेवाने म्हटले, " माझं कार्य जन्म देणे आहे. तुम्ही ह्यासाठी महादेवाकडे जा." मग ते महादेवाकडे जातात. त्यांनीही ह्याबात मी काही मदत करू शकणार नाही, तुम्ही नारारणा कडे जावे, असे सांगितले. व्यासमुनींचा पारा चढला. ते रागाने बेभान होतात आणि तसेच तडक भगवान विष्णूकडे जातात. वैकुंठाच्या पायर्या चढत असताना आठव्या पायरीवर व्यासांच्या त्या शिष्याला ठेच लागते आणि लागलीच त्याचा प्राण जातो. त्याचवेळी तिथे भगवान श्रीविष्णू अवतारतात. व्यासमुनींनी रागातच भगवान विष्णूला विचारतात "का माझ्या सर्वोत्तम शिष्याचे प्राण घेतले? " भगवान विष्णू  व्यासमुनींना म्हणाले " मुनिवर्य तुम्ही राग आवरा." मग चित्रगुप्ताला बोलावितात. चित्रगुप्त मृत्युची नोंदवही घेऊन येतात. व्यासमूनींना त्यांच्या शिष्याच्या मृत्यूची नोंद दाखविली. त्यात व्यासमूनींच्या शिष्याचे नाव, त्याच्या मरणाची तारीख व वेळ तसेच मृत्युचे स्थान (वैंकुठाच्या आठव्या पायरीवर) दाखविले. ते तंतोतंत अचूक दिसले. व्यासमुनींचा राग आटला. भगवान विष्णू म्हणाले, " मुनिवर्य आम्ही देव जरी असलो तरी आम्ही काळ नावाच्या देवतेशी बांधील असतो." त्या देवतेचं आपल्या अध्यात्मात नाव आहे यमराज ,तोच काळ, तोच महाकाळ, तोच शिव. म्हणजे  ब्रह्मा विष्णु महेश मधील 'महेश' म्हणजेच महादेव. जन्म देतो तो ब्रह्म, पालन करतो तो विष्णू आणि नाश करतो तो महेश. इंग्रजीत The God असे म्हटले जाते. G for Ganerator, O for Observance, and D for Destruction. आपली संस्कृती म्हणते,  शेवटी जीव शिवाच्या भेटीला जातो. तेच ते अनंतात विलीन होणे होय. 

इतकं सारं समजले तरी ' मृत्योर्मा अमृतं गमय ' चा अर्थ काय लावावा ? ' तमसो मा ज्योतिर्गमय ' ह्याचा अर्थ मनाला पटतो. अंधकार, अज्ञान दूर होवो व सर्वत्र प्रकाशाचे राज्य असावे. म्हणजेच ज्ञानाची कास धरणे. त्याला जीवनात पर्याय नसतो हे उघड आहे. तसेच तेज म्हणजे सूर्य, व सूर्य प्रकाशात जीवाचे रोपण होते व चंद्राच्या शीतल छायेत त्याचे पोषण होते हे सुद्धा आपल्याला उपनिषदकारांनी पटवून दिले आहे.'असतो मा सद्गमय ' ह्याचाही अर्थ मनाला पटतो. वाईट, खोटे सारे नष्ट होवो, व चांगले ते घ्यावे, व्हावे, टिकावे. आता आपल्या पुढे एक कार्य उरते ते म्हणजे  ऋषीमुनींच्या वाणीतील  ' मृत्योर्मा अमृतं गमय ' ह्या प्रश्नांचे उत्तर शोधण्याचे. हे कार्य कसे पार पाडावयाचे? जगात व्यापलेल्या मृत्युच्या तांडवावर अमृत सिंचन करणे ही सोपी गोष्ट थोडीच आहे. मागे मी  कोजागिरी पौर्णीमेवर एक लेख लिहीला आहे. त्यात कोजागिरी पौर्णीमेला जो जागरण करेल त्याच्या घरी लक्ष्मी येते अशी कल्पना का मांडली गेली असावी ह्यावर सविस्तर लिहीले आहे. तिथे मी म्हटले आहे की कोजागिरी पौर्णीमेला लक्ष्मी मिळेल इतकेच ऋषीमुनींने सागितले आहे. लक्ष्मी प्राप्त कशी करावी हे आपल्यावर सोपविले असावे असा तर्क काढून ' को जागर्ती ' (जागरण)  ह्या शब्दाचा अर्थ माझ्या बुद्धीच्या कुवतीनूसार दिला आहे. आज इथे ' मृत्युर्मा अमृत गमय ' ह्या संबंधीचा अर्थ काढण्याचे कार्य ऋषीमूनींनी आपल्यावरच सोपविले असे मी गृहीत धरून माझ्या बुद्धीच्या कुवतीनुसार त्याचा अर्थ खाली देत आहे. अर्थात आपल्याशी ह्या चर्चेच्या माध्यमातून काढलेला हा अर्थ आहे, तो अंतिम नाही हे सांगावयाची गरज नाही. 

" मृत्यूर्मा अमृत गमय ' म्हणजे संजिवनी विद्या प्राप्त करणे नव्हे. ते कार्य कलीयुगात कोणी करू शकेल असे संभवत नाही. माझ्या गावी नालासोपारा (प) येथे संजीवनी परिवार नावाची एक संस्था आहे . अनेक लोकोपयोगी व काळाला अनुसरून समाज प्रबोधनाचे काम करते. एका अर्थाने जागरणाचे काम करते. हीच ती संजीवनी विद्या असावी. राष्ट्रीय पातळीवर आपल्या संस्कृतीतल्या जीवनमूल्यांच्या आधारावर निरपेक्ष भावनेने देशात सामाजिक समरसता आणि देशभक्तीचा अविरतपणे मळा फुलविणारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नावाची सास्कृतिक संघटना जीवन कसे जगावे ह्या संबंधीचे एक मुर्तीमंत उदाहरण आहे.   मृत्यु नंतरचे जीवन ह्यावर अनेक पुस्तके आहेत. तसेच गरूड पुराणासारखे धर्मग्रंथ ही आहेत. मरणात खरोखर जग जगते, जन पळभर म्हणतील हाय हाय, मृत्यु इत्यादी कविताही आहेत. तो एक स्वतंत्र विषय आहे. ' मृत्यु म्हणजे संपल की  पुढे जीवन आहे? आणि असल्यास तो परलोकातील प्रवास आहे का? प्रवास असल्यास नरक-स्वर्ग असे टप्पे असतात का? त्यातून पुन्हा इहलोकात येणे असते का आणि असल्यास कुठल्या रूपात इत्यादी मुद्याच्या अनुषंगाने पुढे कधीतरी स्वतंत्र पणे चर्चा करता येईल.' मृत्यूर्मा अमृत गमय ' ह्याचा गर्भीत अर्थ समर्थ रामदास स्वामींच्या ' मरावे परि किर्ती रूपाने उरावे ' ह्या उपदेशाशी साधर्म्य दाखवित आहे, असे मला वाटते. किर्ती सहज मिळणारी वस्तू नाही. ती मिळविण्यासाठी चांगली लोकोपयोगी कामे करणे गरजेचे असते. परंतु किर्तीच्या पाठीमागे लागून लोकोपयोगी कामें करणे ही बाब जीवनमूल्य म्हणून समजले जात नाही. म्हणजे निरपेक्ष भावनेने सत्कार्य करीत राहून किर्ती रूपाने उरावे हाच उपदेश समर्थ रामदासांना अभिप्रेत आहे. त्यासाठी चांगल्या गुणाची जोपासना करणे ओघाने आलेच आणि हे तर पहील्या दोन पंक्तीत ऋषीमूनींनी दिलेले आहे. ज्ञानाची उपासना, व सदाचाराचा अंगिकार ह्या बाबी प्रत्येक जीवनमूल्यांच्या कसोटी आहेत. तेथूनच मानव देवत्वपदाच्या शिडीवर चढू लागतो. त्या शिडीवरून कुठपर्यंत चढल्यावर देवत्वपद प्राप्त होते ह्याचा निकष समाज ठरवित असतो. ज्याला आपण  दैवी शक्ती वा दैवीसंपत् म्हणतो त्या एका परीने आपल्या संस्कृतीत वर्णिलेले अनेक जीवनमूल्यें होत. जीवनमुल्यें वा गुण त्यांचा ही एक धर्म असतो, म्हणून गुणधर्म हा शब्द भाषेत आला असावा. आपल्यात गुणांची जाणीवपुर्वक जोपासना करणे वा जीवनमुल्यांचा अंगिकार करून तेच आपल्या जीवनाचे ध्येय मानणे, ह्याचाच अर्थ सार्या जगावर अमृतसिंचन करणे होय. हेच ॠषीमुनींना सुचवयाचे आहे असे मला वाटते. ही जीवनमूल्यें म्हणजे एक प्रकारे आपली दैवते आहेत. ह्या गुणांची, ह्या दैवतांची ज्या महापुरूषांनी पूजा केली ती सारी मंडळी देवत्वपदास पोहचली. हा मानवाचा इतिहास व अनुभव आहे. त्यामूळे आपली दैवते जशी गहन तशी संख्येनेही अगणित आहेत. ह्याच  आधारावर आपली ही लेख मालिका पुढे सरकत जाईल अशी आशा बाळगतो."

गुरुवार, २३ मे, २०१९

निकाल लागला ! लोकसभेचा व विरोधकांचाही !


लोकसभा निवडणुकीचा निकाल लागला. निकाल विविध एक्झीट पोल मध्ये दाखविलेल्या आकड्यांच्या ही पुढे गेला.
' पहीलं पुलवामा, नंतर बालाकोट पुढे काय ' ह्या शिर्षकाच्या लेखात मी म्हटले होते की कदाचीत विरोधकांना २०१४ पेक्षा अधिक दारूण पराभवाला सामोरे जावे लागेल. झाले ही तसेच. ' फिर एक बार मोदी सरकार ' या नाराचा विजय झाला. एक्झीट पोल बाहेर आल्यानंतर  प्रचार, मतदान ह्या संबंधीत दोन भागात पब्लीश केलेल्या लेखात मी माझ्या प्रतिक्रीया व्यक्त केलेल्या आहेत. त्यामुळे अधिक काही लिहावे असे मला वाटत नव्हते. म्हटलं राजकीय पक्ष आपआपल्या जय-पराजयावर विचार मंथन करतील. फार तर पराभव झालेल्या पक्षांच्या अंतर्गत वाद उफाळून येतील. परंतु विरोधी पक्षांनी एक्झीट पोल आल्यानंतर लागलीच एवीएम मशीन संबंधी आरोप करावयास सुरूवात केलेली आपण पाहीले. त्यामुळे राष्ट्रीय पातळीवर पुन्हा लढाई सुरू होण्याचे संकेत मिळाल्यामुळे लोकसभा निवडणूक २०१९ ह्या नाट्याचा अजून एक अंक आहे हे ध्यानात आले.त्या संबंधी काही तरी मत मांडल्याशिवाय चैन पडेना म्हणून हा लेख प्रपंच. 


आपल्या पराभवानंतर दिलेल्या मुलाखतीत काॅग्रेसचे अध्यक्ष राहूल गांधी म्हणाले, "हा पंतप्रधान मोदीचा  विजय आहे. आमची लढाई विचारसरणीची आहे ती सुरू राहील."  राहूल गांधीची एका ओळीची मुलाखत संपली. राहुल गांधींना  काॅग्रेसची विचारसरणी नीटशी माहीती असती तर प्रचारात  'चौकीदार चोर है ' हे वाक्य आपल्या ओठातून बाहेर पडण्या अगोदरच  विचार केला असता. पण त्यांनी तसा विचार केला नाही. कदाचीत त्यांनी आपली अक्कल गहाण ठेवली असावी. त्यावर प्रत्युत्तर म्हणून भाजपाने ' मै भी चौकीदार हूँ  ' ही टॅग लाईन आणली. मतदारांचा मोदीवर प्रचंड भरोसा होता त्यामूळे ही टॅग लाईन भाजपाचे अस्त्र ठरले. त्यातून सार्या विरोधी पक्षांचा एक प्रकारे निकाल लागला. काल पराभवानंतर राहूल गांधीनी एका ओळीची मुलाखत दिली खरी पण  उद्यापासून पुन्हा मित्र पक्षासमवेत ते EVM संबंधीची रड  पुढील पाच वर्षापर्यंत सुरू ठेवतील. विरोधी पक्षांची मानसिकता बदलेल असे दिसत नाही. पराभव मान्य करायचाच नाही अशा हेकट वृत्तीने विरोधी पक्ष नेत्यांची मनं ग्रासली असावीत. त्यावर वैद्यकीय उपाय नाही. अनेक वर्षे केंद्रातील व विविध राज्याची सत्ता उपभोगलेल्या ह्या विरोधकांवर अनेक भ्रष्टाचाराच्या केसेस आहेत. अनेक केसेसमध्ये तपास सुरू आहे. बहुतांश विरोधी पक्षांच्या नेत्यांची, त्यांच्या मुलांच्या नावावर, जावई, नातेवाईकांच्या नावावर बेनामी संपत्ती आहे. काळा पैसा आहे. इडी, सीबाय, आयबी, आयटी , इत्यादी सरकारी विभागाचे छापे ह्यांच्या घरावर, कार्यालयावर पडत आहेत. त्यामूळे विरोधक बेभान झाले आहेत. त्यामूळे कुठे जातीच्या नावावर वा आरक्षणावर, कुठे असहिष्णूता वा धर्माच्या नावावर ही मंडळी जाळपोळ, फोडातोडी, दंगली माजवून अराजक स्थिती निर्माण करणार नाहीत असे ठामपणे म्हणता येणार नाही. भाजपाच्या या दैप्यमान विजयाच्या पाठीमागील कारणे मांडायची झाली तर लेखाचा विस्तार वाढेल. विरोधी पक्षांची हेकट वृत्ती, मोदींचा करिष्मा, भाजपाचे संघटन कार्य, मोदी सरकारने केलेली कामें, विरोधी पक्षाकडे सशक्त नेत्याचा अभाव, पुलवामा व नंतर बालाकोट वर भारतिय वायुसेनेने केलेला एअर स्ट्राईक अशी अनेक कारणें आपल्याला ज्ञात आहेत. मला भाजपाचा हा विजय भारतीय राजकारणावर दुरगामी परीणाम करणारा ठरेल असे दिसते.  देशातील संपुर्ण राज्यव्यवस्था जी सडली होती तिच्यात सुधारणा करणारा एकमेव नेता नरेंद्र मोदीच आहे ही बाब २०१४ साली अधोरेखीत झालेली होती. त्यावर शिक्कामोर्तब झाले. साठ-पासष्ठ वर्षात सडलेली राज्यव्यवस्था भाजपाच्या विजयाला कारणीभूत ठरली असल्यामूळे ह्या लेखात आपण त्यावर चर्चा करू या. प्रथम आपण न्यायव्यवस्थे संबंधी संवाद साधू या. 


मध्यंतरी सुप्रीम कोर्टातील चार न्यायाधिशांनी सरन्यायाधिशा विरूद्ध बंड करून विरोधी पक्षांच्या हेकट वृत्तीला खतपाणी घालण्याचे काम केले. चार न्यायधिशांच्या बंडाशी विरोधी पक्षांच्या नेत्यांचा काय संबंध आहे असा प्रश्न साहाजिकच आपल्या मनात आला असेल. तर त्याचे उत्तर असे आहे की सोळाव्या लोकसभेच्या काळात विरोधकांचा सत्ताधारी पक्षाशी झगडा होता. त्यामुळे न्यायाधिशांनी केलेले बंड सरकार विरोधी आहे, असे सर्वसामान्यांना वाटावे ह्या हेतूने विरोधी पक्षांनी त्यांच्या बंडाला पाठींबा दर्शविला. विरोधी पक्षांनी न्यायाधिशांच्या बंडाला दिलेला पाठींबा केवळ तापलेल्या तव्यावर पोळी भाजण्याइतका मर्यादीत नव्हता. न्यायधिश मंडळी बंड करू लागतात तेव्हा  सर्वसामान्य जनता दोन प्रकारे अर्थ लावते. एक मोदी सरकारने सर्व सरकारी संस्था आपल्या हातात घेतल्या आहेत, हा होतो. दुसरा अर्थ न्यायधिशांच्या ही कुठेतरी, कसल्या तरी हितसंबंधात बाधा उत्पन्न झाली असावी, हा आहे. ह्या पैकी दुसरा अर्थ सर्वसामान्यात लौकर रूजला. ह्याचे कारण पंतप्रधान मोदींसंबंधी सर्व सामान्यांना विरोधी पक्षांपेक्षा अधिक भरवसा वाटत आहे. त्यामुळे मोदींच्या नेतृत्वाखाली भाजपाचे पुर्ण बहुमताचे सरकार आले तेव्हाच न्यायमुर्तीनी बंड का केले असा प्रश्न साहाजिकच सर्वसामान्यांना पडला. त्यांनी ह्याबाबत शोध सुरू केला. माहीती व तंत्रज्ञानात झालेल्या क्रांती मुळे सर्वोच्च न्यायालयात लाॅब्या आहेत अशी गाठ सर्वसामान्यांनी पक्की बांधली. अटलजींचे सरकार एनडीएचे होते. काॅग्रेसच्या  साठ -पासष्ठ वर्षात सरकारच्या प्रत्येक विभागात तसेच प्रत्येक स्वायस्त संस्थेत नोकरशाहांशी संगनमत करून  देशाची लुट होत राहीली. त्यावर अटलजी उपाय करू शकले नाहीत.  कारण अटलजींच्या सरकारला वीस ते पंचवीस पक्षांचा सपोर्ट होता. विविध पक्षांच्या आघाडी सरकारचा कारभार मिनिमियम काॅमन प्रोग्राम वर आधारीत असला तरी ते फक्त एक गोंडस नाव असते. प्रत्यक्षात विविध पक्षात सहमती कुठे, कशी असते हे जाणून घेणे आवश्यक आहे. ' आम्ही सरकारला सपोर्ट केला आहे ना, मग तुम्ही आमच्या लफड्यात, घोटाळ्यात पडायचे नाही, अशी अट सरकार मधील मुख्य पक्षाला सपोर्ट देणार्या पक्षांची असते. ती मुख्य पक्षाला मानावी लागते. युपीए १ आणि युपीए २ ह्या काळात मुख्य पक्ष काॅग्रेस होता. त्यामूळे ' तुम भी खाओ, हम भी खायेंगे ' असे मित्र पक्षांना अप्रत्यक्ष रित्या काॅग्रेसने सांगितलेले असावेच म्हणून भ्रष्टाचार कळसाला पोहचला. जेव्हा सर्वोच्च न्यायालयातील न्यायाधिश सरकार विरूद्ध बंड करते झाले, तेव्हा विरोधी पक्षांची त्यांना साथ मिळाली. त्याचवेळी लक्षात आले की इथे पाणी मुरतयं. सरकारची विविध खाती व संस्था कशा सडलेल्या होत्या ह्याचे हे मुर्तीमंत उदाहरण. तेच जगाजाहीर झाले. त्याची पर्वा ही न्यायमुर्तींनी केली नाही हे फार क्लेशकारक होते. 

पंतप्रधानपदावर आरूढ होताच मोदींनी शासन व्यवस्थेत सफाई सुरू केली. त्या साफसफाईत न्यायालयातील नोकरशहा व नावाजलेल्या वकीलांच्या लाॅब्यावर टार्गेट करण्याचा प्रयत्न सरकार कडून झाला असावा. त्यातून दुखावलेल्या न्यायाधिशांनी सरन्यायाधिशां विरूद्ध बंड केले असावे. पंतप्रधान मोदी अथवा सरन्यायाधिश मनमानी करीत होते असे बंडखोर न्यायाधिशांच्या म्हणण्यात तथ्य असते तर  बंडखोर न्यायाधिशांनी राजीनामा देऊन सरळ राजकीय लढाई पुकारून सरकारशी दोन हात करावयाचे होते. तो हक्क त्यांच्यासाठी संविधानात उपलब्ध होताच की.  पण तसे त्यांनी केले नाही. का? भावी काळात मिळणार्या न्यायालयातील सर्वोच्च पदावर पाणी सोडण्याचे बंडखोर न्यायाधिशांच्या जीवावर आले असावे. शेवटी न्यायालय काय, सीबीआय काय सर्वत्र सत्ता असते आणि त्याची चव सोडता येत नाही. हेच खरे. दशहतवादाचा आरोप असलेल्या कैद्याची  किंवा गुजरात मधील राज्यसभा निवडणूकीच्या संदर्भातील सुनावणीसाठी मध्यरात्री न्यायालय उघडण्यात का आले, हा आपणा सर्वसामान्यांना पडलेला प्रश्न. पण ह्याचे उत्तर मिळाले नाही. सीबाय असो वा आयबी ह्या संस्थेत अधिकारी वर्गाची भांडणे मोदीच्या काळात उघडकीस का आली ? ह्याचे कारण  मोदींच्या साफसफाई मोहीमेमुळे. नोकरशहाशी संधान बांधून असलेली हितसंबंधीय मंडळीच्या टोळीचे नाव ल्युटीन्स. हीच ती डावे, उपरे, मंडळी. ह्याच मंडळीच्या टोळीत सुप्रिम कोर्टातील वकील ही आहेत. त्यांचे बंडखोर न्यायमुर्तींशी सख्य होते व आहे हा समज जनतेत पसरला. आपल्या देशात सर्व सरकारी व्यवस्था  का सडल्या गेल्या ह्याचे कारण सत्तेत असणार्यांना सत्ता टिकविण्यासाठी लागणारा निधी उपलब्ध व्हावा हे होय. हा निधी अनेक उद्योजकांकडून मिळतो. उद्योजकांच्या कंपन्यांच्या कारभारा संबंधी टॅक्स, पर्यावरण , कामगार, इत्यादी बाबीसंबंधी सर्वोच्च न्यायालयात खटले असतात. त्यात अटकाव न व्हावा त्यासाठी दिल्लीतील ल्युटीन मंडळी अघोषित दलाल म्हणून काम करीत असतात असे आपल्या वाचनात येत असते. प्रश्न असा आहे की केव्हापासून सरकारी अधिकाराचा दुरूपयोग सुरू झाला ?  हा आहे. ह्याचा शोध घ्यावयाचा असेल तर आपल्याला थेट १९६६-६७ काळात मागे जावे लागते. त्या काळाचा राजकीय घडामोडीचा इतिहास काय आहे त्यावर एक नजर मारू या. म्हणजे काॅग्रेस पक्ष व डावे विचारवंत, ल्युटीन्स मंडळीचे सत्ताधार्या समवेत असलेले संबंध ह्या संबंधी माहीती मिळू शकते. आज मोदी सरकार विरूद्ध विरोधकांचा जो लढा आहे, तो राहूल गांधी म्हणतात तसा विचारसरणीचा असला तरी तो कमी प्रमाणात आहे. मोदींचा मुख्य लढा  सरकारच्या दरबारात असलेल्या लाॅबी तोडण्याचा. त्यातील मुख्य घटक काॅग्रेस त्यामुळे मोदीजी काॅग्रेस मुक्त भारत करू या असे सतत म्हणत आहेत. काॅग्रेस मुक्त भारत ह्याचा अर्थ देशातील व्यवस्था ज्या सडलेल्या आहेत त्यातून देशाला मुक्त करायचे आहे असे स्पष्टीकरण मोदींनी एका मुलाखतीत दिले आहे. आता काॅग्रस मुक्त म्हटले तर पर्यायाने ' नेहरू-गांधी घराणे मुक्त काॅग्रेस ' असाच अर्थ निघतो.

काॅग्रेस पक्षात नेहरू- गांधीची घराणेशाही निर्माण झाली तेव्हापासून सरकारी अधिकार, सरकारी व्यवस्था,  संस्था, बरबटायाला सुरूवात झाली असे मोघमपणे म्हणता येईल. काॅग्रेसमध्ये जी घराणेशाही आली, त्याला भारताचे पहीले पंतप्रधान पंडीत जवाहरलाल नेहरू जबाबदार आहेत असे मानता येत नाही. जर तसे असते तर नेहरूंच्या निधनानंतर काॅग्रेस पक्षांचे संसदेतील नेता म्हणून लाल बहादूर शास्त्रीची निवड झाली नसती. सर्वात सनदशीर पंतप्रधान म्हणून ज्यांचे नाव घेता येईल असे लाल बहादूर शास्त्रींच्या अकाली मृत्युनंतर पंतप्रधानपदी पंडीत नेहरूंच्या कन्या श्रीमती इंदिरा गांधी पंतप्रधान झाल्या. शास्त्रीजींचा मृत्यु  रशियात झाल्यामूळे तसेच इंदिरा गांधी अकल्पीतपणे पंतप्रधान झाल्यामुळे  शास्त्रीजींच्या मृत्यु संबंधी एक गुढ उत्पन्न झाले. ते आजही तसेच आहे. त्या सोबत ' काॅग्रेस पक्षात दादागिरी करून इंदिरा गांधी पंतप्रधान झाल्या ' अशी चर्चा ही होती. ती आजही कायम आहे. दादागिरी कोणाच्या ताकदीच्या बळावर तर त्याचे उत्तर रशिया हेच असावे. कारण त्यावेळी जग दोन अद्यावत शस्त्रानीं भरलेल्या महाशक्तीत विभागलेला होता. त्या महाशक्ती  म्हणजे भांडवलशाही अमेरिका व साम्यवादी रशिया. रशियाशी आपल्या देशाला नाते जोडणे सामरिक दृष्ट्या आवश्यक होते हे मान्य केले तरी व्यक्ती स्वातंत्र्याचा संकोच करणार्या रशियन साम्यवादी स्टाईलने राज्यकारभार चालविण्याची इंदिराजींना काय  गरज होती ? आपल्या देशाच्या संविधानात  समाजवादी राज्यव्यवस्ता तसेच सर्वधर्मसमभाव हे शब्द दुरूस्ती करून घुसडविण्यात आले. पंतप्रधान म्हणून १९७१ च्या पाकीस्ताशी झालेल्या युद्धातील विजयात पंतप्रधान इंदिरा गांधीच्या कणखरापणाचा वाटा होता. म्हणून तत्कालीन जनसंघ  (भाजपा) पक्षाचे नेते अटलबिहारी वाजपेयींनी जाहीर कौतुक केले. परंतु देशाचे राजकारण खालच्या पातळीवर आले ह्यास इंदिरा गांधीच जबाबदार होत्या. राजकीय व्यवस्थेत आपल्या हिंतसंबंधीयांना झुकते माप देण्याच्या प्रथेचे जनकत्व त्यांच्याकडेच जाते. त्यांच्याच कारकिर्दीत काॅग्रेस फुटली. १९७१ च्या निवडणूकीत स्वतः च्या मतदार संघात शासकीय धन व शक्तीच्या गैरवापरामुळे त्यांची निवडणूक अलाहाबाद न्यायालयाने रद्दबादल केली. न्यायालयाचा निर्णय धाब्यावर बसविला. तो खटला सर्वोच्च न्यायालयात गेला. तेव्हा सर्वोच्च न्यायालयात काय झाले हे कधीच बाहेर आले नाही. कारण इंदिरा गांधीनी देशात ( २५ जून सन १९७५) आणिबाणी लावली ते ही मध्यरात्री. त्या अध्यादेशावर राष्ट्रपती महोदयांची सही दुसर्या दिवशी घेतली. आणिबाणीतील कृष्णकृत्यें,  पुत्र संजय गांधीचा सरकारच्या कारभारातला हस्तक्षेप इत्यादी कारणामूळे देशाच्या राजकारणात व्यक्तीपूजा  घराणेशाही, थैलीशाही, हुकूमशाही, भ्रष्टाचार सारख्या दुर्गूणांचा शिरकाव इंदिराजींच्या काळात झाला. हेच दुर्गूण काॅग्रेस मधून बाहेर पडलेल्या नेत्यांनी स्वतःचे प्रान्तीय पक्ष स्थापन केले त्या पक्षांतही शिरले. हे सारे दुर्गूण आपल्या येथील राजकीय व्यवस्थेत आजही आहेत.  

पंतप्रधानपद सांभाळायला घेतल्यावर मोदींनी ह्या व्यवस्थेविरूद्ध लढा पुकारला. परंपरांगत वा इंदिरा गांधीच्या वारसाच्या कृपेने  चालत आलेल्या व्यवस्थेत काॅग्रेसच्या निष्ठावंताकडे देशाच्या तिजोरीच्या चाव्या होत्या. निष्ठावंत व श्रेष्ठी हे दोन शब्द काॅग्रेसच्या इतिहासात इंदिराजींच्या काळात रूढ झाले. श्रेष्ठी म्हणजे इंदिरा गांधी. निष्ठावंत म्हणजे नेहरू-गांधी घराण्याची भाट मंडळी. ह्या भाट मंडळीत फक्त काॅगसचीच मंडळी होती असे नाही. काॅग्रेस व्यतिरिक्त डावे विचारवंत, पत्रकार-मिडीयातील मंडळी, काही उद्योजक, काही विदेशी लोक ही होते. ज्यांना आपण आज ल्युटीन्स म्हणून ओळखतो, ती हीच मंडळी. बँकाचे राष्ट्रीयकरण केल्यामुळे बँकेतील पैसा ही काॅग्रेसचा असाच समज पसरला.(त्यात तथ्य होतेच हे नगरवाला प्रकरणाने कळले. लेखाचा विस्तार वाढेल म्हणून त्यावर चर्चा इथे करीत नाही.) पण तेव्हा आजच्या काळातील माहीती व प्रसारण क्षेत्रात आधुनिक तंत्रज्ञान नव्हते. तरीही सरकार दरबारतल्या बातम्या काढण्याचे धाडस व कसब काही व्रतस्थ पत्रकार मंडळीकडे होते.  म्हणून काही गोष्टी सर्वसामान्यांच्या कानीं आल्या. 

आज जगात काय घडते आहे हे मोबाईलच्या एक बटनावरून समजते. तरी ही विरोधी पक्षांनी पंतप्रधान मोदींवर सर्व सरकारी संस्थेचं खच्चीकरण केले आहे, अशी ओरड सुरू केली. हे  म्हणजे ' उलटा चोर  चौकीदारको डाँटे 'असेच झाले की ! पंतप्रधानपद आणि काॅग्रेसचे अध्यक्षपद हे एकाच व्यक्तीकडे राहण्याची प्रथा इंदिराजींच्या काळात सुरू झाली. सरकारच्या सार्या यंत्रणा इंदिराजींच्या ताब्यात होत्या. आज पुलवामा येथे दशहतवाद्यांने हल्ला कसा केला, इन्टीलीजन्स एंजन्सी काय करत होते, असे खडे सवाल करणार्या काॅग्रेस नेत्यांना माझा प्रश्न हा आहे की, पंतप्रधान इंदिरा गांधीची हत्या कशी झाली, तिही त्यांच्या निवासस्थानी ? महात्मा गांधीजींची हत्या झाली ती काॅग्रेसच्या राज्यातच झाली ना ! तीही दिल्लीतच ना ! माजी पंतप्रधान राजीव गांधीची हत्या काॅग्रेसने पाठींबा दिलेल्या तामीळनाडूतील डीएमके  सरकारच्या काळात का व कशी झाली? त्यावेळी तामीळनाडू तील काॅग्रेसचे नेते मंडळी राजीव गांधीच्या जवळ का नव्हती? ती असती तर मृतामध्ये वा जखमी मध्ये त्यांची नावे आली असती ! पण तसे काही वाचले नाही, ऐकले ही नाही. वरील तिन्ही घटनांच्या संदर्भात  गृहखाते झोपा काढत होते का, हा प्रश्न काॅग्रेस ला ही लागू होतोच ना! काॅग्रेस पक्ष व काॅग्रेसचे सरकार स्वतःच्या नेत्यांचे सरक्षण करण्यात कमी पडले हा तर इतिहास आहे. पण तत्कालीन भाजपाने उलट-सुलट प्रश्न विचारले नाही. प्रसंगाचे गांभीर्य सांभाळण्याचा सुसंकृतपणा भाजपाने दाखविला होता.  पुलवामा येथे जवानावर  पाक पुरूस्कृत दशहतवाद्यांनी हल्ला केल्यावर काॅग्रेस व विरोधी पक्षांनी मोदी सरकारला ' गुप्तहेर खाते काय करीत होते ' असे म्हणत धारेवर धरले. हाती काही पुरावा नसताना लागलीच मोदी सरकारवर आरोप करण्याची काय गरज  होती ? स्थितीचे गांभीर्य विरोधकांनी वार्यावर सोडले. आपल्या हवाई सेनेने पाकिस्तान मध्ये जाऊन बालाकोटवर हवाई हल्ला केला व पाकिस्तानला धडा दिला, त्यावेळी विरोधी पक्षानी त्या संबंधी पुराव्याची मागणी केली. हे काम देशद्रोही स्वरूपाचे नसले तरी ते देशद्रोहाच्या कृत्या एवढे संतापजनक होते. तसे पाहता  प्रगत देशात अत्याधुनिक सुरक्षा यंत्रणा असूनही तिथे दशहतवाद्यांचे हल्ले होतातच. आपल्या देशात अंतर्गत सुरक्षेबाबत अत्याधूनिक तंत्रज्ञान वापरण्यावर काॅग्रेसने सतत दुर्लक्ष केलेच,  शिवाय सुरक्षापासुन ते प्रशासन पर्यंतच्या हर एक व्यवस्थेत स्वार्थी नोकरशाह, नाटकी देशभक्ती असलेले ल्युटीन्स, आणि त्यांच्या सोबत असलेली तत्कालीन सत्ताधारी  पक्षाची नेते मंडळी देशाची तिजोरी लुटत राहीले. त्यामुळे  सारी राज्यव्यवस्था सडून गेली. पंतप्रधान मोदींचा लढा हा या अव्यवस्थेविरूद्ध आहे. या अव्यवस्थेतून मालदार झालेल्या राजकीय पक्षांच्या नेत्यांची कोंडी होत असल्यामूळे आजचे विरोधी पक्ष (कालचे सत्ताधारी) मोदींवर आरोप करीत आहेत. मार्क टूलीनी म्हटल्याप्रमाणे मोदी विचलीत होणार नाहीत. हे खरे ठरले.  मटा मधील सुनिल चाबके सारख्या पत्रकाराला  मोदींचा आत्मविश्वास प्रचार काळात ढळलेला दिसला तरी,  मला ते नेहमी प्रमाणे आक्रमकच दिसले. निवडणूकीला ते विचलीत न होता सामोरे गेले व विजयी झाले. मोदींच्या  करिष्माला माझा प्रणाम !


आता पुढे काय ? विरोधक एविएम वर संशय व्यक्त करण्यासाठी, आकाश पाताळ एक करण्याची शक्यता आहे. जाती-पातीच्या नावावर दंगल करू लागतील. पुलवामा व बालकोट संबंधी हलकट वृत्तीचे प्रदर्शन करणार्या विरोधी पक्षांची विश्वासहर्ता संपली आहे. तर दुसरीकडे मोदी अधिक मोठ्या संख्येने विजयी झाले आहेत. त्यामुळे पंतप्रधान मोदी अधिक कठोर पावले उचलतील असे दिसते. ती पावले कशी असतील हे आपल्याला वेळोवेळी कळणार आहेतच. त्यासंबंधीची चर्चा आपणही त्या त्या वेळी करूच.  विरोधी पक्षांचा पराभव का झाला ह्याची कारणे अनेक आहेत. ती कारणे अनेक लेखात ह्यापुर्वी मी दिलेली आहेत. थोडक्यात द्यावयाची असतील तर ती अशी आहेत.


१) पंतप्रधान मोदींचा करिष्मा लाजबाब आहे.

२) तथाकथीत पुरोगामी, डावे विचारवंत, कलावंत, साहित्यिक काय म्हणतात ह्यावर भरवसा टाकून विरोधी पक्षांच्या नेत्यांनी आणि कार्यकर्त्यांनी मोदी,  भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघावर नाहक शिव्याची लाखोली वाहिली. ती त्यांना नडली.

३)संघाचा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद सरस ठरला आहे. तसेच संघाची पुण्याई भाजपाला उपयुक्त ठरली. प्रत्येक मतदार संघातील बहुतांश मतदार भाजपा उमेदवारास मत देताना हा संघाचा माणूस आहे, असा विचार करून मत देऊ लागले आहेत. संघाच्या चड्डीची टिंगल करणार्या शरद पवारांची काय स्थिती झाली आहे, ह्यावर सार्या विरोधी पक्षांनी विचार करावयास हवा.
      
४) विदेशी पैशावर चालणार्या एनजीओ, तसेच चर्च, मशिदी, मदरेसा ह्यांनी सांस्कृतिक राष्ट्रवादावर प्रहार केले. त्यामुळे नवीन मतदार भाजपाकडे वळाला.
  
५) मोदी सरकारने अनेक लोकपयोगी व विकासाची कामे केली आहेत. त्यातील काही अशी आहेत, की ती स्वातंत्र्यानंतर देशात प्रथमच झालेली आहेत. 

६) भाजपा कार्यकर्ते सरस ठरले.

७) प्रथमतः आपल्या देशाचा जागतिक राजकरणावर दबाव वाढला आहे हे सत्य विरोधकांनी स्विकारले नाही.
   
८) दशहतवाद्या संबंधी झिरो टाॅलर्न्स दाखविण्यात विरोधी पक्षांनी नेहमीच्या सवयी प्रमाणे नालायकपणा केला.
   
९) विरोधी पक्षांत असलेल्या घराणेशाहीच्या नाण्यावर जनता  नोटाबंदीसारखा प्रयोग करू लागली आहे.
     
१०)जाती-पातीच्या गणितावरून आता निवडणूकीत मिळणार्या यशाची गँरेन्टी संपत आली आहे. 

११) छोट्या छोट्या कारणासाठी अंदोलने करून सार्वजनिक मालमत्तेचं नुकसान करणारे अस्त्र हळूहळू निकामे होत जात आहे. म्हणून राज ठाकरे नावाचे अस्त्र निकामी ठरले.

१२) केवळ सत्ता प्राप्तीसाठी भाषा व प्रांतीय अस्मिता चेतवून अंदोलनाचा वापर उपयोगी पडण्याची शक्यता कमी होत आहे. 

एकंदरीत देश बदलतोय, समाज बदलतोय !  सांप्रादायिक, पेशवे, शेठजी-बनियाचा पक्ष असे हिणविले जात होते त्याच पक्षांची मंडळी काळानुसार बदल स्विकारीत, देशात प्रत्येक क्षेत्रात आघाडीवर राहून एकसंघ व उन्नत समाज निर्माण करण्याचे आव्हान पेलविण्याचे काम करीत आहे, हीच बाब जनतेला भावली आणि भाजपाला तिने विजयी केले. ह्या विजयाच्या संदर्भात मला भुतपूर्व  पंतप्रधान भारतरत्न स्वर्गीय अटलबिहारी वाजपेयी ह्यांनी सन १९९७ साली संसदेत विराधकांना इशारा दिला होता, तो आठवला. तो असा आहे.

" मेरी बातको गांठ बांध ले, आज हमारे कम सदस्य होने पर आप हंस रहे है लेकीन वो दिन आएगा जब पूरे भारतमे हमारी सरकार होगी, उस दिन देश आप पर हंसेगा | "

विरोधी पक्षांनी वर नमूद केलेल्या कारणांवर तसेच अटलजी सारख्या द्रष्ट्या नेत्याने केलेले भाकीत खरे का ठरले ह्यावर अंतर्मुख होऊन आपले राजकारण विशुद्ध देशभक्तीच्या भावनेने करण्याचा प्रयत्न करावयास हवा. लोकशाहीत जय पराजय होत राहतात. पक्ष येतील जातील, नेते होतील जातील, समाज शाश्वत आहे. विसाव्या शतकाच्या प्रारंभी जगाच्या क्षितीजावर उदयास आलेल्या राष्ट्रवादाला पर्याय सध्या तरी नाही. म्हणून आपण सारे एक आहोत ही भावना दॄढ ठेवावीच लागेल. विजयाच्या उत्साहात वा द्वेषाच्या नशेत आपल्या एकतेला तडा देण्याचा प्रयत्न ना सत्ताधारी पक्षाकडून होवो, ना विरोधी पक्षांकडून होवो अशी ईश्वर चरणी प्रार्थना !
     
                     भारत माताकी जय !

दिल्ली राज्य निवडणूक निकाल--केजरीवाल नावाचं काटेरी झुडपं भस्मसात ? (भाग -१)

गेल्या शनिवारी म्हणजे ८ फेब्रुवारी २०२५ या दिवशी दिल्ली विधानसभा निवडणूकांचा निकाल लागला. बहुतांश न्यूज चॅनेल्सनी मांडलेले भाकीत खरे ठरले. भ...